कड़कती सर्दियों में लद्दाख की सड़कें

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राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या १ के सूचना पट
राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या १ के सूचना पट

सर्दियों में लद्दाख की यात्रा के नाम पर अधिकतर चादर ट्रैक ही प्रसिद्द है जो की बर्फ जमी ज़न्स्कर नदी पर किया जाता है और ट्रैकिंग की दुनिया में सबसे मुश्किल ट्रैक माना जाता है । लेकिन हम साधारण जन तो लद्दाख की इस जानलेवा सर्दी में चादर ट्रेक जैसे जोखिम भरी यात्रा नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम सर्दियों में लद्दाख नहीं जा सकते। यहां पर छोटी-छोटी सड़क यात्राएं होती है, जो आप लेह नगर में रह कर, कर सकते है। लेह में ऐसे होटल उपलब्ध है जहाँ  आप आराम से रह सकते हैं, जो बाहर की कड़कती ठड़ में भी भीतर से गरम रहते  हैं, जैसा कि हमारा होटल ‘द ग्रैंड ड्रैगन लद्दाख’। इन होटलों में केंद्रीय उष्णिकरण की व्यवस्था होती है जो ठण्ड में एक वरदान स्वरुप लगता है। लेह की इन अतिशय सुंदर और मनमोहक सड़क यात्राओं का पूर्ण लुत्फ उठाने के लिए मैंने लद्दाख में चार दिन बिताए।

लद्दाख की लघु सड़क यात्राएं

चुंबकीय पहाड़ी से गुजरते हुए चिल्लिंग गांव की सैर

आधी जमी जान्स्कर नदी
आधी जमी जान्स्कर नदी

चिल्लिंग, प्रसिद्ध चादर यात्रा का प्रारंभ बिंदु है। यह यात्रा सर्दियों के दिनों में जांस्कर नदी पर की जाती है, जब इस नदी का पानी पूरी तरह से जम जाता है। यात्री इस जमी हुई नदी पर चलकर यह यात्रा करते हैं। लेकिन, अगर आप मेरी तरह है, जो यात्रा से अधिक सर्दियों में लद्दाख की नदियों और पर्वतों के नज़ारे देखने में रुचि रखते हैं, तो आपको चिल्लिंग की यात्रा जरूर करनी चाहिए। इस यात्रा के दौरान आपको जांस्कर नदी देखने का मौका भी मिलता है।

जांस्कर नदी और सिंधु नदी का संगम स्थल

जान्स्कर एवं सिन्धु नदी का संगम
जान्स्कर एवं सिन्धु नदी का संगम

इस यात्रा के दौरान जांस्कर नदी और सिंधु नदी के संगम बिंदु सबसे विहंगम दृश्य है। यह सबसे सुंदर और विनयशील संगम है जो मैंने आजतक देखा है। मैले से हरे रंग की सिंधु नदी लेह से बहती हुई प्राचीन नील जांस्कर से जाकर मिलती है। संगम बिन्दु के इस भाग से थोड़ी दूरी तक इन दोनों नदियों का पानी समानांतर बहता है, जो जमे हुए पानी की पतली सी परत के सीमांकन अलग होता है। ऐसा लगता है जैसे ये दोनों नदियां एक दूसरे से बंधी साथ तो चलती हैं, पर अपने आप में दोनों स्वतंत्र हैं। इन दोनों नदियों के हरे नीले पानी के स्वतंत्र संगम का यह नज़ारा देखने लायक है। अगर आप कभी लेह लद्दाख गए तो लद्दाख की सर्दियों के ये खास दृश्य जरूर देखिये। मेरा दावा है इसे आप जीवनभर अपनी यादों में संजो कर रखेंगे।

जमती हुई नदियां

बर्फीली जान्स्कर नदी पर प्रतिकृतियाँ
बर्फीली जान्स्कर नदी पर प्रतिकृतियाँ

जनवरी के महीने में यहां की नदियों के किनारे जमने लगते हैं और इस जमे हुए बर्फ के टुकड़े नदी में तैरते हुए दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे आप जांस्कर नदी से गुजरते हुए चिल्लिंग की ओर बढ़ते हैं, बर्फीले किनारों से घिरा हुआ नदी का नीला पानी आपको मंत्रमुग्ध कर देता है। यह नज़ारा बहुत ही मनमोहक है। कुछ जगहों पर नदी का पानी थोड़ा-बहुत जम जाता है और नदी पर बर्फ की पतली सी परत चढ़ने लगती है, जिसके नीचे से बहते हुए पानी की सिर्फ आवाज़ सुने देती है। तो कुछ जगहों पर यह जमी हुई बर्फ ओले के समान प्रतीत होती है जिसके विभिन्न आकार प्रकार आपको अचंभित कर देते हैं। मैंने किसी भी नदी के किनारे की इतनी अच्छी यात्रा नहीं की जितनी कि लद्दाख के चिल्लिंग यात्रा के समय जांस्कर नदी की यात्रा की है।

चुंबकीय पहाड़ी

चिल्लिंग जाते समय आपको चुंबकीय पहाड़ी से गुजरते हुए जाना पड़ता है। ऐसा कहा जाता है की लद्दाख की कई पहाड़ियों में से एक की चुम्बकीय शक्ति अति प्रबल है. कई बार गाड़ियाँ इसकी और स्वतः ही खिंची चली जातो हैं। हालाँकि मैंने व्यक्तिगत रूप से इस चुंबकीय क्षेत्र को महसूस नहीं किया और ना ही मुझे ऐसा कोई अनुभव हुआ, लेकिन हमारे साथ जो यात्री थे उनके पास बताने के लिए बहुत सारी रोचक कथाएं थी। सच तो यह है कि ये पहाड़ लौह के अयस्कों से भरे हैं। इसलिए यह हो सकता है कि बाकी की पहाड़ियों से अधिक चुंबकीय आकर्षण इस पहाड़ी पर महसूस होता है और लोहे के बने विशाल वाहनों पर इसका असर ज्यादा होता हो।

आप लेह से यह यात्रा आधे दिन में कर सकते हैं। सर्दियों के दिनों में अपने होटलों से बाहर रहने का यह अच्छा समय है।

मूनस्केप से गुजरते हुए लामायुरु की सैर

लामायुरु या लमवु जैसा कि उसे कहा जाता है, लद्दाख का सबसे प्राचीन मठ एवं मठों का शहर है। इस यात्रा की विशेष बात थी यहां के जमे हुए झरने। इन जमे हुए झरनों को देखकर मुझे जो भी महसूस हुआ वह मेरी अभिव्यक्ति की सीमाओं से बहुत परे है। मुझे ऐसा लगा जैसे समय का कोई पल थम सा गया है। जब तक मैंने इन जमे हुए झरनों को नहीं देखा था, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि बहता हुआ पानी भी कभी किसी वक्त इस प्रकार जम सकता है। ऐसे प्रतीत होता है जैसे समय ही थम गया हो इन ठहरे हुए झरनों के साथ।

शिथिल झरने - सर्दियों में लद्दाख
शिथिल झरने – सर्दियों में लद्दाख

आपको रास्ते में इस प्रकार के बहुत से छोटे-बड़े जमे हुए झरने देखने को मिलेंगे। जी हाँ, आप इन्हें चादर यात्रा किए बिना भी देख सकते हैं। ये जमे हुए झरने लद्दाख के दृश्यों को अत्यधिक प्रसिद्ध बनाते हैं।

लामायुरु मठ का प्रवेश द्वार
लामायुरु मठ का प्रवेश द्वार

समय के अनुसार दिन की रोशनी आपके आगे के परिदृश्यों में बदलाव लाती रहती है। रोशनी और नजारों का यह अद्भुत खेल देखने लायक होता है। रोशनी की किरणे जब यहां के बंजर पर्वतों पर पड़ती है, तो ये पर्वत जीवंत हो उठते हैं। कभी-कभी सूर्य की रोशनी पर्वत के कुछ हिस्से को प्रकाशित करते हुए एक अद्वितीय दृश्य आपके सामने खड़ा कर देती है, जिसे देखकर आपको अजीब सा सुकून महसूस होता है। फोटोग्राफरों को लद्दाख के इन अनुपम दृश्यों को अपने कैमरा में कैद करने के अनेकों अवसर मिलते रहते हैं।

लामायुरु मठ

लामायुरु मठ - लद्दाख
लामायुरु मठ – लद्दाख

स्पीति घाटी में स्थित धनकर मठ की भाँति, पहाड़ी के शिखर पर बसा हुआ लमयुरु मठ यहां के पूरे परिदृश्य को और भी सुरम्य बनाता है। दीमक पहाड़ी जैसे दिखनेवाली इन हलकी फूली सी चट्टानों पर स्थित यह पूरा मठ, या दरअसल यह गाँव ही किसी सुकुमार दृश्य की तरह दिखाई देता है, जो आपकी आँखों के सामने से गुजरता हुआ जाता है। हमारे  गाइड ने हमें बताया कि कुछ सदियों पहले नौ लामाओं ने आकर इस मठ की स्थापना की थी। और तब से यह मठ इसी ढलान पर स्थित है। सैकड़ों लामाओं को अपनी छत्र-छाया प्रदान करनेवाला यह विशाल मठ बहुत ही साधारण है, जिसकी बाहरी दीवारें रंगी हुई हैं और आंतरिक सजावट भी साधारण सी है। पहाड़ी की चोटी पर स्थित बाकी मठों की तरह यह मठ भी अपने आस-पास के परिदृश्यों को देखने के लिए आगंतुकों को सुविधाजनक स्थान प्रदान करता है।

मूनस्केप

चाँद की सतह से मिलता जुलता परिदृश्य - लद्दाख
चाँद की सतह से मिलता जुलता परिदृश्य – लद्दाख

लेह से लमयुरु पहुँचने से ठीक पहले आपको बेतरतीब सा भूदृश्य दिखाई देगा, जिसे अक्सर मूनस्केप या ऐसी जमीन जो चंद्रमा की सतह के जैसी दिखाई देती है। यानि एक प्रकार से यह चंद्रमा की सैर करने जैसा ही है। मुझे यह जगह बहुत ही अनुपम और थोड़ी सी काल्पनिक भी लगी। रास्ते के एक तरफ चट्टानों के बड़े-बड़े टीले थे तो दूसरी तरफ बर्फ की छितरन से भरे पहाड़, जो यहां के परिदृश्य को हल्के से सफ़ेद और काले रंग की आभा प्रदान कर रहे थे।

आल्ची मठ की सैर

अल्ची मठ - लद्दाख
अल्ची मठ – लद्दाख

लद्दाख में प्रत्येक गाँव का अपना मठ है जिसे आमतौर पर उसी गाँव के नाम से जाना जाता है। आल्ची मठ इन्हीं में से एक है जहां तक पहुँचने के लिए आपको लमयुरु की यात्रा को कुछ समय के लिए स्थगित कर थोड़ा सा विमार्ग होना पड़ता है। अगर आप मेरी तरह भित्ति-चित्रों के प्रशंसक हैं, तो मैं यही सलाह दूँगी कि आपको इस सुंदर से मठ की विशेष यात्रा जरूर करनी चाहिए। ध्यान रहे कि मठ की चित्रित दीवारों और उनपर की गयी विशाल अस्तरकारी का अवलोकन करते समय कोई लामा ही आपका मार्गदर्शन कर रहा हो।

मैंने तबो मठ की भी सैर की जिसे आमतौर पर हिमालय का अजंता भी कहा जाता है। मुझे यह स्वीकार करना ही होगा कि यहां के भित्ति-चित्र बहुत ही सुंदर हैं, लेकिन जो चीज आल्ची मठ को और ज्यादा खास बनाती है, वह है इस मठ के पाँच-छः कमरों में खड़ी बोधिसत्त्व की विशाल मूर्तियां। ये मूर्तियां 2-3 मंजिल की ऊंचाई की है, जो उज्वलित रंगो से रंगे इन मंजिलों और छतों से उपर उठते हुए स्थिर खड़ी हैं।

लोटसा मंदिर

अल्ची मठ के भित्तिचित्र
अल्ची मठ के भित्तिचित्र

इस क्षेत्र का सबसे पहला मंदिर जिसे लोटसा मंदिर कहा जाता है, की दीवारें बुद्ध के छोटे-छोटे हजारों चित्रों से भरी हुई दिखाई देती हैं। लेकिन इस मंदिर में बुद्ध के हज़ार से भी अधिक चित्र चित्रित किए गए हैं। इसी के पास स्थित वैरोकना मंदिर के मंडल रंगे हुए हैं, जो बौद्ध मठों में अक्सर पाया जाता है। लेकिन आल्ची मठ के मंडल की खासियत है, उसपर की गयी उभरी हुई सी कारीगरी जो उसे चौखट का रूप देता है। कुछ जगहों पर मुझे लगा जैसे यह कीमती रत्न और पत्थरों को रखने के लिए कोई खास जगह है पर मैं इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं कर सकी। मिट्टी से बने होने के कारण और अच्छी मरम्मत न हो पाने की वजह से कई जगहों पर चित्र धुंदले से पड़ते जा रहे हैं, तो कहीं पर टुकड़ों-टुकड़ों में मरम्मत का काम नज़र आता है।

मंजुश्री मंदिर

मंजुश्री मंदिर में आपको मंजुश्री देवी की चार अलग-अलग मूर्तियां दिखेंगी जो चार तरह के रंग – स्वर्ण, केसरी, नीला और हरे रंग से सुशोभित एक दूसरे की ओर पीठ किए हैं। इस मंदिर की छत पर विभिन्न प्रकार के नमूने बने हैं, जो कपड़ों पर बने चित्र की तरह लगते है, जिनमें शिकार के दृश्य बिखरे पड़े हैं, जो विभिन्न प्राणी जैसे बाघ, घोडा तथा विभिन्न अस्त्र जैसे धनुष्य-बाण आदि को रेखांकित करते हैं। आल्ची मठ में मैंने पहली बार चित्रकारी के लिए काले और सफ़ेद रंग का प्रयोग होते देखा है, वरना अक्सर ये रंग पट्टिका से गायब होते हैं, या फिर इनका प्रयोग जरूरत पड़ने पर ही किया जाता है।

कश्मीरी चित्रकला की शैली

लद्दाख के परिदृश्य
लद्दाख के परिदृश्य

आल्ची की चित्रकला शैली स्पष्ट रूप से कश्मीरी है। जैसा की लामा जी ने हमे बताया, सिर्फ कश्मीरी चित्रकार ही लद्दाख के इस सख्त वातावरण में काम कर सकते थे। इन चित्रों में बहुत सी पारसी विशेषताएं नज़र आती हैं, जो आपको याद दिलाता है कि लद्दाख रेशम मार्ग का भाग रहा है जिसने पूर्व और पश्चिम की अनेकों संततियों को यहां से गुजरते हुए देखा है।
आल्ची मठ के आंगन में अद्वितीय स्तूप है जिसके भीतर आप जा भी सकते हैं। इसे भी भीतर से प्रचुरता में रंगा गया है। सर्दियों में लद्दाख की ठंड से बचते हुए आप खुशी-खुशी अंदर खड़े होकर इन चित्रों की प्रशंसा कर सकते हैं।
आल्ची मठ 10वी सदी की समाप्ती और 11 वी सदी की शुरुवात के दौरान बनवाया गया था। यह उन 108 मठों में से एक माना जाता है जो महान अनुवादक रींचेन जंगपो द्वारा बनवाए गए थे। उनके द्वारा बनवाए गए कुछ मठ लमयुरु, तबो और नाको में भी देखे जा सकते हैं।

थिकसे और चेमरे मठों की सैर

सर्दियों में लद्दाख के वृक्ष एवं सड़कें
सर्दियों में लद्दाख के वृक्ष एवं सड़कें

ये दोनों मठ लद्दाख की प्रसिद्ध झील पंगोंग, तक जानेवाले मार्ग पर ही स्थित हैं। अगर आप इसी क्षेत्र में हैं, और पंगोंग जाना चाहते हैं तो पहले आपको इस बात की जानकारी प्राप्त करनी होगी कि, क्या पंगोंग तक जाने का रास्ता साफ है और क्या आप वहां जा सकते हैं या नहीं। अगर आप पंगोंग तक नहीं पहुँच पाये तो आप इस मार्ग की आधी सैर भी कर सकते हैं, जहां पर देखने लायक बहुत सी सुंदर चीजें हैं।

थिकसे मठ दूर से - लद्दाख
थिकसे मठ दूर से – लद्दाख

थिकसे तक जानेवाली राह पर मुड़ने से पहले आपको लंबे समय तक राष्ट्रीय महामार्ग की सवारी करनी पड़ती है, जिसके समानांतर सिंधु नदी बहती है। थिकसे मठ पास से देखने में जितना सुंदर है, दूर से देखने में उतना ही आकर्षक लगता है। मठ तक ले जाने वाले इन घुमावदार रस्तों ने मुझे अपनी स्पीति यात्रा की याद दिला दी।

थिकसे मठ का पहला दर्शन
थिकसे मठ का पहला दर्शन

थिकसे जाते समय हमने रास्ते में छोटी सी नदी देखि जो आधी जम जाने के बाद भी सिंधु नदी से मिलने के लिए उतावली, उग्रता से बह रही थी। चिनार के पेड़ जैसी दिखने वाली बंजर झड़ियों से घिरी हुई यह जगह, एकांत में कुछ समय बिताने लायक थी। मैंने इस छोटी सी नदी को थिकसे मठ के ऊपर से देखा। नदी पर से एक छोटा सा पुल पार करने के बाद हम कुछ दूर तक नदी के किनारे से ही सवारी करते रहे।

आधी जमी नदी, सिन्धु मादी में मिलने को तत्पर
आधी जमी नदी, सिन्धु मादी में मिलने को तत्पर

चेमरे मठ तक जाने के लिए हमे छोटे-छोटे रस्तों से गुजरते हुए जाना पड़ा जो ऊंचे-ऊंचे बंजर झाड़ियों से घिरे हुए थे। यह हमरी यात्रा का और एक काल्पनिक सा दिखने वाला भाग था।

सुबह की प्रार्थना

ठिकसे मठ में प्रातः वंदना
ठिकसे मठ में प्रातः वंदना

हमने थिकसे मठ की सुबह की प्रथना में भाग लिया, जहां पर हमने छोटे-बड़े लामाओं को सुबह का नाश्ता करते हुए मंत्रों का उच्चारण करते देखा। लामाओं के नाश्ते में चाय की कई बारियाँ होती हैं। हमे भी वही चाय दी गयी थी। थिकसे मठ के आंगन में कई दिलचस्प चित्र थे। आल्ची मठ की तरह यहां भी अस्तरकारी काम का ऊंचा चित्र बना हुआ है, जो भविष्य के बुद्ध यानि मैत्रेय बुद्ध का चित्र है।

अगर आपको मठों में जाना पसंद है तो आप हेमीस मठ में भी जा सकते हैं। हम वहां नहीं गए क्योंकि, इस मठ का प्रमुख आकर्षण यानि यहां का संग्रहालय सर्दियों में बंद रहता है।

खरडूंगला दर्रे के रास्ते में शांति स्तूप की सैर

लेह स्थित शांति स्तूप
लेह स्थित शांति स्तूप

खरडूंगला दर्रा लद्दाख क्षेत्र का एक और प्रसिद्ध दर्रा है। मुझे बताया गया है कि, गर्मियों के मौसम में वहां तक जाने वाले मार्ग पर बहुत सारा ट्रेफिक जाम होता है क्योंकि, यह जगह पर्यटकों से भरी हुई होती है। और सर्दियों के मौसम में जब आप लद्दाख दौरे पर आते हैं तो यह दर्रा बन्द रहता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप इसे  देख नहीं सकते। शांति स्तूप, जो खरडूंगला दर्रे के रास्ते में, लेह की सरहद पर बसा हुआ है और अधिकतर लद्दाख यात्राओं का भाग भी है, की सैर कीजिए।

परिदृश्य

शांति स्तूप से सूर्यास्त का दृश्य
शांति स्तूप से सूर्यास्त का दृश्य

किसी पहाड़ी के ऊपर खड़े रहिए या शांति स्तूप की चढ़ाई कर आस-पास के परिदृश्य की प्रशंसा कीजिए। एक तरफ आप लेह महल और यहां का अद्वितीय सूखा गोल्फ कोर्स देख सकते हैं। इसके पीछे आपको स्टॉक कंगरी की पूरी पर्वत माला नज़र आती है जो सूर्यास्त के समय बेहद सुंदर दिखाई देती है। पीछे घूमिए और आपको विशाल पहाड़ियों को काटती हुई एक सीधी रेखा दिखेगी, और यही खरडूंगला दर्रा है। शुक्र है यहां के सूचना पट्ट आपको स्तूप के आस-पास की सारी जानकारी देते हैं।

लेह का गोल्फ कोर्स
लेह का गोल्फ कोर्स

शांति स्तूप, बौद्ध स्थानों में उभर रहे स्तूपों की नयी शृंखला है। मैंने ऐसा ही एक स्तूप बिहार के राजगीरी में भी देखा। वह बहुत ही साफ-सुथरा सफ़ेद स्तूप है, जिसमें बौद्ध धर्म के सारे चिह्न हैं। इस स्तूप में ऊपर चढ़ने और नीचे उतरने के लिए एक जैसी दिखने वाली सीढ़ियाँ भी है।

सर्दियों में लद्दाख की यात्रा करते हुए लेह की सैर

स्पितुक मठ - लेह
स्पितुक मठ – लेह

जैसे-जैसे आपका शरीर पर्वतों की ऊंचाइयों से समायोजित होता है, आप लेह शहर की सैर कर सकते हैं। आप वहां के स्पीतुक मठ के भी दर्शन कर सकते हैं, जो शहर के ठीक बाहर स्थित है। हमने यहां के वार्षिक गुस्तोर उत्सव में भी भाग लिया। इसकी कथा मैं आपको अपने अगले पोस्ट बताऊँगी । आपको यहां से लेह शहर और लेह के हवाई अड्डे का, जो लगभग खुली हवा में स्थित है, का खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है।

लेह के बाज़ारों में घूमिए, जिसमें से ज़्यादातर दुकाने सर्दियों के मौसम में बंद रहती हैं। लेकिन यहां के अतिथि गृहों और लॉज के बारे में जानकारी देने वाले सूचना पट्टों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि गर्मियों के मौसम या पर्यटकों के मौसम में इस जगह पर कितनी भीड़ होती होगी।

सर्दियों के मौसम में लद्दाख में बहुत कम ट्रेफिक और भीड़  रहते है। ऐसा लगता है जैसे सारे परिदृश्य – नदियां, पर्वत, ख़ाका सब आप ही की राह देख रहे हो। यहां वहां के कुछ भिक्षुओं को नज़रअंदाज़ कर, कल्पना कीजिए कि आस-पास के सारे नज़ारे सिर्फ आपके लिए ही हैं। वास्तव में लड़ख कितना धनी है। सर्दियों में लद्दाख आपको यहां के अनुपम दृश्य संजोने के अनेकों अवसर प्रदान करता है।

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