रसिकप्रिया- कवि केशवदास कृत बुंदेली गीत गोविन्द

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गीत गोविन्द के नाम से परिचित न हो ऐसा कोई मनुष्य विरले ही होगा। बारहवीं शती में जयदेव कवि द्वारा रचित यह ग्रन्थ श्रृंगार रस स्वरुप का परिचायक है। एक एक अष्टपदी में जिस प्रकार जयदेव ने नायक नायिका स्वरुप में श्री राधा-कृष्ण का काव्य चित्रण किया है वैसा आपको उस काल में या उसके आगे आने वाली कई  शताब्दियों में सहज देखने को नहीं मिलता। परन्तु ऐसा ही एक काव्य ग्रन्थ सोलहवीं शती में एक कवि द्वारा बुंदेलखंड की धरती पर लिखा गया। बुंदेली साहित्य एवं संस्कृति ने भारतीय सांस्कृतिक निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया है। बुंदेली कला के साथ साथ यहां की काव्य  परम्परा भी उतनी ही अद्भुत रही है। बिहारी, मतिराम, पद्माकर आदि जैसे कवियों ने बुंदेली धरा को अपने काव्य धारा से ओतप्रोत रखा। उसी में से एक हुए थे कवि केशवदास ।

Kavi Keshavdas Bundelkhand
कवि केशवदास (स्रोत – अज्ञात )

केशवदास का जन्म ओरछा के एक सनाढ्य ब्राम्हण श्री काशीनाथ मिश्रा जी के घर सम्वत 1618 (ई 1555) में हुआ था। इनके पितामह, पिताजी और बड़े भाई स्वयं साहित्य सेवा में रत थे तथा समकालीन राजपरिवार द्वारा उनके परिवारी जनों का सम्मान होता रहा। इसी श्रेणी में केशवदास को ओरछा नरेश रामसिंह के दरबार में नवरत्न की उपाधि मिली। रामसिंह के छोटे भाई ने तो केशव को अपना गुरु मान 22 गाँव भेट स्वरुप प्रदान कर दिए थे।

गीत गोविन्द में राधा और कृष्ण को नायक नायिका रूप देकर जहां जयदेव अभिनव कवि कहलाये वही मैथिलि में लिखते हुए विद्यापति ने सौंदर्य चित्रण एवं रसनिरूपण द्वारा इस रस को आगे बढ़ाया। सूरदास ने बाल रूप का चित्रण किया है उसके पार तो अभी तक कोई कवि पहुँच ही नहीं पाया है। परन्तु श्री राधा एवं कृष्ण आंतरिक सूक्ष्म मनोभावों को जिस तरह से केशवदास ने अपने ग्रन्थ रसिकप्रिया में परिणित किया है वैसा और कही देखने को नहीं मिलता।

पहाड़ी शैली में राधा कृष्ण
पहाड़ी शैली में राधा कृष्ण (स्रोत्र – काँगड़ा आर्ट्स)

रसिकप्रिया ग्रन्थ का प्रणयन राजा इंद्रजीत से सम्वत 1648  शुक्ल सप्तमी, सोमवार के दिन हुआ था। इस ग्रन्थ में सोलह प्रभाव/ अध्याय है। रसिकप्रिया में  कवि केशव ने राधा कृष्ण द्वारा  श्रृंगार रस का अत्यंत सूक्ष्मता से शब्द चित्र प्रस्तुत किया है। प्रथम अध्याय में राजधानी ओरछा, राजवंश तथा इस ग्रन्थ को लिखने का कारण दिया गया है। दूसरे में नायक का सविस्तार वर्णन, तीसरे में नायिका का सविस्तार वर्णन, चौथे में विभिन्न रूप से नायक-नायिका के मिलन का वर्णन, पांचवे में नायिका किस-किस प्रकार से नायक से मिलने का प्रयास करती है उसका वर्णन, छठे में विभिन्न श्रृंगार भाव निरूपण,सातवें में नायिकाओं के विभिन्न प्रकार का वर्णन, आठवें में दस विरह अवस्थाओं का वर्णन, नौंवे में नायक की मानलीला का वर्णन, दसवे में नायक द्वारा नायिका को मानाने के लिए किये गए उपायों का वर्णन, ग्यारवे में वियोग का वर्णन, बारवे में विभिन्न प्रकार की सखियों का वर्णन, तेरहवें में सखियों द्वारा नायक-नायिका का मिलन कराने के उपाय का वर्णन, चौदहवें और पन्द्रहवें में विविध रसो में नायक-नायिका का निरूपण हुआ है तथा अंतिम अध्याय में अनरस का वर्णन किया गया है।

रसिकप्रिया में उल्लेखित कुछ भाव इस प्रकार है :-

प्रथम मिलन

राधा-कृष्ण कुञ्ज में, कांगड़ा शैली
राधा-कृष्ण कुञ्ज में, कांगड़ा शैली, ई 1780 (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

हसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बुझत पहेली जाल।
केसोदास नींदबस अपने अपने घर,
हरें हरें उठि गए बालिका सकल बाल।
घोरि उठे गगन सघन घन चंहु दिसि,
उठि चले कान्ह धाईं बोलि उठी तिन्ही काल।
आधी रात अधिक अँध्यारे माँझ जै हो कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोई रहौ प्यारे लाल।

केशवदास कहते है कि ‘हँसते हँसते तथा कहानी पहेली बुझाते बुझाते अँधेरा हो गया है। मेघो के उमड़ने से चन्द्रमा की कांति फीकी पड़ गई है। नींद के कारण ग्वाल और गोपी भी अपने-अपने घर चले गए है। उधर आकाश में घनघोर घटा गरजते ही कृष्ण उठकर चलने लगे। उसी समय कृष्ण की सखी ने कहा कि अर्धरात्रि में इस अंधकार में आप कहां जा पाओगे? अतः आज आप राधिका जी के संग उनकी आधी शैय्या पर ही शयन कर लो।”

राधा कृष्ण का रमण

राधा कृष्ण रमण करते हुए , कांगड़ा शैली, ई 1820
राधा कृष्ण रमण करते हुए , कांगड़ा शैली, ई 1820 (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

घननि की घोर सुनि, मोरनि को सोर सुनि,
सुनि सुनि केसव अलाप अलीजन को।
दामिनी दमक देखि देह की दिपति देखि,
देखि सुभ सेज देखि सदन सुबन को।
कुंकुम की बास घनसार की सुबास भयो,
फुलनि की बास मन फूलिकै मिलन को।
हँसि हँसि बोले दोउ अनहि मनाएँ मान,
छूटी गयो एकै बार राधिका रमन को।

केशवदास कहते है कि ” घनघोर घटा और बिजली की गड़गड़ाहट के साथ मंद-मंद हल्के झोकें, मयूर की कूक तथा सखियों के गान ने राधा को इतना आनन्दोन्मत्त कर दिया है कि वह बिन मनाये ही केसर कपूर से सुगन्धित शैय्या पर श्री कृष्ण से रमण हेतु जा पहुंची है।

श्रावण मास वर्णन

राधा-कृष्ण वर्षा ऋतु का आनंद लेते हुए, कांगड़ा शैली,
राधा-कृष्ण वर्षा ऋतु का आनंद लेते हुए, कांगड़ा शैली, (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

केसव सरिता सकल मिलत सागर मन मोहै।
ललिता लता लपटाति तरुन तन तरुबर सोहै।।
रूचि चपला मिलि मेघ चपल चमकत चंहु औरन।
मन भावन कँह भेंट भूमि कूजत मिसि मोरन।।
इहि गमन की को कहै गमन न सुनियत सावनै।।

केशव कवि कहते है कि श्रावण मास में वर्षा से नदियों में बाढ़ आने से समुद्र में मिलते दृश्य को देख कितना सुखद आनंद होता है। छोटे छोटे जीव जंतु वर्षा से प्रसन्न हो वृक्षों पर विहार कर रहे है। बिजली कड़क कर बादलो से झांकती प्रतीत होती है। मयूर वर्षा से प्रसन्न हो धरती और आकाश के मिलान की मधुर स्वर से पुकार कर रहे है। इसी प्रकार प्रेमी-प्रेमिका के मिलन का यह मास कब किसे घर से बाहर जाने को कहेगा?

रसिकप्रिया के अतिरिक्त कवि केशवदास जी ने अन्य अनेक रचनाएँ और भी की है। कविप्रिया, रामचंद्रिका, रतन बावनी, जहांगीर जस चन्द्रिका, वीरसिंह देव चरित, विज्ञान गीता, नख शिख वर्णन इत्यादि उनकी प्रमुख रचनाओं में सम्मिलित है। उनके बढ़ते वैभव को देख स्वयं मुग़ल शासक अकबर ने उनको आगरा में अपने दरबार में बुलाया था। दरबार में उनके काव्य कौशल को देख वह आश्चर्य चकित हो गए थे।उसके बाद मुग़ल दरबार में बढ़ी लोकप्रियता के कारण रसिकप्रिया पर चित्र निर्माण करने के लिए विभिन्न हिन्दू राजाओं ने अपने चित्रकारों को प्रेरित किया। साथ ही ईस्वी 1634 तक रसिकप्रिया मालवा के चित्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गया। मेवाड़ राज्य में राणा जगतसिंह प्रथम (ई 1628-1652) में उनके राज्य में आश्रित चित्रकार साहिबिददीन ने रसिकप्रिया का चित्रण किया। साथ ही बीकानेर राज्य में महाराजा अनूपसिंह ई (1669-1698) के राज्य में आश्रितस चित्रकारों ने रसिकप्रिया का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया।

रसिकप्रिया का आधार वात्सायन का कामसूत्र तथा रूद्रभट्ट का श्रृंगार तिलक है। केशवदास ने नवरस के माध्यम से कृष्ण को केंद्र कर रसिको को मुग्ध कर दिया है। वो लिखते है की रसिको के लिए रसिकप्रिया बनी है। अतः आशा है रसिकजन इस छोटे से लेख को पढ़ने के बाद रसिकप्रिया का आनंद स्वयं ले।

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यह है हमारी यात्रा काव्य श्रंखला में एक अतिथि लेख है जिसे श्री सुशांत भारती जी ने भेजा है।


सुशांत भारती योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, नई दिल्ली से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त संरक्षण स्थापति है। उन्होंने अपनी स्नातक उपाधि वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्टर, नयी दिल्ली से की है। भारतीय परिपेक्ष्य में कला एवं संस्कृति को समझने एवं अध्ययन हेतु उनकी विशेष रूचि रही है। ब्रजस्थ परम्परा के अंतर्गत मूर्त एवं अमूर्त संस्कृति तथा मंदिर स्थापत्य उनके शोध के मुख्य विषय है। वर्तमान में वह राष्ट्रिय संग्रहालय संस्थान, नई दिल्ली में शोध सहायक के रूप में कार्यरत है।


 

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