नाको हिमाचल प्रदेश – एक पवित्र झील और प्राचीन मठ

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नाको - हिमाचल प्रदेश का एक आदर्श गाँव
नाको – हिमाचल प्रदेश का एक आदर्श गाँव

नाको एक छोटा सा बौद्ध ग्राम है जो स्पीति घाटी के किनारे एक दूरस्थ पहाड़ी पर बसा हुआ है। वैसे तो यह गाँव किन्नौर जिले में पड़ता है, लेकिन यहाँ का रहन-सहन सबकुछ अधिकतर स्पीति घाटी की संस्कृति से मिलता-झूलता है। जब हम नाको जा रहे थे, तो मुझे उसके बारे में सिर्फ इतना पता था कि, वहाँ पर पुराना मठ और एक सुंदर झील है। मैंने सोचा कि यह बहुत से ट्रेकिंग के मार्गों का प्रस्थान बिन्दु होगा, जो कि वह वास्तव में है। तथापि नाको में एक बहुत ही अनोखी बात थी जो मेरा इंतेजार कर रही थी।

नाको या किसी लक्ष्यहीन स्थल की यात्रा   

किन्नर शिविर से नाको गाँव
किन्नर शिविर से नाको गाँव

नाको गाँव तक की हमारी यात्रा बहुत ही लुभावनी थी। हमारे बाकी के हिमाचल सफर की तुलना में यहाँ की सड़कें अपेक्षाकृत अच्छी थीं। स्पीति घाटी के नजदीक पहुँचते-पहुँचते आप देख सकते हैं कि वहाँ की पहाड़ियों का हरितआवरण लुप्त होते-होते अंत में एकदम जीर्ण सी अवस्था में रह जाता है। रेत के विशाल टीलों जैसे दिखने वाली इन पहाड़ियों को देखते ही सबसे पहले आपके मन में यही एक शब्द आता है ‘नग्न’।

ये भंगुर पर्वत मालाएँ हैं, जहाँ से छोटे-छोटे पत्थर हमेशा सड़कों पर गिरते रहते हैं। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) इन पत्थरों को रास्ते पर से निकालकर इन सड़कों को साफ और सुरक्षित रखने का बहुत बढ़िया काम कर रहा है। लेकिन इन विराट पर्वत मालाओं से लड़ते समय उन्हें बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनका यह काम काबिले तारीफ है। मुझे याद है कि नाको की यात्रा के दौरान मुझे ऐसा लगा जैसे हम किसी लक्ष्यहीन स्थान की ओर जा रहे हैं। मीलों तक हमे उस रास्ते पर दूसरी कोई गाड़ी नहीं दिखी। ऐसा लग रहा था जैसे इन रास्तों की कोई मंजिल ही न हो। यह सिर्फ तर्कशील बुद्धि ही थी जो कह रही थी कि अगर रास्ता है तो घर और मनुष्यों का वास भी जरूर होगा।

नाको की पहली झलक

कुछ देर बार हमे दो अलग-अलग पहाड़ियों की चोटियों पर बसे दो गाँव दिखे जो लगभग चोटी पर बैठे हुए से लग रहे थे। थ। इन गांवों की बौद्ध विशेषताएँ हवा में लहरा रहे रंगबिरंगी प्रार्थना के ध्वजों से स्पष्ट झलक रही थीं। हो सकता है कि शायद ध्वज लगाने की यह प्रथा गाँव के अस्तित्व को दर्शाने का तथा उसकी रक्षा करने का एक तरीका है।

नाको पहुँचने के बाद हमने आस-पास के लोगों से किन्नर शिविर के बारे में पूछा। इस लंबे सफर के बाद हम बहुत थक गए थे और थोड़ा आराम करना चाहते थे। हम गाँव के अंतिम छोर तक पहुंचे जहाँ से आप प्रसिद्ध नाको झील का सुंदर दृश्य देख सकते हैं और गाँव के मनोरम नज़ारे का आनंद उठा सकते हैं। हाथ-मुह धो कर थोड़ा आराम करने के बाद मैंने वहाँ पर पूछताछ की कि अगर मुझे गाँव की सैर कराने तथा वहाँ का प्रसिद्ध मठ दिखाने के लिए कोई गाइड मिल सकता है। और उन्होंने तुरंत मेरा परिचय प्रेम सिंह से कराया जिन्हें साहिल नाम से बुलाना ज्यादा पसंद था। उसने हमारे सफर की शुरुआत नाको शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में बताते हुए की। नाको शब्द की व्युत्पत्ति तिब्बती शब्द ‘नेगो’ से हुई है, जिसका अर्थ है तीर्थ का द्वार या किसी पवित्र स्थान तक जाने का मार्ग।

नाको झील
रमणीय नाको झील
रमणीय नाको झील

हमने अपनी पदयात्रा नाको झील से प्रारंभ की, क्योंकि मैं अंधेरा होने से पहले इस झील की परिक्रमा करना चाहती थी। जब हम झील के पास पहुंचे तो मैंने देखा कि यह झील मेरी अपेक्षा के विपरीत बहुत ही छोटी थी। गाँव के एक तरफ बसी इस छोटी सी अंडाकार झील की चारों ओर छोटी सी पगडंडी बनी हुई थी। इसके चारों ओर खड़े पेड़ झील के पानी में प्रतिबिंबित हो रहे थे जिसके कारण झील का पानी हरा होने का आभास हो रहा था लेकिन मुझे याद है कि इस झील की जो तस्वीरें मैंने देखी थीं उनमें तो यह साफ नीली झील थी।

नाको झील को एक पवित्र झील माना जाता है। कहा जाता है कि सालों पहले गुरु पद्मसंभव यहाँ पर तपस्या करने बैठे थे। किसी को भी इस पावन झील में मछली पकड़ने, स्नान करने या पैर तक डुबोने की अनुमति नहीं है।

नाको झील एक प्रकृतिक झील है, जो बारिश के मौसम में पूरी तरह से भरी होती है और सर्दियों के मौसम में उसका पानी कम हो जाता है। पानी का स्तर कम होने से झील में उगने वाले पेड़ों को आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यह छोटी सी सैर सच में बहुत ही सुखदायक है। बीच-बीच में यहाँ-वहाँ आपको पानी की छोटी-छोटी धाराएँ पार करनी पड़ती हैं जो जिन्हें पार करते हुए आपको अपने पैर पानी में डुबाने ही पड़ते हैं। अगर आप पवित्र स्थानों में विश्वास करते हैं तो, शायद आपको अपना आशीर्वाद देने का यह उनका अनोखा तरीका है।

गुरु पद्मसंभव
गुरु पद्मसंभव के पदचिन्ह
गुरु पद्मसंभव के पदचिन्ह

नाको झील देखने के पश्चात हम गुरु पद्मसंभव के पदचिह्न देखने के लिए गाँव की ओर बढ़े, जो 6ठी-8वी सदी में निर्मित मंदिर के भीतर सुरक्षित हैं। बाहर से तो यह मंदिर काफी साधारण दिखता है। इसके भीतर गुरु पद्मसंभव की मूर्ति स्थापित है और वहीं पर स्थित एक पत्थर पर उनके पदचिह्न हैं। वहाँ पर एक रंगीन विशाल प्रार्थना चक्र भी है जो भक्तों द्वारा लगातार घुमाया जाता है।

नाको मठ

नाको का बौद्ध मठ
नाको का बौद्ध मठ

रींचेन जेंगपो जिन्हें रत्न भद्र भी कहा जाता है, को महान अनुवादक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने सभी बौद्ध शास्त्रों को संस्कृत से तिबत्ती भाषा में अनुवादित किया था। माना जाता है कि 11 सदी के दौरान उन्होंन इस क्षेत्र में 108 मठों की स्थापना की थी और नाको मठ उन्हीं में से एक है। नाको में दो ऐसे मंदिर हैं जिन्हें बहुत ही अच्छे तरीके से संरक्षित किया गया है। इनमें से मुख्य मंदिर 5 ध्यानी बौद्धों को समर्पित किया गया है, जिन्हें अपने अभिहित रंग से दर्शाया गया है :

  • अक्षोभय – नीला
  • अमिताभ – लाल
  • वैरोचन – सफ़ेद
  • रत्नसंभव – पीला
  • अमोघसिद्धि – हरा

यहाँ की दीवारों पर आप प्रचुर चित्रकारी देख सकते हैं। बायीं तरफ वैरोचन मंडल बना हुआ है और दाहिने तरफ बुद्ध मंडल बना हुआ है। ये चित्र नाको मठ के निर्माण काल के समय यानी 11वी सदी में बनवाए गए थे। ऐसी स्थिति में यह सोचना गलत नहीं होगा कि इन चित्रों को वैसे ही बनाए रखने के लिए बाद के वर्षों में उनका सुधारणिकरण किया गया होगा। यहाँ पर पीली तारा का एक मंदिर है, जिसके साथ 8 औषधि बौद्ध हैं। पीली तारा वैद्यों या चिकित्सकों के अभिभावक देवी हैं। यहाँ पर गाँव की स्थानीय भाषा यानी कि बोटी भाषा में एक मण्डल है।

हिमाचल के नाको गाँव का नया मठ
हिमाचल के नाको गाँव का नया मठ

हाल ही में यहाँ पर एक नया मंदिर बनवाया गया है। यह तब बनवाया गया था जब दलाई लामा यहाँ पर आए थे और 7 दिनों के लिए यहाँ पर रुके थे। लगता है जैसे यहाँ के प्रत्यके गाँव में दलाई लामा के लिए एक नया मठ बनवाया गया था, ताकि अगर कभी भी वे उनके गाँव में आए तो वहाँ पर रह सके।

नाको गाँव की सैर

गाँव में घूमते हुए, मैंने देखा कि वहाँ के घरों की दीवारें सफ़ेद रंग की थीं और उनकी खिड़कियों और दरवाजों की चौखटें काले–नीले रंग की थीं। इन गलियों से गुजरते हुए मुझे एहसास हुआ कि अगर ज्यादा नहीं तो यहाँ पर उतने ही पशु थे जितने कि मनुष्य। घरों के आस-पास से गुजरती ये संकीर्ण गलियाँ पशुओं के मलमूत्र से भरी हुई थीं। यह गंध मेरे नथुनों में इस प्रकार भर गयी थी कि आस-पास वह बदबू न होने के बावजूद भी में उसे महसूस कर पा रही थी। यहाँ रास्ते पर यहाँ-वहाँ कुदरती खाँचो वाले पत्थर रखे गए थे जिनमें पशुओं के लिए चारा – पानी रखा जाता था।

नाको की कच्ची पक्की सड़कें
नाको की कच्ची पक्की सड़कें

नाको गाँव के लोग मुख्य फसल के रूप में आलू और मटर की खेती करते हैं। इसके अलावा यहाँ पर देशव्यापी राजमा भी उगाए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में जैसे ही सेबों का राज्य खत्म होता है मटर का राज्य आरंभ होता है। नाको में स्थित पुराने घरों के दरवाजों की अलंकृत रूप से उत्कीर्णित चौखटें बहुत ही मनमोहक है। यहाँ-वहाँ स्थित प्रार्थना-चक्र गांववालों की धार्मिकता को उजागर कर रहे थे। लोग इन चक्रों के पास से गुजरते हुए आदत के चलते अनजाने ही उन्हें घुमाते हुए आगे बढ़ते थे।

नाको गाँव के काष्ठ द्वार
नाको गाँव के काष्ठ द्वार

मैंने देखा कि नाको में जगह-जगह पर पाए जाने वाले मंत्र उत्कीर्णित पत्थरों के ढेर के समान हर जगह सोलर पेनल्स लगे हुए थे। कुछ घरों पर तो स्पीति ईकोस्फियर द्वारा तख्ते भी लगाए गए थे जिन पर लिखा था कि वे ‘सोलर पेसिव हाउस’ हैं। जिसका अर्थ यह है कि ये घर जलाऊ लकड़ी का कम प्रयोग करते हैं जिसके चलते कार्बन का कम उत्सर्जन होता है।

नाको युवा क्लब  

मेरे गाइड साहिल ने मुझे इस पूरे सफर क दौरान नाको युवा क्लब और उसकी गतिविधियों के बारे में बताया। इस क्लब के सदस्य पर्यटकों को गाँव की सैर कराने और ट्रेक पर ले जाते हैं जिस के लिए कुछ निर्धारित शुल्क होता है। इससे इकट्ठा की गयी निधि फिर गाँव के विकास के लिए इस्तेमाल की जाती है।

नाको यूथ क्लब का कार्यालय
नाको यूथ क्लब का कार्यालय

गाँव में प्रवेश करते ही आप रास्ते में लगा हुआ तंबू देख सकते हैं जिसपर लगा हुआ तख़्ता बताता है कि यह युवा क्लब का कार्यालय है। बाद में मुझे एहसास हुआ है कि, गाँव में प्रवेश करते समय जब हमारी गाड़ी वहाँ के पत्थरिले रास्ते में फंस गयी थी तब इसी क्लब के सदस्यों ने हमे अपनी गाड़ी निकालने में मदद की थी।

युवा क्लब की गतिविधियां

हमारा सफर समाप्त होने के पश्चात मैंने साहिल के साथ बैठकर इस युवा क्लब की गतिविधियों और कार्य विधियों के बारे में थोड़ा-बहुत जानने की कोशिश की। उनके कार्यों के बारे में सुनकर मैं सच में बहुत प्रभावित हुई। वे अपनी सेवाओं के लिए यथोचित शुल्क लेते हैं, जैसे 50/- रु. प्रति व्यक्ति जिसमें वे आपको पूरे गाँव की सैर करवाते हैं जो लगभग 1 घंटे की होती है। सामान्य तौर पर वे एक समय पर ज्यादा से ज्यादा 3-4 चार लोगों को ही ले जाते हैं, तथा वे एक अकेले व्यक्ति को भी ले जाते हैं जैसे वे मुझे ले गए थे।

नाको यूथ क्लब द्वारा लगाया गया घंटा
नाको यूथ क्लब द्वारा लगाया गया घंटा

पास में स्थित ‘टर्टल रॉक’ की पूरे दिन की यात्रा के लिए वे 200/- रु. प्रति व्यक्ति लेते हैं, और 2-3 दिनों के ट्रेक के लिए 500/- प्रति व्यक्ति लेते हैं। इस क्लब के गाइड्स को हिमाचल पर्यटन द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। मैंने वहाँ पर लगे तख्ते देखे जिनपर लिखा था कि बस स्थानक जैसी जगहों पर पर्यटकों के वाहन रखना मना है तथा मठ या झील के पास धूम्रपान करना मना है। इन तख्तों पर यह भी लिखा गया था कि गाँव में किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नाको युवा क्लब द्वारा सामाजिक योगदान

नाको युवा क्लब द्वारा इकट्ठा की गयी धन राशि गाँव की साफ-सफाई करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। इन पैसों से उन्होंने पहाड़ी के ऊपर एक सुंदर सी घंटी भी लगवायी है – जो अब इस छोटे से गाँव का प्रतिकात्मक तत्व बनती जा रही है। गाँव में घूमते समय उसने मुझे क्लब द्वारा स्थापित की गई विविध कचरे की पेटियाँ दिखाई; तथा उनके द्वारा गाँव में वितरित कपड़े की थैलियाँ भी दिखाई जो पुराने पॉलिथीन बेग्स के स्थान पर इस्तेमाल किए जाते हैं। वास्तव में मुझे गाँव की सैर कराते समय साहिल रास्ते पर पड़ा हुआ कचरा उठाते हुए आगे बढ़ रहा था। रास्ते में हमे उसकी माँ भी मिली जिन्हें निश्चित रूप से अपने बेटे पर बहुत गर्व होगा। नाको की यह यात्रा सच में मेरे लिए बहुत ही संतोषजनक थी।

नाको गाँव प्राचीन विरासत और धार्मिक मूल्यों को साथ लेकर चलते हुए बेहतरीन जीवन के लिए आधुनिक विचारों और तकनीकों को अपने दैनिक जीवन में ढालते हुए विकास की ओर बढ़ानेवाला एक सुंदर उदाहरण है।

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