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पटियाला धरोहर यात्रा- पंजाब की राजसी नगरी की सैर

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पटियाला से मेरी बाल्यकाल की स्मृतियाँ जुडी हुई हैं। बचपन में वहां आना जाना लगा रहता था। यहाँ के स्वादिष्ट सूत के लड्डू अब भी मेरे मुँह में पानी ले आते हैं। पटियाला अपने रंगीन बाज़ारों के लिए तो जाना ही जाता है, यहाँ से आप खरीददारी किये बिना नहीं लौट सकते। जब मैंने पंजाब पर्यटन विभाग की विवरणिका में पटियाला के विरासती स्थलों की पदयात्रा के विषय में पढ़ा, मैंने इसे अपनी इच्छा सूची में तुरंत सम्मिलित कर लिया था। इस बार जब दिल्ली जाने का अवसर आया तो मैंने पटियाला एक बार फिर देखने का मन बना लिया।

तो आइये मेरे साथ, पटियाला के इस विरासती पदयात्रा का आनंद उठाने के लिए:

शाही समाधान – पटियाला

शाही समाधान - पटियाला
शाही समाधान – पटियाला

इसे आप एक विडम्बना ही कहिये कि पटियाला के विरासती स्थलों की पदयात्रा का आरम्भ होता है एक समाधि स्थल से। पटियाला के राजपरिवार का समाधि स्थल है यह शाही समाधान। पटियाला के निर्माता बाबा आला सिंह की समाधि, शाही समाधान की मुख्य इमारत के भीतर स्थित है। इसके पृष्ठ भाग में राजपरिवार के अन्य सदस्यों की छत्रियाँ अर्थात् समाधियाँ हैं।

संगमरमर पर तराशे सूचना पटल पर इस स्मारक के विषय में कुछ यह लिखा था – स्वर्गीय महाराज आला सिंह साहिब बहादुर की समाधि। इनका स्वर्गवास संवत १८२२ में हुआ था।

शाही समाधान की मुख्य इमारत मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला का जीवंत उदाहरण है। इसके भीतर एक मुख्य कक्ष है जिसके बीचों बीच बाबा आला सिंह की समाधि है। इस समाधि के ऊपर उनकी स्मृति में चढ़ाए गए वस्त्रों का अम्बार लगा हुआ था। इस अम्बार के ऊपर बाबा आला सिंह का एक छोटा चित्र रखा हुआ था। उनका एक विशाल चित्र एक भित्त पर भी लटकाया हुआ था।

मुख्य कक्ष के चारों ओर एक गलियारा है। यह सम्पूर्ण संरचना एक मंच के ऊपर निर्मित है जिसके कोनों पर छोटी छोटी छत्रियाँ निर्मित हैं।

शाही समाधान - पटियाला की छत पर संगमरमर का चबूतरा
शाही समाधान – पटियाला की छत पर संगमरमर का चबूतरा

बाबा आला सिंह के राजपरिवार की अगली पीढी के अन्य सदस्यों की छत्रियाँ मुख्य इमारत के पृष्ठ भाग पर निर्मित हैं। इनमें करण सिंह तथा नरिंदर सिंह के अलावा अन्य किसी भी छतरी पर नाम पट्टिका उपस्थित नहीं थी। हाल ही में स्वर्गवासी राजमाता का अंतिम संस्कार भी यहीं किया गया था।

शाही समाधान का सर्वाधिक आकर्षक भाग है इसके ऊपर श्वेत संगमरमर में निर्मित एक खुला प्रांगण। इसके उद्देश्य की जानकारी मुझे नहीं मिल पायी। समाधि स्थल के ठीक ऊपर निर्मित होने के कारण कोई यहाँ पाँव नहीं रखता। अतः मैं सोच में पड़ गयी कि यह केवल सुन्दरता में वृद्धि करने का एक साधन है अथवा यह उस काल के युद्ध ग्रस्त पंजाब की किसी गाथा का बखान करता एक स्मारक है।

बाबा आला सिंह कौन हैं?

बाबा आला सिंघ की समाधी - शाही समाधान
बाबा आला सिंघ की समाधी – शाही समाधान

बाबा आला सिंह पटियाला के प्रथम सत्तारूढ़ प्रमुख थे जिनका जन्म भाई राम सिंह के तृतीय पुत्र के रूप में सन १६९१ में हुआ था। उनके कार्यक्षेत्र फुलकियां के अंतर्गत आज के पटियाला, नाभा तथा जींद क्षेत्र सम्मिलित थे। राज्य की प्रजा के संरक्षण के लिए उन्होंने कई छोटे युद्ध भी लढ़े थे। उन्होंने सन १७४५ में कच्चा पटियाला की स्थापना की थी। कालान्तर में उनके महल के चारों ओर एक गढ़ का निर्माण किया गया। किला मुबारक नामक यह गढ़ पटियाला नगर के ह्रुदय में स्थित एक विशाल दुर्ग है। शनैः शनैः आला सिंह की गद्दी प्रसिद्ध होती गयी और इस प्रकार एक वंश का उद्भव हुआ।

क्या आप जानते हैं पटियाला शब्द की व्युत्पत्ति कहाँ से हुई? पटियाला का अर्थ है आला की पट्टी अर्थात आला सिंह की भूमि।

बाबा आला सिंह का एक प्रसिद्ध व्याख्यान है जिसमें उन्होंने बताया कि एक समय अहमद शाह ने उन्हें अपने केश काट देने का आदेश दिया था। परन्तु आला सिंह ने उत्तर दिया था कि वे एक सच्चे सिख हैं। सिर कटा सकते हैं किन्तु अंत तक केश की रक्षा करेंगे। अंततः अहमद शाह ने आला सिंह द्वारा १,२५,००० रु. के भुगतान के पश्चात अपना आदेश वापिस ले लिया था। कदाचित धन ऐंठने की यह एक चाल थी।

कुछ क्षण शाही समाधान में व्यतीत करने के पश्चात हम वहां से जब बाहर निकले, पटियाला के इतिहास सम्बंधित जानकारी से हमारा ज्ञानभण्डार कुछ और संपन्न हो चुका था।

पटियाला की प्राचीन कोठियां

पटियाला के पुराने घर
पटियाला के पुराने घर

यहाँ से आगे बढ़ते हुए हमने कई प्राचीन कोठियों के दर्शन किये। इनमें कई कोठियां विस्तृत जालीदार मुंडेर से सज्ज थे।

पम्मी पूरियाँ वाला

पम्मी पूरियां वाला - पटियाला
पम्मी पूरियां वाला – पटियाला

पम्मी पूरियाँवाला हमारे विरासती पदयात्रा का दूसरा पड़ाव था। आप इसे विनोद समझकर हंस रहे होंगे। जी हाँ! पम्मी पूरियाँ वाला एक ३० से ४० वर्ष पुरानी दूकान है जो गर्मागर्म स्वादिष्ट पूरियाँ, छोले भठूरे तथा कद्दू की सब्जी के लिए मशहूर है। यूँ तो हमने इस पदयात्रा के पूर्व जलपान ग्रहण किया था। किन्तु यहाँ आयें तथा पूरियों का स्वाद ना चखें, यह कैसे हो सकता है। यद्यपि इन पूरियों को चखने के पश्चात भी मेरी सूत के लड्डू चखने की अभिलाषा ज्यों की त्यों थी।

आप सब मेरी बात से सहमत होंगे कि अपने समक्ष भोजन बनते देखना तथा गर्मागर्म पूरियों का सीधे आपकी थाली में परोसा जाना, इसका आनंद अतुलनीय होता है।

सुझाव: पटियाला विरासती पदयात्रा के पूर्व जलपान ग्रहण ना करें। यहाँ आकर पटियाला प्रकार से व्यंजनों का आनंद लेते यह पदयात्रा पूर्ण करें।

हवेली वाला मुहल्ला

हवेली वाला मुहल्ल्ले के द्वार
हवेली वाला मुहल्ल्ले के द्वार

ऊंची हवेलियों के मध्य स्थित संकरी गली पर जैसे ही हमने प्रवेश किया, मेरी स्मृति में बीकानेरी हवेलियों की छवि ताजा हो गयी। यूँ तो यह हवेलियाँ बीकानेरी हवेलियों की तरह भव्य नहीं हैं, तथापि इनके प्रवेशद्वार अत्यंत भव्य हैं। अधिकतर हवेलियों के द्वार लकड़ी पर नक्काशी कर बनाए गए हैं। यहाँ तक कि द्वार के चौखट भी अत्यंत चौड़े तथा आकर्षक हैं। निरपवाद रूप से द्वार के ऊपर गणेश की प्रतिमा उत्कीर्णित है।

कुछ झरोखे तथा उनके चौखट भी अत्यंत आकर्षक हैं, यद्यपि इन्हें देखने हेतु गर्दन ऊंची करनी पड़ती है। द्वारों पर पुता नीला धूसर रंग पटियाला का पसंसीदा रंग प्रतीत होता है।

इतनी आकर्षण हवेलियों को निहारना आसान नहीं था। संकरी गलियों में बिजली की तारें लटकी हुई थीं। दुपहिया वाहन तथा पैदल चलने वाले धक्का-मुक्की करते गली पार कर रहे थे।

मोहल्ले में कई छोटे-बड़े मंदिर भी थे। मैंने भी एक शिव मंदिर के दर्शन किये। यह एक छोटा सा मंदिर था। इसमें स्थापित शिवलिंग मार्ग से भी दिखाई देता है। मंदिर के चारों ओर एक संकरा परिक्रमा पथ है। मैं अन्य मंदिरों के दर्शन नहीं कर पायी क्योंकि उनके पाट उस समय बंद थे।

हवेली वाला मुहल्ला पटियाला के जानी-मानी हस्तियों का निवास स्थान है। कई परिवारों के पुरखे महाराजा के दरबार में सेवारत थे। पटियाला से आने वाले कई मंत्रियों के पुश्तैनी निवास भी हवेली वाला मुहल्ले में स्थित है। मुझे यहाँ कई जैन परिवार भी निवास करते दिखाई दिए।

छत्ता नानुमल

छत्ता नानुमल एक मुक्त चापाकार संरचना है जहां पटियाला के तत्कालीन दीवान आम जनता की शिकायतों को सुना करते थे। उन्ही के नाम पर इसका नामकरण भी किया गया है।

वर्तमान में यह एक गलियारा सदृश संरचना प्रतीत हो रही थी जो कई अनोखे किस्से कहानियां अपनी भित्तियों में संजोये हुए थी।

बर्तन बाजार

पटियाला धरोहर यात्रा - मानचित्र
पटियाला धरोहर यात्रा – मानचित्र

जैसे ही आप दालान जैसे छत्ता नानुमल से बाहर निकलें, आप अपने चारों ओर चमचमाते पीतल तथा स्टील के बर्तनों का भण्डार पायेंगे। जी हाँ! यह पटियाला का प्राचीन बर्तन बाजार है। सुदूर एक कोने में रंगकार परंपरागत पद्धति से पगड़ियां रंग रहे थे। दूसरे कोने में कलईवाले पीतल के बर्तनों को कलई कर चमका रहे थे। दुकानों के समक्ष लटकाए गए रंग-बिरंगे दुपट्टे इस परिदृश्य को चार चाँद लगा रहे थे। बड़े शहरों में तो यह आजकल मुश्किल से ही देखने को मिलता है।

हम प्रातःकाल ही पटियाला विरासत पदयात्रा करते यहाँ पहुंचे थे। अतः बर्तन बाजार में भी अब तक खरीददारों की भीड़-भाड़ आरम्भ नहीं हुई थी। दुकानों में विक्रेता अभी दुकान ज़माने में ही लगे हुए थे। उन्होंने हमें भरपूर छायाचित्रकारी करने का सुअवसर दिया तथा हमारे प्रत्येक शंका एवं प्रश्नों का ख़ुशी ख़ुशी उत्तर दिया।

मेरे अनुमान से यह कदाचित पटियाला निवासियों का पुश्तैनी जगप्रसिद्ध आथित्य-सत्कार ही है जो वे मुक्त ह्रदय से सबका स्वागत करते हैं। यहाँ तक कि मेरे उन्हें खरीददारी की अरुचि दर्शाने के उपरांत भी उनके सत्कार में मैंने कोई अंतर अनुभव नहीं किया। इसके विपरीत वे मेरी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। चाय नाश्ते का आग्रह कर रहे थे। कहाँ प्राप्त होगी ऐसे भलमनसाहत तथा आवभगत!

दीवान देओड़ी

यह एक आकर्षक प्रवेशद्वार सदृश संरचना है जो वास्तव में द्वार ना होकर एक ऐसा स्थान था जहां से आम प्रजा शाही सवारी का अवलोकन करती थी। यह स्थान किला मुबारक के अत्यंत समीप निर्मित है।

किला मुबारक

किला मुबारक - पटियाला का ह्रदय स्थल
किला मुबारक – पटियाला का ह्रदय स्थल

पटियाला नगर का हृदयस्थल अर्थात् किला मुबारक हमारे इस पटियाला विरासती पदयात्रा का अंतिम पड़ाव था। इस किला मुबारक में विशाल प्रवेश द्वार था जिस पर कई नुकीली संरचनाएं थीं। इनका उद्देश्य शत्रु सेना द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले हाथियों इत्यादि से दुर्ग का रक्षण करना था। इस विशाल प्रवेश-द्वार द्वारा किला मुबारक के भीतर प्रवेश करते ही आप स्वयं को चारों ओर से विशालकाय इमारतों से घिरा पायेंगे। इन्हें देखने के पश्चात ही इस दुर्ग की विशालता का सही अनुमान लगाया जा सकता है। द्वार से भीतर प्रवेश करने के पश्चात दृश्यमान विशालता ने जो मुझे झकझोरा, उसे समझने में मुझे कुछ क्षण लगे।

पटियाला किला मुबारक का इतिहास

पटियाले के किला मुबारक का निर्माण सन १७६४ में किया गया था। अर्थात् यह पटियाले का प्राचीनतम जाग्रत संरचना है। १०० एकड़ क्षेत्र में फैला यह किला मुबारक राजस्थानी तथा मुग़ल वास्तुकला का आकर्षक सम्मिश्रण है। हलके रंग में रंगे उत्कृष्ट फूलदार चित्रकारी देख जयपुर के आमेर दुर्ग की स्मृति मानसपटल पर उभर आती है। कई स्थानों पर कांगड़ा कलाकारों द्वारा की गयी सूक्ष्म चित्रकारी अत्यंत मनोहारी प्रतीत होती है।

बाबा आला सिंह की गद्दी - किला मुबारक - पटियाला
बाबा आला सिंह की गद्दी – किला मुबारक – पटियाला

वास्तव में किला मुबारक दो मुख्य भागों में बंटा हुआ है। किला अंदरुन, अर्थात् किले के भीतरी भाग में शाही निवास स्थल है। वहीं बाहरी भाग में सभा कक्ष, रसोईघर, अतिथीगृह तथा शीत कक्ष निर्मित है।

बाबा आला सिंह की गद्दी के दर्शनार्थ हमने एक और तोरणयुक्त द्वार के भीतर प्रवेश किया। हमारे बांयी ओर वह पवित्र स्थल था जहां बाबा आला सिंह पीठासीन होते थे। यह स्थल अत्यंत पूजनीय है। इसकी ऐसी आराधना की जाती है मानो गद्दी पर रखे बाबा आला सिंह के चित्र में बाबा स्वयं अब भी निवास कर रहे हों।

किला मुबारक की चित्रकारी

किला मुबारक का एक नक्काशी युक्त दरवाज़ा
किला मुबारक का एक नक्काशी युक्त दरवाज़ा

किला मुबारक के भीतर जाते हुए हमारी दृष्टी दोनों ओर की भित्तियों पर पड़ी। किसी काल में की गयी चित्रकारी के नाममात्र अवशेष ही भित्तियों पर शेष थे। इन्हें देख ह्रदय भारी सा हो गया। भित्तियों की आकर्षक चित्रकारी पर निष्ठुरता से चूना पोता गया है। संकरीले गलियारों तथा सीड़ियों के जाल को पार कर हम एक लघु कक्ष में पहुंचे। भीतर तेल की एक अखंड ज्योत जल रही थी। मुझे बताया गया कि यह ज्योत इस किले की स्थापना से अखंड जल रही है। इस ज्योत के एक ओर लकड़ियों के ढेर की जलती धूनी थी। यह सब सच्चे पाशा के सम्मान में अखंडित रखी हुई है।

ऊपरी माले पर रानियों का अन्तःपुर है। मुझे बताया गया कि एक राजा की एक रानी फ्रांसीसी थी। उनका महल विशेष यूरोपीय पद्धति के तोरणों से सज्ज था। यहाँ से आपको नीचे चौकोर बागों में निर्मित कई महल दिखाई देते हैं।

किला मुबारक का चित्रित कक्ष

किला मुबारक का चित्रित कक्ष - पटियाला
किला मुबारक का चित्रित कक्ष – पटियाला

किला मुबारक का सर्वोत्कृष्ट आकर्षण था उसका चित्रित कक्ष। यह मुख्यतः लाल तथा सुनहरे रंग में रंगा हुआ था। इसे देख मुझे बीकानेर के जूनागड़ दुर्ग के अमर महल का स्मरण हो आया। इन चित्रों में मुख्यतः भगवान् कृष्ण की लीलाओं सहित कुछ शाही किवदंतियों को चित्रित किया गया है। यह सब मेरी अपेक्षाओं से परे था। मैंने यह उम्मीद नहीं की थी कि पटियाला भी समृद्ध सूक्ष्म चित्रकारी में पटु कलाकारों का नगर था। इन रंगीन चित्रों द्वारा दर्शाई कथाओं को निहारते मैं मानो खो सी गयी। मैं यह ह्रदय से अपेक्षा करती हूँ कि पंजाब पर्यटन विभाग इनकी उत्तम रीत से रखरखाव करे तथा इन पर अभिलेख तैयार करे।

किला मुबारक के द्वारों में से एक द्वार हाथी दन्त का उपयोग कर बारीकी से उत्कीर्णित था।

किला मुबारक के दरबार का एक दरवाज़ा
किला मुबारक के दरबार का एक दरवाज़ा

मुख्य दरबार इस दुर्ग के बाहरी ओर निर्मित किला मुबारक का एक और मनमोहक आकर्षण है। यह एक विशाल कक्ष है जिसकी छत लगभग ७० फीट ऊंची है। श्याम वर्ण का इसका द्वार उत्कृष्ट ढंग से उत्कीर्णित है। छत से लटकाये गए अतिविशाल झूमर को देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इस माप के झूमर को अब तक लटकाए रखने हेतु छत कितनी मजबूत होगी! एक प्राचीन विक्टोरिया बग्घी भी यहाँ पारदर्शी चद्दर से ढँकी रखी थी। संभवतः रखरखाव के कार्य के चलते इसे ढंका गया था।

सूचना – वर्तमान में किला मुबारक के रखरखाव का कार्य जारी है। अतः यहाँ के कुछ भागों के दर्शन की ही अनुमति है।

पटियाला विरासती पदयात्रा हेतु कुछ सुझाव

शाही समाधान की एक छतरी
शाही समाधान की एक छतरी

• पटियाला विरासती पदयात्रा हेतु लगभग १.५ की.मी. तक की पदयात्रा करनी पड़ती है।
• इस पदयात्रा का अधिकतर भाग संकरी गलियों से होकर गुजरता है जिसे पैदल ही किया जा सकता है।
• पटियाला विरासती पदयात्रा प्रत्येक शुक्रवार, शानिवार तथा रविवार को आयोजित किया जाता है। शीत ऋतु तथा ग्रीष्म ऋतु में समय अलग होता है। तथापि यह दिवस के पूर्वार्ध में ही आयोजित की जाती है।
• इस पदयात्रा का शुल्क नाममात्र है।
• यह पदयात्रा आप बिना किसी परिदर्शक के भी आसानी से पूर्ण कर सकते हैं। अपनी सुविधा के लिए आप यहाँ का नक्शा टिकट खिड़की से प्राप्त कर सकते हैं। आपकी सुविधा हेतु सम्पूर्ण मार्ग पर पटियाला विरासती पदयात्रा के सन्दर्भ में सूचना पट्टिकाएं स्थापित हैं जो समय समय पर आपकी जिज्ञासाओं को शांत करती रहती हैं।
• उपरोक्त सूचना के पश्चात भी मेरा सुझाव रहेगा कि आप इस पदयात्रा हेतु पंजाब पर्यटन द्वारा मान्यता प्राप्त परिदर्शक की सहायता अवश्य लें। यह परिदर्शक आपको प्रत्येक स्मारक के प्रष्ठभागीय कहानियों के साथ साथ आपके अन्य प्रश्नों के भी उत्तर संतोषजनक रूप से प्रदान कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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