कावड़ राजस्थान की गाथायें कहता रंगीन पिटारा

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कावड़ लोक कला से मेरा प्रथम सामना नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित दस्तकार मेले में हुआ था। चटक पीले, लाल व हरे रंग में रंगे इन रंगबिरंगे लकड़ी के बक्सों ने सहसा मेरा सम्पूर्ण ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। कावड़ लोक कला का यह जीता जागता उदाहरण देख मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठा था। मेरे इस आनंद को स्थायी बनाने, हाथों में कैमरा उठाये मैं मेले की उस कुटीर की ओर दौड़ पड़ी।

कावड़ कथा वाचन - राजस्थान
कावड़ कथा वाचन – राजस्थान

वहां उपस्थित कलाकार ने मुझे बताया कि यह पौराणिक कथा प्रस्तुति की एक अनोखी शैली है। कावड़ उस जादुई पिटारे के समान है जो अपनी परतों में अनेक रहस्यों को संजोये रखता है। यहाँ यह पिटारा एक छोटा सा सघन बक्सा है जिसमें अनेक परतों में किवाड़ खुलते हैं तथा मनोरंजक ढंग के कहानियां दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत होते हैं। ये सभी किवाड़ क्रमवार विशेष युक्ति से ही खुलते हैं। जब मैंने एक बक्से के किवाड़ खोलने का प्रयत्न किया, मैं बीच में ही उलझ कर रह गयी। मेरी उलझन देख कारीगर का मुख मंदहास से खिल उठा। मेरे उत्साह को जीवित रखते हुए उसने मुझे बताया कि किंचित अभ्यास के पश्चात इसे क्रमवार खोलना अत्यंत आसान हो जाता है।

ये कावड़ क्या है?

कावड़, अर्थात् लकड़ी का वह रंगीन बक्सा रुपी खिलौना जो स्वतः में अनेक कथाएं समेटे हुए है, वास्तव में एक तीर्थ है। अधिकतर कथाएं महाकाव्य रामायण तथा महाभारत से सम्बन्ध रखती हैं। तथापि कुछ अवसरों पर इनमें स्थानीय लोक कथाओं, जैसे संतों तथा महापुरुषों के जीवन का भी चित्रण आप देख सकते हैं। इन्हें आप चलता फिरता देवस्थान भी कह सकते हैं। जहां तक कावड़ की जन्मस्थली मेवाड़ की चर्चा करें, वहां इसका मुख्यतः उपयोग वंशावलियों समेत पारिवारिक गाथाओं को दर्शाने में किया जाता है।

आईये, देखते हैं कावड़ की बनावट कैसी है। अगर इसे ध्यान से देखें तो आपको लकड़ी के कई कब्जेदार किवाड़ दिखाई देंगे जिन पर विभिन्न कथाएं कहते चित्र दृष्टिगोचर होंगे। प्रथम फलक पर अधिकतर, कथानक के संरक्षक चित्रित किये जाते हैं। उदाहरणतः मैंने जिस कथा का ध्यानपूर्वक निरिक्षण किया, उस के मुख्य फलक पर जय तथा विजय चित्रित किये गए थे। कथाकार क्रमशः प्रत्येक किवाड़ खोलते हुए वहां चित्रित कथा का वाचन करता है। एक एक कर जब सब किवाड़ खुल जाएँ तब इस देवस्थान रुपी कावड़ का गर्भगृह प्रकट होता है जहां इस देवस्थान के पीठासीन देव चित्रित होते हैं। यह बाह्य जगत से भीतरी जगत की ओर दृश्य-श्रव्य यात्रा के सामान है। ठीक उसी प्रकार जैसे आप एक वास्तविक मंदिर के भीतर प्रवेश करते हुए उसके गर्भगृह तक पहुंचते हैं। तो हुआ ना कावड़ भी एक देवस्थान!

कावड़ कलाकारों का समुदाय

कावड़ परंपरा से तीन मुख्य समुदाय जुड़े हुए हैं। सुतार समुदाय लकड़ी के रंगबिरंगे मञ्जूषा रुपी कावड़ निर्मित करते हैं तो कावड़िया भट समुदाय इसका उपयोग पौराणिक कथाएं बाँचने में करते हैं। तीसरा समुदाय, यजमान अर्थात ग्राहक हैं जो इन कथाओं का श्रवण करता है।

मुझे बताया गया कि कथा बाँचने की यह प्रथा लगभग ४०० वर्ष प्राचीन है। हालांकि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रथा इससे भी प्राचीन हो सकती है। हाँ, इसका प्रलेखन ४०० वर्षों पूर्व किया गया होगा।

सुतार समुदाय

मेरे अनुमान से केवल सुतार समुदाय ही एकमात्र ऐसा समुदाय है जो कावड़ निर्माण में लिप्त है। बढ़ई समाज के ये कारीगर अधिकतर राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में, चित्तौड़-कोटा मार्ग पर स्थित बस्सी गाँव के निवासी हैं। ऐसा माना जाता है कि १६वीं. सदी में देवगड़ के राजकुमार जयमल इन कारीगरों को राजस्थान के शेखावती क्षेत्र के नागौर शहर से लाये थे। सुतार समुदाय के कारीगरों को बसयती भी कहा जाता है। कदाचित बस्सी ग्राम के निवासी होने के कारण उन्हें ऐसा कहा जाता होगा। यद्यपि वे स्वयं को देवलोक के वास्तुशिल्पकार विश्वकर्मा के वंशज मानते हैं। वही विश्वकर्मा जिन्होंने ना केवल ब्रम्हांड की रचना की, अपितु श्री कृष्ण की स्वर्ण नगरी द्वारका का भी निर्माण किया था।

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि सुतार कावड़ बनाने में नीम वृक्ष की लकड़ी का उपयोग करते हैं। इसे बनाने में मूलतः लाल रंग का उपयोग किया जाता था। ग्राहकों के आग्रह पर अब अन्य रंगों का भी प्रयोग किया जा रहा है।

कावड़िया भट

जहां एक ओर सुतार पौराणिक कथाओं को इन कावड़ों पर सजीव करते हैं, वहीं दूसरी ओर कावड़िया भट इन कावड़ रुपी देवस्थान को यजमानों अथवा ग्राहकों के घर ले जाते हैं। यजमानों को कथाएं सुनाकर दक्षिणा ग्रहण करते हैं। इसे कावड़ बाँचना कहते हैं। यही उनकी जीविका का इकलौता साधन भी है। वैसे तो श्रद्धालु स्वयं मंदिर जाकर भगवान् के दर्शन करते हैं, किन्तु यहाँ विपरीत प्रथा है। यहाँ देव कावड़ रुपी मंदिर में समाकर भक्तों के घर जाकर उन्हें दर्शन देते हैं। है ना अनोखी प्रथा!

कावड़ कलाकार दिल्ली में
कावड़ कलाकार दिल्ली में

कावड़ का एक और महत्वपूर्ण उपयोग है पारिवारिक इतिहास संरक्षण। कावड़िया भट वास्तव में पारंपरिक वंशावली विशेषज्ञ होते हैं जो कथा बाँचने के साथ साथ वंशावली अध्ययन का भी कार्य करते हैं। कावड़ के रंगबिरंगे किवाड़ों पर यजमान के पारिवारिक इतिहास को विस्तारपूर्वक दर्शाया जाता है। उनके पूर्वजों की गाथाएँ बांच बांच कर कावड़िया भट अपनी जीविका चलाते हैं। आपको यह जानकर अचरज होगा कि यह परिवार, कावड़िया भट को पीढी दर पीढी विरासत में प्राप्त होते हैं।

अतः कावड़ एक अप्रतिम प्रथा है, जो वैयक्तिक इतिहास को संजोकर रखने के साथ साथ किसी की जीविका का साधन भी बनती है। मैं जब इन कावड़ों के सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा कर रही थी, तब मैंने जाना कि हमारे पूर्वजों के पास ग्रामीण स्तर पर इतनी त्रुटिहीन अभिलेखन प्रणाली थी। गाँव के एक एक परिवार की वंशावली संजोकर रखी जाती थी। कालान्तर में ना जाने कब, कहाँ और कैसे हमने इस महत्वपूर्ण प्रथा को खो दिया।

कावड़िया भट समुदाय ने इस कथा वाचन प्रथा को विस्तृत प्रसिद्धी दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वे गाँव गाँव भ्रमण करते हैं तथा दर्शकों को कावड़ रुपी देवस्थान के दर्शन कराते हुए उन्हें सम्बंधित पौराणिक कथाएं सुनाते हैं। इसका लाभ उन्हें भी प्राप्त होता है। जब जब वे किवाड़ खोलते हैं, उस किवाड़ पर भक्तों से दान दक्षिणा की आशा रखते हैं। कुछ बुद्धिमान कथा वाचक भक्तों को कथा में पूर्णतः लिप्त कर ऐसे क्षण पर अल्पविराम लेते हैं जहां भक्तों की जिज्ञासा चरम सीमा पर आ जाती है। भावनावश भक्त भरपूर उदारता से दान दक्षिणा करते हैं।

मेरे अनुमान से इस मञ्जूषा का नाम कावड़ उन किवाड़ों के कारण पड़ा जिन्हें क्रमशः खोलते हुए कावड़िया भट कथा बांचते हैं। किवाड़ अर्थात् द्वार। अंततः कावड़ उन किवाड़ों का समूह है जो अपने में सम्पूर्ण कथा समेटे हुए है। कुछ लोग इस का अर्थ काँधे पर उठाने को भी मानते हैं। स्मरण कीजिये उन कांवड़ियों को जो गंगाजल को काँधे पर उठाकर गाँव के मंदिर तक पहुंचाते हैं। आशा है हमारी युवा पीढ़ी इन कलाओ के नए नए उपयोग ढूंढती रहेगी।

वर्तमान में कावड़ का महत्त्व

जब कावड़िया भट मुझे एक कावड़ कथा सुना रहे थे, मैंने उनका एक लघु चलचित्र निर्मित किया था। वही विडियो उपरोक्त आपके लिए भी प्रस्तुत है। कथा पूर्ण करने के पश्चात भटजी ने मुझे बताया कि वर्तमान में इन कावड़ों को शिक्षा सम्बन्धी प्रयोजनों हेतु भी निर्मित किया जाता है। उदाहरणतः बालवर्ग के शिशुओं को अक्षर ज्ञान प्रदान करने के लिए वे कावड़ बनाते हैं जिन पर रंगबिरंगे अक्षर तथा उनसे सम्बंधित वस्तुएं चित्रित किये जाते हैं। प्राचीन कलाओं को नवीन रूप में प्रस्तुत करने ही यह कलाएँ जीवित और उपयोगी रह सकती हैं।

कुछ सूक्ष्म आकार के कावड़ आप ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं।

बैंगलोर मिरर में प्रकाशित एक लेख द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि नवीन युग के कुछ कथा लेखक अपनी कथा प्रस्तुति के लिए स्वयं के कावड़ों की अभिकल्पना रच रहे हैं। संत कबीर के दोहे प्रस्तुत करने हेतु निर्मित कावड़ एक अद्भुत रचना थी।

मैं ह्रदय से उन सबका धन्यवाद करना चाहती हूँ जिनके कारण राजस्थान में यह कावड़ निर्मिती व बाँचने की प्रथा अब भी जीवित है। समयानुसार नवीन तथा ज्वलंत विषयों पर भी कावड़ निर्मिती की जा रही है जो आधुनिक समाज के दर्शकों हेतु अति उपयुक्त सिद्ध हो रही हैं।

सन्दर्भ – भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई (IITB) द्वारा प्रकाशित लेख

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    राजस्थान की प्राचीन लोक कला-संस्कृति से रूबरु कराती एक और नायाब प्रस्तुति ! प्रस्तुत विडियो देखने के बाद ही “कावड” की बनावट तथा “कावड” कथा वाचन-शैली भलीभातिं समझी जा सकती हैं । सैकडों वर्षो पहले हमारे पुरखों द्वारा पौराणिक महाकाव्यों को इस अनुठी शैली से जन जन तक पहुंचाना तथा इससे जिविकोपार्जन करना अचंभित करने के लिये पर्याप्त है । प्रसन्नता की बात है कि राजस्थान की इस अनुठी लोक कला को,आज के आधुनिक दौर में भी,जीवित रखने के प्रयास किये जा रहे है ।राजस्थान की इस प्राचीन लोक कला से परीचय कराती सुंदर प्रस्तुति के लिये धन्यवाद !

    • प्रदीप जी – भारत के कोने कोने में ऐसी बहुत सी कलाएं है जो लुप्त हो रही हैं, आशा है हम इन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए बचा के रख पाएंगे।

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