श्रीलंका स्थित रामायण सम्बंधित स्थल एक रोमांचक यात्रा कथा

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श्री लंका के रामायण स्थल
श्री लंका के रामायण स्थल

एक इंसान अपने जीवनकाल में क्या अर्जित करने का स्वप्न देखता है? ज्ञान, धन, ख़ुशी या प्रेम? परन्तु यह मेरा स्वप्न नहीं था। मेरा स्वप्न था विश्वास, आस्था और श्रद्धा अर्जित करना। कुछ, जो मैंने खो दिया था और उसे फिर पाने हेतु अतिउत्सुक था। इसी उद्देश्य से मैंने महाकाव्य रामायण में दर्शाए गए भगवान् हनुमान की श्रीलंका की ३०००कि.मी. की अजरामर यात्रा का अनुभव करने का निश्चय किया। इसके अंतर्गत दक्षिण भारत में हम्पी से कन्याकुमारी तक १२००कि.मी. की यात्रा पैदल चल कर पूर्ण की। इसके उपरांत श्रीलंका की परिधी, करीब २०००कि.मी., मोटरसाइकल द्वारा पूर्ण की। और श्रीलंका स्थित रामायण सम्बंधित कई स्थलों के दर्शन किये।

मंदिर, गुफाएं, बगीचे, पर्वत और विरासती स्थल, ऐसे करीब ४० छोटे बड़े रामायण सम्बंधित स्थल हैं जो पूरे श्रीलंका में फैले हुए हैं। इनमें से ज्यादातर स्थलों के दर्शन सुलभ हैं। कुछ स्थल ऐसे भी हैं जिन्हें नक़्शो व विस्तृत दिशानिर्देशों के बावजूद भी ढूँढना व वहां तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। श्रीलंका में कई यात्रा संस्थाएं हैं जो रामायण सम्बंधित श्रीलंका के प्रमुख स्थलों के दर्शन करातीं हैं। परन्तु यदि आप श्रीलंका स्थित रामायण सम्बंधित प्रमुख व अप्रचलित, सभी स्थलों के दर्शन करना चाहें तब व्यवस्था आपको स्वयं ही करनी पड़ेगी।

श्रीलंका स्थित रामायण सम्बंधित दर्शनीय स्थल

श्रीलंका के शिव मंदिर

श्रीलंका में पहला वह रामायण सम्बंधित स्थल, जिसके दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ, वह था चिलाव के समीप स्थित मुन्नेश्वरम मंदिर। श्रीलंका में रामायण सम्बंधित कुल ३ शिव मंदिर हैं जो एक कथा द्वारा जुड़े हैं। युद्ध जीतने के उपरांत भगवान राम ने अयोध्या वापसी की यात्रा आरम्भ की। पर, रावण वध के उपरांत उन्हें ब्राम्हण हत्या का दोष भी प्राप्त हुआ था। मुन्नेश्वरम में भगवान् राम को अपने इस दोष के कम होने की अनुभूति हुई और उन्होंने इस दोष से मुक्ति हेतु भगवान् शिव की आराधना की। भगवान् शिव ने उन्हें मनावरी, तिरुकोनेश्वरम, तिरुकेतीश्वरम और रामेश्वरम, इन ४ स्थलों में शिवलिंगों की स्थापना कर, दोष निवारण हेतु इनकी आराधना करने का मार्ग सुझाया।

चिलाव का मुन्नेश्वरम मंदिर

मुन्निश्वरम शिव मंदिर - श्री लंका
मुन्निश्वरम शिव मंदिर – श्री लंका

मुन्नेश्वरम मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर स्थित हैं जिनमें मुख्य मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। मेरी यात्रा के दौरान वहां उत्सव का वातावरण था। सम्पूर्ण मंदिर पुष्प द्वारा अलंकृत था व दीयों और रोशनी के प्रकाश में जगमगाता अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। पूरा मंदिर दर्शनार्थियों द्वारा खचाखच भरा हुआ था फिर भी कहीं धक्कामुक्की व हडबडाहट नहीं थी। मेरे अस्तव्यस्त भेष के बावजूद लोग मुस्कुराकर मेरा स्वागत कर रहे थे।

मैंने भगवान के चरणों में पूजा अर्चना की। तभी यहाँ के एक अनोखे प्रथा ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। भगवान के चढ़ावे में तरबूज, पपीता, नारंगी, केले, सेब व अन्य कई फल चढ़ाए गए थे। मुझे बताया गया कि सभी मंदिरों में यही प्रथा है।

मनावरी शिवम् कोविल, चिलाव

मनावरी शिवम् कोविल - शिव मंदिर, श्री लंका
मनावरी शिवम् कोविल – शिव मंदिर, श्री लंका

दूसरे दिन सुबह मैंने चिलाव से १०कि.मी. उत्तर में स्थित मनावरी सिवम कोविल के दर्शन किये। तमिल भाषा में मंदिर को कोविल कहा जाता है। मनावरी सिवम कोविल या ईस्वरण कोविल एक छोटा परन्तु धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर है। ब्राम्हण हत्या दोष निवारण हेतु भगवान् राम द्वारा स्थापित यह पहला शिवलिंग है। चूंकि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान् राम ने की थी, इसे रामलिंगम भी कहा जाता है। जैसा कि माना जाता है, भगवान् राम का जन्म ५११४ ई.पू. में हुआ था। इसका तात्पर्य है कि यह शिवलिंग ७०००वर्षों से भी अधिक प्राचीन है।

रामसेतु

राम सेतु – भारत – श्री लंका
राम सेतु – भारत – श्री लंका

इसके उपरांत मैं तलईमन्नार की तरफ रवाना हो गया जो भौगोलिक रूप से भारत से निकटतम स्थान है और रामसेतु का भारत की तरफ का छोर है। इसे ऐडम सेतु भी कहा जाता है। किवदंतियां कहतीं हैं कि, भगवान हनुमान द्वारा लंका में देवी सीता को खोजने के उपरांत, वानर सेना ने लंका की तरफ कूच किया व समुद्र तट तक पहुँच गए परन्तु लंका तक पहुँचने का कोई साधन नहीं था। उस क्षण लंका पहुँचने हेतु वानर वास्तुकार नल ने समुद्रतट से लंका तक सेतु निर्माण की योजना तैयार की। कहा जाता है कि सेतु निर्माण के दौरान पत्थर समुद्र में डूब रहे थे। तब वानर सेना ने पत्थरों पर भगवान् राम का नाम लिख कर उन पत्थरों द्वारा इस राम सेतु का निर्माण किया। इस सेतु निर्माण में उपयोग में लाये गए कुछ तैरते पत्थर हम रामेश्वरम के पंचमुखी हनुमान मंदिर में देख सकते हैं।

तलैमन्नार में स्थित पुराने प्रकाश स्तम्भ के समीप तट से श्रीलंका नौदल नौकासेवा उपलब्ध कराती है जो इस सेतु के दर्शन हेतु अति उपयुक्त है। जहाँ समुद्र का स्तर उथला है वहां इस सेतु के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं।

राम सेतु के दर्शन उपरांत मैं रात के भोजन हेतु शहर की तरफ मुडा। मैंने एक छोटे भोजनालय में प्रवेश किया और उसके मालिक से तिरुकेतीश्वरम के मार्ग से सम्बंधित जानकारी हासिल की। जैसे ही उन्हें मेरे भारतीय होने व मेरी इस यात्रा के प्रयोजन के बारे में ज्ञात हुआ, उन्होंने भोजनालय में उपस्थित सभी ग्राहकों को बताया। शीघ्र ही सब मेरी मेज के चारों ओर एकत्र हो गए व क्रिकेट, राजनीति, भ्रष्टाचार व धार्मिक स्थलों पर चर्चा करने लगे। सारे अपरिचित पास आ कर मुझसे हस्तांदोलन करने लगे और मुस्कुराते हुए मेरा अभिनन्दन किया व मेरी यात्रा हेतु मुझे शुभकामनाएं दीं। यह सब कुछ मेरे लिए अद्भुत था। इतने सारे लोग मेरी यात्रा से रोमांचित थे। उन्होंने मुझ पर सलाहों और सहायताओं की बौछार कर दी।

तिरुकेतीश्वरम मंदिर, मन्नार

तिरुकेतीश्वरम मंदिर, मन्नार - श्री लंका
तिरुकेतीश्वरम मंदिर, मन्नार – श्री लंका

अगले दिन सुबह मैं तिरुकेतीश्वर मंदिर की तरफ रवाना हो गया। यह मंदिर मन्नार शहर से करीब १०कि.मी. दूर, मन्नार राजमार्ग पर स्थित है। यह श्रीलंका के तीन शिवलिंगों में से दूसरा शिवलिंग है। किवदंतियां कहतीं हैं कि इस मंदिर का निर्माण रावण के श्वसुर माया अथवा मायासुर ने किया था। वह एक कुशल वास्तुकार थे, जिन्होंने इन्द्रप्रस्थ के मायासभा का भी निर्माण किया था।

पुर्तगालियों द्वारा इसे नष्ट किये जाने के बाद, सन १९०० के शुरुआत में, मूल शिवलिंग की खुदाई के पश्चात, इसे पुनःस्थापित किया गया। नष्ट होने से पूर्व, इसे श्रीलंका स्थित सभी शिवमंदिरों में से विशालतम शिवमंदिर माना जाता था। कहा जाता है कि इस नष्ट किये गए शिवमंदिर के पत्थरों से ही मन्नार का किला, मन्नार के सभी गिरिजाघर और केट्स के हैमर्शील्ड किले का निर्माण किया गया था। आप इस तथ्य से अंदाजा लगा सकतें हैं कि मूल शिव मंदिर कितना विशाल रहा होगा!

इस मंदिर में कई सभामंडप थे जिनमें भगवान की विभिन्न मूर्तियाँ रखीं गईं थीं। इन सभामंडपों के प्रवेशद्वार पूर्णतः एक पंक्ति में बनाए गए थे। मैं पहले सभामंडप के प्रवेशद्वार से, सभी सभामंडपों के पार, मुख्य मंदिर में स्थित शिवलिंग को देख सकता था। इस अभूतपूर्व दृश्य को देख मन में एक अद्भुत शान्ति का अनुभव हुआ।

मुसीबत मोटरसायकल की

तिरुकेतीश्वरम मंदिर से शहर वापस आते समय मेरी मोटरसायकल ने मुझे तकलीफ देने का अवसर नहीं गंवाया। अपने मोबाइल फोन पर बात करते समय मैंने मोटरसायकल का इंजन जरूर बंद करा पर हेडलाईट बंद करना भूल गया। नतीजा! मोटरसायकल की बैटरी अचेत हो गयी। सुनसान जगह होने के कारण चारों ओर नजर दौडाने पर भी कोई सहायतार्थ मौजूद नहीं था। दौड़ कर मोटरसाईंकल चालू करने की भी असफल कोशिश की। इस दौरान सांस इतनी फूल गयी कि लगा दिल का दौरा ना पड जाए! भगवान् की दया से वहां कुछ दयालु कॉलेज के छात्र प्रकट हो गए और उन्होंने मोटरसाईकल चालू करने में मेरी सहायता की। मुझे जिस तरह लोगों की सहायता व आधार मिल रहा था, लोगों पर विश्वास करने को जी चाह रहा था। परन्तु मेरे विचार बदलने हेतु अभी यह शायद पर्याप्त नहीं था।

कोनेश्वरम कोविल

कोनेश्वरम मंदिर में रावण की प्रतिमा
कोनेश्वरम मंदिर में रावण की प्रतिमा

कुछ दिनों पश्चात, अनुराधापुरम व कुछ और विरासती स्थलों के दर्शनों के उपरांत मैंने त्रिंकोमाली स्थित कोनेश्वरम कोविल के दर्शन किये। यह, वह तीसरा व अंतिम शिवलिंग है जहां भगवान् राम ने ब्राम्हण हत्या दोष निवारण हेतु पूजा अर्चना की थी। इस मंदिर का निर्माण अगस्त्य मुनि ने किया था। इसे दक्षिण का कैलाश* भी कहा जाता है। इसके साथ साथ यह एक महाशक्ति पीठ भी है। यह मंदिर एक पहाड़ी के ऊपर बनाया गया है जहां से बंदरगाह का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।
*श्रीलंका स्थित दक्षिण का कैलाश ठीक उसी देशांतर पर स्थित है जिस पर कैलाश पर्वत स्थित है।

दंतकथा

ऐसा कहा जाता है कि रावण की माता हर दिन शिवलिंग की पूजा किया करती थी। एक दिन उन्हें पूजा हेतु शिवलिंग नहीं मिला। उनकी पूजा सम्पूर्ण करने में मदद करने हेतु रावण ने दक्षिण कैलाश जा कर शिवलिंग प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या की। भगवान् शिव के प्रकट ना होने पर रावण क्रोधित हो उठा और उसने दक्षिण कैलाश पर्वत को उठाने की चेष्टा की।परन्तु भगवान् शिव ने उसे पछाड़ दिया। उस पर भी रावण ने सीख नहीं ली और अपनी तलवार निकाल कर पर्वत पर एक बड़ा चीरा लगाया जिसे रावण चीरा कहते हैं। रावण की इस करनी पर दुखी होकर शिव ने उसे घोर सजा दी। रावण घबराकर भगवान् शिव को मनाने लगा। अपने सर व बाहों को वीणा बनाकर वह भगवान् की स्तुति गायन करने लगा। इससे प्रसन्न होकर शिव ने उसे क्षमा कर दिया व एक शिवलिंग उसे दिया।

प्राचीन कोनेश्वरम मंदिर

एक प्राचीन मंदिर के रूप में कोनेश्वर कोविल का उल्लेख रामायण व महाभारत दोनों महाकाव्यों में किया गया है। चोलवंशी राजाओं के संरंक्षण में इस मंदिर का शीघ्रता से विकास हुआ और यह एक विशाल गोपुरम और एक हज़ार स्तंभों का मंदिर बन गया। अपनी कीर्ति की चरम सीमा पर इसके परिसर ने पूरी पहाड़ी अपने अन्दर समा ली थी। जैसा कि कहा जाता है, प्रत्येक उत्थान के पश्चात पतन नियत होता है। सन १६२२ में पुर्तगालियों ने इसे नष्ट कर दिया था। खुदाई के पश्चात, भगवान् शिव, पार्वती और गणेश की मूर्तियों के खोज के उपरांत इस मंदिर का पुनःनिर्माण किया गया।

“ सन १९५६ में प्रसिद्ध लेखक आर्थर सी. क्लार्क ने गोताखोरी के दौरान इस स्वयम्भू लिंग को खोज निकाला जिसकी स्थापना कभी रावण ने की थी। “

वर्त्तमान में पहाड़ी के निचले भाग पर सेना की एक टुकड़ी को रखा गया है जो ध्यानपूर्वक पर्यटकों का निरिक्षण करती है। मंदिर की ओर जाते मार्ग पर कई दुकानें थीं जो पूजा सामग्री, कपडे, खिलौने, खाद्यवस्तुयें इत्यादि बेच रहीं थीं।

इसके पूर्व दर्शन किये स्थलों की तरह, यहाँ भी लोगों ने मेरा स्वागत किया। सब अत्यंत आगत्यापूर्ण व मित्रवत थे और अपने घर भोजन ग्रहण करने हेतु आमंत्रण देने को आतुर थे। मैं सोच रहा था कि मेरे प्रति इनका इतना अच्छा व्यवहार उनके स्वयं के अच्छे स्वभाव के कारण था या मेरी किसी कथनी अथवा करनी ने उनका दिल जीत लिया था। जो भी हो, मुझे अपनी इस यात्रा में बहुत आनंद प्राप्त हो रहा था और शायद इसलिए मेरे मुख पर निरंतर मुस्कान बिखरी रहती थी। भरे हुए रास्ते पर, काम पर जाने की जल्दी में गाडी चलाने की झुंझलाहट से कोसों दूर, इस सुन्दर प्रदेश में इत्मीनान से मोटरसाईकल चलाने के आनंद ने मेरी सारी अच्छाईयां उभारकर सम्मुख प्रस्तुत कर दिया था।

सिगिरिया

सिगिरिया शिला - श्री लंका
सिगिरिया शिला – श्री लंका

सिगिरिया का कोबरा हुड गुफा मेरा अगला पड़ाव था। दाम्बुला शहर से १५कि.मी. दूर यह एक विश्व विरासत स्थल है। दंतकथाएं कहतीं हैं कि सीता अपहरण के पश्चात, रावण को भय था कि भगवान् राम के शुभचिंतक या सहयोगी देवी सीता को ढूँढ लेंगे। इसलिए वह देवी सीता को इश्त्तिपुरा, सीता पोकुना, उसनगोडा, सीता कोटुवा और अशोक वाटिका जैसे अनेक स्थलों पर निरंतर विस्थापित करता रहा। सिगिरिया स्थित कोबरा हुड गुफा अर्थात् नाग शीर्ष सदृश गुफा भी ऐसा ही एक स्थल है जहाँ रावण ने सीता को कैद कर रखा था।

लायन रॉक अर्थात् शेर शिला

सिगिरिया का अर्थ है शेर रुपी शिला अर्थात् लायन रॉक। यह प्राचीन श्रीलंका की राजधानी थी। अपने आप में अनोखी यह अन्य शिलाओं से घिरी, १८०मी. ऊंची विशाल शिला पर स्थित है। राजधानी के रूप में इसकी स्थापना राजा कश्यप के शासनकाल में हुआ था जब उसने अपने पिता को मार कर, इस राज्य के असली उत्तराधिकारी, अपने भ्राता मोगल्लाना से इसे छीना था। कश्यप ने इसकी संरचना रक्षात्मक किला व आमोद महल के रूप में की थी। विडम्बना देखिये, कुछ समय पश्चात, इस किले में ही कश्यप अपने भाई मगल्लाना से युद्ध में पराजित हो गया। तत्पश्चात इसे सन्यासियों के हवाले कर दिया गया और इस तरह इसके निर्माण के दोनों उद्देश्य असफल हो गए।

चूंकि सिगिरिया एक गढ़ था, उसमें सभी अनिवार्य रक्षात्मक संरचनाएं उपस्थित थीं जैसे प्राचीर, स्तंभ, मुख्य द्वार और खन्दक जिसमें किसी समय मगरमच्छ रखे गए थे। इनका उद्देश्य गुप्तचरों, शत्रुओं व गद्दारों से गढ़ के रहवासियों की रक्षा करना था। गढ़ के प्राचीर के भीतर, सिगिरिया शिला तक के मार्ग पर पानी, शिलाखण्ड और मेंड़ बगीचे बनाए गए थे।

दर्पण दीवार

पहाड़ी के आधे रस्ते पर एक दर्पण भित्त थी, अर्थात् पलस्तर दीवार जो किसी समय इतनी ज्यादा चमकदार थी कि यह कश्यप के लिए दर्पण का कार्य करती थी। इस दर्पण के पर्यटकों ने इतने दर्शन किये, इन पर अंकित प्राचीन भित्तिचित्रण इसको प्रमाणित करतें हैं। परन्तु समय के साथ साथ, कला के साथ अपवित्रता और अश्लीलता जुड़ने लगी और उसका एक अभिन्न अंग बनने लगी। आश्चर्य होता है कि “राजू रानी से प्रेम करता है”, मेरा बाप चोर है” या “इधर पेशाब करना मना है” जैसे प्रचारवाक्य जो इन पर्यटन स्थलों पर लिखे जातें हैं, भविष्य में क्या यह भी हमारे विरासत का हिस्सा माने जायेंगे?

भक्त हनुमान, राम्बोड़ा

भक्त हनुमान मंदिर - राम्बोदा पर्वत
भक्त हनुमान मंदिर – राम्बोदा पर्वत

भक्त हनुमान मंदिर, कैंडी से ५०कि.मी. दूर, राम्बोड़ा के पास नुवारा एलिया के रास्ते पर स्थित है। ऐसा मानना है कि भक्त हनुमान देवी सीता को खोजने यहाँ भी आये थे। यहाँ समीप ही सीता अश्रु कुण्ड है जो दंतकथाओं के अनुसार सीता देवी के अश्रुओं से बना है। यह वही स्थान है जहां दोनों सेनायें पहली बार एक दूसरे के समक्ष आयीं थीं। राम्बोड़ा पहाड़ी की तरफ भगवान् राम की सेना व दूसरी तरफ की रावण सेना राम्बोड़ा झील के दोनों तरफ खड़ीं थीं।

एक अनुभव

राम्बोड़ा के भक्त हनुमान मंदिर की स्थापना चिन्मय मिशन ने एक पहाड़ी के ऊपर की थी जहाँ से राम्बोड़ा झील दिखाई देता है। इस मंदिर के पास ही मुझे इस यात्रा का अब तक का सबसे ज्यादा नागवार अनुभव प्राप्त हुआ। जब मैं अपनी मोटरसाईकल चला कर जा रहा था, मुझे राजमार्ग के बीचोंबीच एक कुत्ते का पिल्ला किसी इंतज़ार में बैठा दिखाई पड़ा। मैंने सड़क के बाजू में मोटरसायकल खड़ी कर उसे उठाया और सड़क के बाजू रखा। पास की दूकान से उसके लिए कुछ खाने का सामान खरीदा और जैसे ही मुडा,मैंने देखा की वह शैतान पिल्ला फिर सड़क के बीचोंबीच बैठ गया था। मैं एक बार फिर उसकी तरफ बढ़ा पर इस बार वह भाग गया। मैं भी उसके पीछे भागा परन्तु हड़बड़ी में एक ट्रक के नीचे आते आते बचा।

जब तक ट्रक मेरे सामने से गुज़रा, उन कुछ क्षणों में ही वह गायब हो गया। मैं डर गया था कि वह ट्रक के नीचे आ गया। परन्तु एक राहगीर ने इशारे से बताया कि वह पास के एक घर में घुस गया था। मुझे उस पर इतना गुस्सा आया कि शायद मेरे सामने होता तो अवश्य उसे सबक सिखाता।

यात्रा के दौरान अनुभव और ज्ञानार्जन

कुत्ते के पिल्ले के गायब होते ही मुझे अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ जब मैंने सड़क बाजू खड़े कुछ लोगों को अपने ऊपर हंसते और लोटपोट होते देखा। बचीखुची इज्ज़त बचाने की कोशिश में मैं एक रेस्तरां में घुस गया। कुछ अच्छा काम करने जाएँ और उस पर भी लोग हम पर हंसें तो मन बहुत आहत होता है। परन्तु होटल के स्थूलकाय मालिक ने जोर से खिलखिलाते हुए मुझे समझाया तब मुझे अहसास हुआ कि लोग मुझ पर नहीं बल्कि उस पूरे घटनाचक्र पर हंस रहे थे। उसने वह पूरा दृश्य अपनी आँखों से देखा था। मुझ पर दया कर उसने रसोईघर फिर खोलने का भी प्रस्ताव दिया। खाने के पैसे देने पर उसने लेने से भी इनकार कर दिया। तब मैंने जाना कि दया, सहानुभूति और सहायता की इच्छा अभी लुप्त नहीं हुई है।

एडम चोटी

आदम छोटी - श्री लंका
आदम छोटी – श्री लंका

अगले कुछ दिनों में मैंने कैंडी, पोलोन्नारुवा, दाम्बुला, एडम चोटी और कई दूसरे स्थलों के दर्शन किये। कहा जाता है कि एडम चोटी पर भगवान शिव के पदचिन्ह अंकित हैं। अंततः मैं नुवारा एलिया से करीब ३०की.मी. दूर होर्टन मैदानी राष्ट्रीय उद्यान पहुंचा जिसे पाताल लोक अथवा विश्व का अंतिम स्थल भी कहा जाता है। यह वही स्थान है जहाँ अहिरावण ने राम और लक्षमण को बंदी बना कर रखा था। अपने पंचमुखी रूप में भगवान हनुमान ने उन्हें बाद में मुक्त कराया था।

“भगवान हनुमान ने अपने पंचमुखी रूप में राम और लक्षमण को अहिरावण से मुक्त कराया था।”

अशोक वाटिका

अशोक वाटिका - श्री लंका
अशोक वाटिका – श्री लंका

होर्टन मैदानी राष्ट्रीय उद्यान के समीप हकगला वाटिका अथवा अशोक वाटिका है जहां रावण ने देवी सीता को बंधक बना कर रखा था क्योंकि महारानी मंदोदरी ने उन्हें महल में लाने की अनुमति नहीं दी थी। यहीं पर हनुमान ने पहली बार देवी सीता से भेंट की थी और उन्हें भगवान राम की अंगूठी दी थी।

यह एक अविश्वसनीय रूप से खूबसूरत बगीचा था। यहाँ पौधों की हज़ारों प्रजातियाँ थीं जिन पर सैकड़ों तितलियाँ मंडरा रहीं थीं। कहा जाता है कि बसंत ऋतु में यह बगीचा सबसे खूबसूरत लगता है जब पौधे फूलों से भर जातें हैं। दुर्भाग्य से बसंत अभी बहुत दूर था।

सीता अम्मा मंदिर

हकगला वाटिका के दर्शन के पश्चात मैं सीता अम्मा मंदिर की ओर चल पड़ा जो सड़क के ठीक दूसरी तरफ था।किवदंतियां कहतीं हैं कि देवी सीता, मंदिर के पास स्थित नदी में स्नान करती थी। नदी के पास कई पत्थर थे जिन पर पैरों के पदचिन्ह थे। माना जाता है कि यह भगवान् हनुमान के पदचिन्ह हैं।

जीवन परिवर्तित करने वाला जो अनुभव मैंने यहाँ पाया, वह क्या मेरी नियति थी या मेरी अच्छी किस्मत! अभी भी कई बार इस बारे में सोच कर मैं अचंभित हो जाता हूँ।

यात्रा के कुछ और अनुभव

पूजा अर्चना करने के पश्चात मैं मंदिर के एक कोने में शांतिपूर्वक बैठ गया। एक छोटी सी बालिका मेरे पास आई व अपना कुछ प्रसाद एक बड़ी मुस्कराहट के साथ मेरे हाथ में रख दिया। उसकी मुस्कराहट ने मेरा दिल पिघलाकर रख दिया। मुझे अहसास हुआ कि बच्चे कितने मासूम और विश्वासी होते हैं। पर फिर मेरे दिल के किसी मानवद्वेषी कोने ने अपना सर उठाया और मुझे उस खतरे और विकट परिणाम के लिए आगाह किया जिसने इतने बार मेरे मन को उकसाया था। मन किया कि उस बालिका को डांट पिलाऊं कि यह दुनिया सुरक्षित स्थान नहीं है। बाहर इतने राक्षसी प्रवृत्ति के लोग हैं कि उसे अपने परिवारजनों के सानिध्य में सुरक्षित रहना चाहिए। परन्तु मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। क्यों? पता नहीं!

उस मासूम बालिका के हाथों दयालुता का प्रसाद ग्रहण कर उसकी मासूमियत पर प्रहार करना, क्रूरता और स्वार्थी बनने के सामान है। मैं उस निर्मलता और मानवता पर विश्वास की मूरत को अविरल निहारते रहना चाहता था। उसके मासूम हावभाव ने मुझे मेरे डर व अविश्वास को भुला दिया। लोगों पर विश्वास करना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था और इसी कारण मेरा अंतर्मन मलिन व क्लांत रहता था। यही अत्याचार मैं उस मासूम बालिका पर कैसे कर सकती थी।

मानवता

मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि उस वक्त मेरा कोई वजूद नहीं था। अगर उस वक्त कुछ अस्तित्व में था तो वह थी मेरी शंका।वह शंका जो हर इंसान के ऊपर मंडराती है, वह शंका जो हमें किसी अजनबी को देख मुस्कुराने से पहले सोचने पर मजबूर करती है, वह शंका जो हमें किसी से सहानुभूति के दो शब्द कहने व किसी की सहायता करने से रोकती है, उस शंका का आज अंत होना चाहिए। मुझे अभी इसी वक्त इस शंका को मारना होगा।

वैसे तो यह एक तुच्छ सी घटना थी, जिसे किसी और दिन मैंने ध्यान नहीं दिया होता। परन्तु उस स्थिति में उस घटना ने मेरे ऊपर बड़ा प्रभाव छोड़ा। इसे समझाना कठिन है परन्तु इस तरह कुछ अनुभव जीवन में आते हैं जो सही समय सही स्थान के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण बन जातें हैं। यह घटनाएँ तुच्छ भी हो सकतीं हैं जैसे पुस्तक की एक पंक्ति, चलचित्र का एक संवाद या घटना बड़ी भी हो सकती है जैसे एक दुर्घटना। परन्तु यही घटनाएँ हमारी जिंदगी बदल देती हैं। मेरे जीवन की इस घटना ने मानवता में मेरा विश्वास फिर जगा दिया।

दिवुरुम्पोला मंदिर, नुवारा एलिया

दिवुरुम्पोला मंदिर - श्री लंका
दिवुरुम्पोला मंदिर – श्री लंका

अगले दिन मैंने दिवुरुम्पोला मंदिर के दर्शन किये जो वेलिमडा की तरफ जाते मार्ग पर नुवारा एलिया से २०कि.मी. दूर स्थित है। पौराणिक कथाएं कहतीं हैं कि सीता देवी ने अपनी अग्नि परीक्षा इसी स्थान पर दी थी और यह मंदिर उन्हें ही समर्पित है। ‘दिवुरुम्पोला’ का अर्थ सिंहली भाषा में है सौगंध की धरती। यह मंदिर देवी सीता के सौगंध के लिए प्रसिद्ध है।स्थानीय लोग विवाद सुलझाने हेतु इस मंदिर में आ कर सौगंध दिलवाते हैं इस परिसर में स्थित बोधिवृक्ष बोध गया के उसी श्री महाबोधिवृक्ष का वंशज है जिसके नीचे बैठ कर भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

रावण मंदिर व गुफाएं

रावण मंदिर एवं गुफ़ा
रावण मंदिर एवं गुफ़ा

एला से करीब २कि.मी. दूर यह रावण मंदिर व गुफाएं स्थित हैं। रावण मंदिर बेहद छोटा है और आश्चर्यजनक रूप से यहाँ रावण की मूर्ती नहीं है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार से पहाड़ी की ५००मि. चड़ाई के पश्चात रावण गुफाएं पहुंचते हैं। माना जाता है कि पूरे श्रीलंका में फैले इन गुफाओं के जालों को रावण को बनवाया था। सुरंगों के इस जाल के पीछे रावण की मंशा अपने राज्य के विभिन्न ठिकानों को आपस में जोड़ना था व इसे गुप्त जासूसी, सैनिक सर्वेक्षण और पलायन हेतु उपयोग में लाना था। गुफाओं का मुख्य द्वार और मुख्य कक्ष दोनों विशाल थे। मुख्य कक्ष से ३ सुरंगें निकल रहीं थीं। पहली सुरंग सबसे लंबी थी जो २० फीट बाद समाप्त हो रही थी। दूसरी १० फीट लम्बी थी और तीसरी, सबसे छोटी, का दूसरा छोर बंद था।

उस्सनगोड नगर – जिसे हनुमान ने भस्म किया था

अपने यात्रा के अंतिम पड़ाव में मैं उस्सनगोड़ा पहुँचा। किवदंतियां कहतीं हैं उस्सनगोड़ा, रावण राज्य के उन नगरों में से एक है जिसे भगवान हनुमान ने जला दिया था। देवी सीता को खोजने के पश्चात, भगवान हनुमान ने रावण से भेंट करने का निश्चय किया। इसलिए उन्होंने स्वयं को, रावण के सबसे शक्तिशाली पुत्र, इन्द्रजीत के हाथों बंदी बनवा लिया। हनुमान को सबक सिखाने की मंशा से रावण ने अपने राक्षसों को उनकी पूंछ को आग लगाने की आज्ञा दी। हनुमान ने, रावण को अपनी शक्ति का परिचय देने हेतु, अपनी पूंछ को खूब लम्बी बना लिया व पूरे लंका में नाच नाच कर जलती पूंछ से पूरी लंका जला डाली। लंका को नष्ट करने के पश्चात उन्होंने उस्सनगोड़ा पर छलांग लगाई, जो विमानों से भरा विमानतल था, और उसे नेस्तनाबूत कर दिया।

कठिन स्थान निर्धारण

उस्संगोड़ - श्री लंका
उस्संगोड़ – श्री लंका

रामायण सम्बंधित कई स्थलों की तरह, उस्सनगोड़ा को भी ढूँढना बेहद कठिन था। नक़्शे में स्पष्ट स्थान निर्धारित था, हम्बनटोटा-तन्गल्ले राजमार्ग पर हम्बनटोटा से ३०कि.मी. दूर। परन्तु निर्धारित स्थान पहुँचाने पर मुझे कोई भी सूचना पट्टिका दिखाई नहीं दी, ना ही उस स्थान की जानकारी रखने वाला कोई इंसान! अंततः, एक उदार ह्रदय ने मुझ पर दया की और मुझे सही दिशा दिखाई। “राजमार्ग पर कारखाने से बाएं मुड़ कर सीधे रास्ते खड़ी चट्टान तक जाएँ, तत्पश्चात पैदल चलें।” मैंने कुछ समय उनकी दिशा निर्देशों का पालन किया परन्तु एक बार फिर रास्ता भटक गया। मेरे स्वयं का अंतर्ज्ञान या अंतर्दृष्टि भी निस्तेज हो चुकी थी इसलिए मैं उस चट्टान तक भी नहीं पहुँच पाया।

एक घंटा भटकने के पश्चात में एक छोटे बालक से टकराया जिसकी सहायता से मैं उस्सनगोड़ा पहुंचा। ३की.मी. घेरे का समतल दायरा घनी झाड़ियों से चारों ओर से घिरा हुआ था परन्तु दायरे के भीतर कोई भी झाडी नहीं थी। शायद हनुमान द्वारा लगाए गए आग ने यहाँ सब भस्म कर दिया था!

रुमस्सला

रुमसल्ला - श्री लंका
रुमसल्ला – श्री लंका

इस यात्रा का अंतिम पड़ाव मैंने रुमस्सला का दर्शन निहित किया था। यह उनवंतुना के पास स्थित एक छोटी पहाड़ी है। रामायण के युद्ध के दौरान लंका में इन्द्रजीत ने लक्षमण की जख्मी किया था। लक्षमण के गहरे जानलेवा जख्मों को देख भालुओं के राजा जाम्बवंत ने, उनके इलाज हेतु, हनुमान से ४ प्रकार की जड़ीबूटियाँ ले कर आने को कहा। यह वनौषधियाँ, मृत संजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी व सांधनी, सिर्फ हिमालय के ऋषभ पर्वत पर ही उपलब्ध थीं। हनुमान उड़ कर हिमालय तक पहुंचे, परन्तु वे वह वनौषधियों को पहचानने में असमर्थ थे। किसी उलझन में ना पड़ते हुए, उन्होंने सम्पूर्ण रिषभ पर्वत को ही उठा लिया और उड़ कर लंका पहुँच गए। मार्ग में इस पर्वत के टुकड़े कई जगह गिरे। यह जगहें हैं, सिरुमलाई(भारत), रुमस्सला, रितिगला, दौलकंदा, और तल्लदी। आज भी इन स्थानों से पारंपरिक चिकित्सक, जड़ीबूटियाँ एकत्र कर औषधियाँ बनातें हैं।

अन्य रामायण स्थल

लंका में इनके अलावा भी कई रामायण सम्बंधित स्थल हैं जिनके मैंने दर्शन किये थे। उनमें से कुछ हैं, नागदीप( जहां नागों की माता सुरसा देवी ने हनुमान की परीक्षा ली थी), कटरगामा (भगवान कार्तिकेय का मंदिर), सीता कोटूवा (जहां देवी सीता बंधक बना कर रखीं गईं थीं), नग्गला (वह पहाड़ी जहाँ से भगवान् राम के सेना को देखा गया था।), येहंगला (जहां रावण का पार्थिव शरीर दर्शनार्थ रखा गया था), केलनिया मंदिर (विभीषण मंदीर), कन्निया (रावण द्वारा बनवाये गए भूमिगत जलस्त्रोत) इत्यादि। यह संस्मरण पहले ही बहुत लम्बा हो जाने के कारण इनका उल्लेख मैं इस लेख में नहीं कर रहा हूँ।

अंत में यदि आप मुझसे यह सवाल करें कि इस यात्रा में जितने कष्ट मैंने सहे व जितनी मेहनत मैंने की, क्या इस तरह व इस परिमाण की यात्रा उस लायक थी? मेरा जवाब होगा, शत प्रतिशत हाँ! पूरे यात्रा में मैंने उन संकेतों का अनुभव किया जिन्होंने मुझे मेरे अंतर्मन के दर्शन कराये, अपनी आत्मा से एकाकार किया और श्रद्धा व विश्वास को आत्मसात करने में मेरी मदद की। मेरी श्रीलंका की यात्रा ने मानवता में मेरा विश्वास एक बार फिर जगा दिया और मुझे एक बेहतर इंसान बनने में मदद की। जीवन में क्या सिर्फ यही परम सत्य नहीं है?

यह संस्मरण “मंकीस, मोटरसायकल्स एंड मिसएडवेंचर्स” के लेखक हर्ष द्वारा अतिथी की हैसियत से प्रदत्त है। नक़्शे, चित्र व और अधिक जानकारी हेतु एम्एम्एम् की फेसबुक पेज पर जाएँ। उनकी पुस्तक की प्रति ‘यहाँ’ से खरीद सकतें हैं। पुस्तक की मेरे द्वारा की गयी समीक्षा ‘यहाँ’ उपलब्ध है।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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