वैशाली – भगवान महावीर का जन्मस्थान – बिहार के ऐतिहासिक स्थल

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वैशाली की पहली छवि जो मेरे मन में बनी थी वह आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ द्वारा थी। इसमें वर्णित विलासिता और पात्र, जिनके बारे में आपने शायद सुना तो होगा लेकिन जिनके बारे में आप ज्यादा नहीं जानते, आपको इस जगह की ओर खींच लाते हैं। ऐसे में इस जगह के बारे में और जानने की उत्सुकता इसे और भी रोचक और आकर्षक बनाती है। इतिहास ज्ञानी भी इस जगह के प्रति गहरी रूचि रखते हैं।

वैशाली के आस पास के गाँव
वैशाली के आस पास के गाँव

इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, वैशाली भगवान महावीर का जन्मस्थान है। अतः इसे जैन धर्म का जन्मस्थान भी माना जाता है। इन सभी बातों को मद्दे नज़र रखते हुए मेरे लिए बिहार में स्थित इस जगह को देखना जरूरी हो गया। लेकिन आज अगर इस जगह को देखा जाय तो लगता है जैसे वह अपने गौरवपूर्ण अतीत को काफी पीछे छोड़ चुकी है। वैशाली की यात्रा करके और उससे संबंधित कुछ अनभिज्ञ, नवीन और रोचकपूर्ण बातों को जानकर मैं बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि लोग वैशाली को बुद्ध और महावीर से जोड़ते हैं, लेकिन मेरे लिए तो वैशाली हमेशा आम्रपाली का नगर ही रहेगा।

वैशाली पटना से एक घंटे की दूरी पर बसा हुआ है। पटना से वैशाली जाते समय रास्ते में आपको वहां के ग्रामीण जीवन की झलकियाँ देखने को मिलती हैं। हमे वहां पर बहुत सी बालिकाएँ अपनी रंगबिरंगी साइकिलों पर जाते हुए दिखी। उन में से कुछ लड़कियों से हमने दो-चार बातें भी की। उनकी बातों से उनका आत्मविश्वास और उनकी प्रसन्नता साफ झलक रही थी।

वैशाली के रास्ते पे घर बहुत ही साफ-सुथरे थे और प्रत्येक घर के बाहर चारे की गोलाकार गठरियाँ बनाकर रखी गयी थीं। वह समय ही कुछ ऐसा था कि, लग रहा था जैसे हम सरसों के पीले-पीले खेतों और दूर तक फैले खुले मैदानों से गुजर रहे हो। इस भाग में अभी तक प्रगति ने पदार्पण नही किया था, यानी भवनों का निर्माण अब तक यहां पर एक अन्यदेशीय बात थी। यही कारण है कि दूर क्षितिज तक जहां भी आपकी नज़रें जाती हैं, वहां तक आपको सिर्फ खुला आसमान और दूर तक फैली धरती नज़र आती है। इसी दौरान हमे उस क्षेत्र के विधायक को भी देखने का मौका मिला जो अपने चमचमाते सफ़ेद कपड़ों में गाँव-गाँव घूमकर लोगों से मिलते, उनसे बातें करते और उन्हें आश्वासनों से भरे भाषण सुनाते थे।

बिहार में वैशाली की यात्रा 

बुद्ध का प्रथम स्तूप - वैशाली
बुद्ध का प्रथम स्तूप – वैशाली

हमने वैशाली की यात्रा का आरंभ पुराने बुद्ध अवशेष स्तूप के दर्शन के साथ किया। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को संबंधित आठ हकदारों में समान रूप से वितरित किया गया था। जिन में से एक थे वैशाली के लिच्छवी। इन अवशेषों के लिए लिच्छवियों ने वैशाली में एक स्तूप का निर्माण किया था। लेकिन बाद में इन अवशेषों को उत्खनन द्वारा इस स्तूप से निकाल कर पटना संग्रहालय में रखा गया था। यह बुद्ध अवशेष स्तूप वास्तव में एक छोटा सा मिट्टी का स्तूप हुआ करता था, जिसका बाद में मौर्य, शुंग और कुषाण शासन काल के दौरान विस्तार किया गया था।

बुद्ध के अवशेष पत्थर की सन्दुक में पाये गए थे, जिस में उनकी अस्थियों की राख, एक छोटा सा शंख, काँच के दो मणि, एक स्वर्ण पत्ता और तांबे का एक सिक्का था।

वैशाली में एक नया विश्व शांति स्तूप बनवाया गया है, जो राजगीर के विश्व शांति स्तूप जैसा ही है। पर समय के अभाव के कारण हम यह स्तूप नहीं देख पाये।

पुरातन वैशाली शहर का कोल्हुआ भाग  

कोल्हुआ पुरातन वैशाली शहर का एक भाग है, जो बुद्ध से जुड़ा हुआ है। यही वह जगह है जहां पर बंदरों ने बुद्ध को शहद अर्पित किया था और इस प्रकार वे बुद्ध की कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे। यहां पर स्थापित बुद्ध स्तूप दरअसल इसी घटना की स्मृति में बनवाया गया था। बुद्ध अवशेष स्तूप की तरह यह स्तूप भी पहले बहुत छोटा था, जिसे बाद में इस क्षेत्र पर शासन करनेवाले विविध राजवंशों द्वारा बढ़ाया गया। कहा जाता है कि बुद्ध ने यहां पर बहुत से वर्षाऋतु बिताए थे।

दो महत्वपूर्ण बातें जो वैशाली में घटित हुई वह थी महिलाओं को संघ में शामिल करना और यहां की तपस्विनियों के लिए मठ का निर्माण करना, जो कि तपस्विनियों के लिए बनाया गया सबसे पहला मठ था। तथा उन्होंने प्रख्यात आम्रपाली को एक बौद्ध तपस्विनी में परिवर्तित कर उसे संघ में शामिल किया था। इस स्तूप के पीछे एक अशोक स्तंभ खड़ा है जिसके ऊपर सिंह चतुर्मुख का चिह्न बना हुआ है।

अशोक स्तंभ  

अशोक स्तम्भ वैशाली
अशोक स्तम्भ वैशाली

आज तक जितने भी अशोक स्तंभ मैंने देखे हैं, उन सब में से वैशाली में स्थित अशोक स्तंभ शायद सबसे अच्छे तरीके से संरक्षित किया गया है। यद्यपि इस स्तंभ की प्रसिद्ध चमक अब फीकी पड़ गयी है। इस स्तंभ पर किसी भी प्रकार के कोई अभिलेख नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ के ऊपर सिंह चतुर्मुख का चिह्न बड़ी शान से सजाया हुआ है। इसके अलावा अन्य अशोक स्तंभों पर पायी जानेवाली सभी विशेषताएँ इस स्तंभ पर भी देखी जा सकती हैं, जैसे कि उल्टा कमल। यहां पर स्वास्तिक के आकार का एक मठ है जो हाल ही में उत्खनन द्वारा खोजा गया है और इससे जुड़े कुछ जलकुंडों की भी खोज की गयी है। यहां का परिसर अन्य किसी भी बौद्ध क्षेत्र के परिसर जैसा ही है, जहां पर मन्नत के हजारों स्तूप और हर जगह पर छोटे-छोटे मंदिर स्थित हैं।

वैशाली में उत्खनन के क्षेत्र, बिहार 

वैशाली के एक भाग में आज भी उत्खनन का काम जारी है और हर रोज़ यहां पर नयी-नयी बातों की खोज होती रहती है। इस परिसर से कीमती पत्थर, मणि, मुहर, मृण्मूर्तियाँ आदि, जैसी अनेक वस्तुएं पायी गयी हैं, तथा यहां पर एक मुकुट जड़ित बंदर भी पाया गया है। इस जगह से जुड़े उपाख्यानों में बंदर अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन बंदरों ने ना सिर्फ बुद्ध को शहद अर्पित किया था बल्कि उनके लिए एक बड़ा सा सप्त-स्तरीय जलकुंड भी खोदा था। नालंदा की तरह इन अवशेषों में भी हमे कुछ उत्कीर्णित ईंट देखने को मिले जो यहां-वहां से बाहर झांक रहे थे।

वैशाली – भगवान महावीर का जन्मस्थान 

भगवान् महावीर का जन्म स्थल
भगवान् महावीर का जन्म स्थल

वैशाली जैन धर्म के प्रतिष्ठापक भगवान महावीर का जन्मस्थान है। लेकिन दुर्भाग्य से उनका जन्मस्थान एक छोटी सी जगह में सीमित है, जहां पर लगा हुआ सूचना फ़लक आपको बताता है कि, यही वह जगह है जहां पर भगवान महावीर का जन्म हुआ था। इसी के पीछे एक अध-निर्मित संरचना है जो कि मंदिर के उद्दिष्ट से बनवाई गयी थी। स्थानीय लोगों से हमे पता चला कि यह संरचना किन्हीं कारणों से विवादों का विषय बनी हुई है, जिसकी वजह से इसके निर्माण को स्थगित रखा गया है और काफी समय से वह इसी अवस्था में है। इसके विपरीत अन्य जगहों पर पाए जाने वाले जैन मंदिर बहुत ही संपन्न और सुंदर हैं। लगता है कि इस जगह को सच में पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है। इसके अलावा वैशाली में जैन शास्त्र पर संशोधन करने हेतु एक संस्थान है, जिसमें एक पुराना लेकिन बहुत ही सुंदर पुस्तकालय है।

राजा विशाल का गढ़, वैशाली 

राजा विशाल का गढ़ वैशाली का प्राचीनतम भाग है। माना जाता है कि यह महाकाव्यों के काल से जुड़े, विशाल नाम के राजा का गढ़ हुआ करता था। मुझे लगता है कि इस जगह को शायद उन्ही का नाम दिया गया होगा। कहा जाता है कि यह गढ़ उस समय राजा विशाल का महल हुआ करता था। मैं अभी तक किसी इमारत की नींव को देखकर उसकी निर्माण योजना को समझने की कला नहीं सीख पायी हूँ, इसलिए इस जगह के बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं जान पायी। लेकिन वहां पर लगा हुआ सूचना फ़लक आपको उस जगह से संबंधित विस्तृत जानकारी देता है। इस सूचना फ़लक के अनुसार यहां पर विविध ऐतिहासिक कालों से जुड़ी प्राचीन वस्तुएं पायी गयी हैं, जिन में से अधिकतर वस्तुओं को अब संग्रहालय में रखा गया है।

खुदाई से प्राप्त चतुर्मुखीलिंग  

वैशाली में पाया गया प्राचीन चतुर्मुख लिंग
वैशाली में पाया गया प्राचीन चतुर्मुख लिंग

हाल ही में खुदाई के दौरान यहां पर एक चतुर्मुखीलिंग की खोज हुई है। चतुर्मुखीलिंग का अर्थ है चार मुख वाला लिंग जिसके चारों मुख चारों दिशाओं की ओर मुंह किए हुए हैं। इस पर बने हुए मुख ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य के हैं। इस लिंग के निचले भाग पर कुछ अभिलेख हैं, जो उसे गुप्त काल से जोड़ते हैं। इस चतुर्मुखीलिंग को शहर में स्थापित कर वहां पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। जब हम वहां पर गए थे उस समय वहां पर महिलाओं का एक समुह कीर्तन कर रहा था। इसके अलावा यहां पर और भी कई पुरातन मूर्तियाँ हैं, जो बावन पोखर मंदिर में देखी जा सकती हैं। यद्यपि इन मूर्तियों को मंदिर के प्रमुख भाग में नहीं रखा गया है।

बावन पोखर मंफिर में प्राचीन प्रतिमाएं
बावन पोखर मंफिर में प्राचीन प्रतिमाएं

मान्यताओं के अनुसार जो जलकुंड आम्रपाली के प्रासाद से जुड़ा हुआ करता था वह आज भी यहां पर मौजूद है। यहां के स्थानीय लोगों ने हमे बताया कि इस कुंड की एक खासियत है कि, इसमें कभी जंगली घास नहीं उगती। वैसे तो इस कुंड के आस-पास बहुत सी जंगली झाड़ियाँ हैं लेकिन कुंड के भीतर किसी भी प्रकार की घास-पुस नहीं उगती। दुर्भाग्यवश हम वैशाली का संग्रहालय नहीं देख पाये, जहां वैशाली में स्थित अनेक स्थानों से प्राप्त पुरातन वस्तुएं रखी गयी हैं। भारत में स्थित अन्य संग्रहालय आमतौर पर सोमवार के दिन बंद रहते हैं लेकिन यह अकेला ऐसा संग्रहालय है जो शुक्रवार के दिन बंद रहता है।

मुझे वैशाली शहर सच में बहुत पसंद आया, जिसका अतीत अपने-आप में बहुत ही गौरवशाली है। इस जगह को गहराई से जानने और समझने के लिए आपको उसके इतिहास के बारे में पता होना बहुत आवश्यक है।

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