शांतिनिकेतन – रवींद्रनाथ ठाकुर का स्वप्निल विश्व भारती विद्यालय

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शांतिनिकेतन – शिक्षा की इस नगरी का नाम सुनते ही नयनों के समक्ष रवींद्र नाथ ठाकुर की छवि प्रकट हो जाती है। बालपन से हमने रवींद्रनाथ ठाकुर एवं उनकी कर्म भूमि शांतिनिकेतन के विषय में सुना एवं पढ़ा था। लंबे समय से इस शांतिनिकेतन के दर्शन करने की मेरी तीव्र इच्छा थी। इसीलिए जब मैं बोलपुर रेल स्थानक पर उतरी तब मैं अत्यंत रोमांचित थी। मेरी सम्पूर्ण देह पर रोंगटे खड़े हो रहे थे। ऐसा मेरे साथ उस समय होता है जब किसी स्थान के दर्शन करने की मेरी बहुप्रतीक्षित इच्छा अंततः पूर्ण होती है।

शांतिनिकेतन का इतिहास

शांतिनिकेतन का ब्रह्मा मंदिर
शांतिनिकेतन का ब्रह्मा मंदिर

शांतिनिकेतन की स्थापना सन् १८६० के आसपास देवेंद्रनाथ ठाकुर ने की थी। शांतिनिकेतन की भूमि पर सदैव ठाकुर परिवार का स्वामित्व था किन्तु किसी समय वहाँ कदाचित डकैत बसते थे। यहाँ तक कि इस स्थान का नाम भी उन्ही में से एक डकैत के नाम पर था, भुबन डकत। इस स्थान की लाल माटी तथा छतिम वृक्षों(सप्तपर्णी) से परिपूर्ण परिदृश्यों को देखते ही देवेंद्रनाथ मंत्रमुग्ध हो गए थे। उन्होंने स्वयं के लिए यहीं एक भवन का निर्माण कराने का निश्चय किया। उन्होंने अपने उस भवन का नाम शांतिनिकेतन रखा। उस समय उन्हे रत्ती भर भी कल्पना नहीं थी कि एक दिन यही नाम संस्कृति के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हो जाएगा। शांतिनिकेतन का शब्दशः अर्थ है, शांति का आवास। कालांतर में इस आवास ने आश्रम का रूप ले लिया जो ध्यान-उपासना के लिए तथा आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में आए प्रत्येक साधक के लिए खुला था। इस स्थान ने बंगाल के ब्रह्म समाज आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

देवेंद्रनाथ के सुपुत्र रबीन्द्रनाथ ने यहीं पाठभवन आरंभ किया जो ५ विद्यार्थियों की एक लघु पाठशाला थी। कक्षा के भीतर बैठकर अध्ययन करने के स्थान पर बाहर, प्रकृति के सानिध्य में अध्ययन करना, यही उनकी संकल्पना थी। कालांतर में यह व्यवस्था आश्रम प्रणाली के रूप में प्रसिद्ध हुई। मेरे अनुमान से यह प्राचीन गुरु-शिष्य प्रणाली एवं आधुनिक कक्षा प्रणाली का उत्तम संगम है। आज भी आप यहाँ विशाल वृक्षों की छाँव में कक्षा लगते देख सकते हैं।

आज यह छोटी सी पाठशाला विकसित होकर एक विश्व विश्वविद्यालय बन गयी है।

शांतिनिकेतन का सार्थक साक्षात्कार कैसे करें ?

शांतिनिकेतन के अधिकांश आकर्षण आप एक दिन में ही देख सकते हैं। यहाँ मैंने शांतिनिकेतन के आकर्षणों के एक सार्थक अवलोकन के संबंध में मार्गदर्शन करने का प्रयास किया है। आशा है इससे आपको लाभ अवश्य होगा।

रबीन्द्र भवन संग्रहालय (ठाकुर संग्रहालय)

रबीन्द्र भवन संग्रहालय
रबीन्द्र भवन संग्रहालय

उत्तरायण संकुल के अनेक घरों में से एक घर में यह लघु किन्तु रोचक संग्रहालय स्थित है। सम्पूर्ण संग्रहालय रबीन्द्रनाथ ठाकुर को समर्पित है। इस संग्रहालय का सर्वाधिक विशेष आकर्षण था ठाकुर को प्रदत्त नोबल पुरस्कार का पदक जो कुछ वर्षों पूर्व यहाँ से चोरी हो गया। उसके पश्चात यहाँ के कर्मचारी अधिक सतर्क हो गए हैं। यहाँ कर्मचारियों एवं चौकीदारों की इतनी अधिक संख्या देख मैं अचंभित थी। यहाँ अधिकांश समय कर्मचारियों एवं चौकीदारों की संख्या दर्शकों एवं पर्यटकों की संख्या से अधिक होती है।

गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर की कार
गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर की कार

संग्रहालय दर्शन ठाकुर परिवार की वंशावली से आरंभ होता है। यहाँ पात्र, कंघे, पूजा की वस्तुएं एवं औषधि पेटी जैसी परिवार के व्यक्तिगत वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है। ठाकुर परिवार को चीन, फ्रांस, जापान तथा रोम से उपहार में प्राप्त कलाकृतियों का संग्रह है। रबीन्द्रनाथ ठाकुर की व्यक्तिगत वस्तुएँ, जैसे उनकी चित्रकारी के संबंधित वस्तुएं, तूलिकाएं, रंग इत्यादि का भी संग्रह है।

संग्रहालय में रबीन्द्रनाथ ठाकुर का पासपोर्ट भी है जो एक पत्र के रूप में है। ज्ञात नहीं भारत में कब पासपोर्ट आज की पुस्तिका के रूप में प्रचलन में आई।

संग्रहालय में अनेक छायाचित्र हैं। एक छायाचित्र में स्वयं ठाकुर को ही चित्रकारी करते दर्शाया गया है। गांधीजी, आइन्स्टाइन, सिग्मंड फ्रायड, जार्ज बर्नार्ड शा, हेलेन एडम्स केलर, सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू तथा उस काल के अन्य अनेक दिग्गज महानुभावों से ठाकुर की भेंट से संबंधी अनेक आलेख हैं। उनसे किये गए अनेक पत्र-व्यवहार भी प्रदर्शित किये गए हैं।

यहाँ सभी कुछ बंगाली भाषा में लिखा गया है। संग्रहालय तथा उत्तरायण के अन्य विभागों में यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवरोध था। हिन्दी अथवा अंग्रेजी भाषा में उनका अनुवाद अवश्य होना चाहिए था।

संग्रहालय के भीतर छायाचित्र लेने की अनुमति नहीं है।

उत्तरायण संकुल

उत्तारायण संकुल का एक घर
उत्तारायण संकुल का एक घर

उत्तरायण संकुल में ठाकुर परिवार के सदस्यों द्वारा निर्मित अनेक घर हैं। उनमें कुछ के नाम हैं, उदयन, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च तथा उदीची। प्रथम दर्शन में, हल्के पीले एवं श्वेत रंगों में रंगी भित्तियाँ तथा लाल रंग में रंगे जमीन वाले ये घर अत्यंत सादे प्रतीत होते हैं। इनकी भव्यता इनमें प्रदर्शित वस्तुओं से आती है। एक घर के बाहर एक छपाई यंत्र रखा हुआ है। एक गैरेज में रवींद्रनाथ ठाकुर की कार रखी हुई है। कुछ घरों में उत्कृष्ट नक्काशीदार लकड़ी की पट्टिकाएं हैं। कुछ घरों में मैंने सुंदर दीवान देखे जिन पर उत्कृष्ट साज-सज्जा की हुई थी।

छपाई मशीन
छपाई मशीन

बागीचों में सुंदर पेड़-पौधे तथा उत्कृष्ट शिल्पकलाएं एक दूसरे से प्रतियोगिता करते प्रतीत होते हैं।

एक खुली ड्योढ़ी है जिसे मृणमोई कहा जाता है।

संथाल परिवार को दर्शाती एक कलाकृति
संथाल परिवार को दर्शाती एक कलाकृति

असंख्य शाखाओं से युक्त एक विशाल बरगद का वृक्ष है जो अनेक वर्षों से यहीं अबाधित खड़ा है। उसे देख ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह मुझे कह रहा है कि वह इस स्थान पर तब से है जब यह स्थल एक झोपड़ी से अधिक कुछ नहीं था।

एक मैदान में एक संथाल परिवार का एक प्रसिद्ध शिल्प है।

शांतिनिकेतन के सर्व खुले प्रांगणों में तथा घरों के मध्य अनेक कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। कुछ समय पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि कला शांतिनिकेतन की संस्कृति का ही एक अभिन्न अंग है। इस नगरी में आप कहीं भी खड़े हो जाएँ आप अपने चारों ओर अनेक कलाकृतियाँ देखेंगे। उनमें से कुछ नन्द लाल बोस जैसे प्रतिष्ठित कलाकारों की कलाकृतियाँ हैं। अधिकतर कलाकार शांतिनिकेतन के ही विद्यार्थी थे।

शांतिनिकेतन के विश्व भारती में पदयात्रा

विश्व भारती के प्रवेश द्वार पर संस्कृत शिलालेख
विश्व भारती के प्रवेश द्वार पर संस्कृत शिलालेख

हमने यह पदभ्रमण ब्रह्म मंदिर अर्थात् उपासना गृह से आरंभ की। लोहे के प्रवेशद्वार के पीछे संगमरमर की पट्टिका में संस्कृत में एक श्लोक लिखा हुआ था।

बाग के मध्य में कांच का एक अलंकृत कक्ष है। यह ठीक वैसा ही है जैसा आप बहुधा अंग्रेजों द्वारा पीछे छोड़े गए बगीचों में देखते हैं। यह वास्तव में ब्रह्म मंदिर है। यह कुछ विशेष दिवसों में ही खुलता है। सामान्यतः वर्ष का अधिकांश काल यह बंद ही रहता है।

खुले प्रांगण में विद्यालय
खुले प्रांगण में विद्यालय

यहाँ से भीतर की ओर जाते हुए हम कुछ दूर और गए। वहाँ हमने मुक्तांगण कक्षा देखी। एक प्राचीन वृक्ष के चारों ओर कम ऊंचायी के गोलाकार तख्त रखे हुए थे।लाल चौखट के ऊपर एक घंटी लटकी हुई थी। यह चौखट सांची स्तूप के तोरण का सादा रूप प्रतीत हो रहा था।

चित्रकारी

शान्तिनिकेतन के चित्रकारी विभाग का प्रवेश द्वार
शान्तिनिकेतन के चित्रकारी विभाग का प्रवेश द्वार

विश्वविद्यालय की संरचना सादी अवश्य थी किन्तु उसमें भारतीय तथा इस्लामी वास्तुकला की झलक स्पष्ट विदित होती है। हमारे गाइड ने हमें वह वसतिगृह दिखाया जहाँ इंदिरा गांधी ने कुछ समय के लिए निवास किया था। कुछ इमारतों पर उत्कृष्ट चित्रकारी की गई थी। उस काल के कुछ प्रतिष्ठित चित्रकारों द्वारा चित्रित मूल कृतियाँ अब भी संरक्षित कर रखी हुई हैं।

विश्व भारती के डिजाइन स्कूल ने तो मुझे झकझोर कर रख दिया। काले रंग की इस इमारत पर श्वेत रंग में अनेक भित्तिचित्र हैं जो अत्यंत आकर्षक हैं। समीप ही एक अन्य संरचना पर भी काले रंग में कलाकारी की गई है किन्तु यह उभरी हुई शिल्पकारी है।

विश्व भारती का डिजाईन विद्यालय
विश्व भारती का डिजाईन विद्यालय

विश्वविद्यालय के तात्कालिक विद्यार्थी अनेक कलाकृतियाँ रचने में व्यस्त थे। वे इस सम्पूर्ण कला क्षेत्र की कलामय आभा में सम्मोहक वृद्धि कर रहे थे। मैंने कुछ विद्यार्थियों से वार्तालाप किया तथा उनसे उनके कलाक्षेत्र के विषय में अधिक जानने का प्रयत्न किया। सम्पूर्ण वातावरण अत्यंत रचनात्मक हो रहा था। ऐसा वातावरण किसी की भी रचनात्मकता को उभरने एवं फलने-फूलने का भरपूर अवसर प्रदान करता है।

पौराणिक कथाओं का चित्रण
पौराणिक कथाओं का चित्रण

रेशमी आभा लिए एक इमारत की सम्पूर्ण सतह पर बंगाली भाषा में स्तोत्र लिखे हुए थे। उस समय मुझे अत्यंत खेद हुआ कि मुझे बंगाली भाषा का ज्ञान नहीं है।

रेशमी आभा पर बंगाली काव्य
रेशमी आभा पर बंगाली काव्य

एक अन्य भित्ति पर एलोरा के कुछ दृश्यों के प्रतिरूप चित्रित हैं।

एलोरा के शिल्प का प्रतिरूप
एलोरा के शिल्प का प्रतिरूप

छोटी छोटी झोपड़ियों को यहाँ के विद्यार्थी कलाकारों ने नवीन रूप प्रदान कर उन्हे अत्यंत दर्शनीय बना दिया है। एक झोपड़ी जिस पर कांच के रंगीन टुकड़ों से सजावट की है, मुझे अत्यधिक भाई।

कलात्मक झोंपड़ी
कलात्मक झोंपड़ी

रवींद्रनाथ ठाकुर का तेज

शांतिनिकेतन संकुल के भीतर भ्रमण करना १०० वर्ष पूर्व के भारत में भ्रमण करने जैसा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो रबीन्द्रनाथ ठाकुर अभी उनके किसी एक घर से बाहर आ जाएंगे। ऐसा लगता है जैसे वे अभी किसी विद्यालय से बाहर आकार आपसे चर्चा करेंगे। वे प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं आते किन्तु शांतिनिकेतन के कोने कोने में उनके द्वारा रचित प्रत्येक स्थल के द्वारा वे आपसे अपरोक्ष रूप में वार्तालाप करते प्रतीत होते हैं।

विश्व भारती - शांतिनिकेतन
विश्व भारती – शांतिनिकेतन

मई का मास था। पीले चटक रंग के अमलतास के पुष्प सम्पूर्ण संकुल को सुनहरी आभा प्रदान कर रहे थे। उनके कारण शांतिनिकेतन का परिसर अत्यंत उजला एवं चमकीला प्रतीत हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रकृति कवि एवं दार्शनिक रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित कृतियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही है।

सृजनी शिल्पग्राम

विश्व भारती से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक शिल्पग्राम है जो भारत की आदिवासी जनजातियों की धरोहरों का उत्सव मनाता है। यहाँ भारत के अधिकांश आदिवासी क्षेत्रों के आदिवासी जनजातियों द्वारा रचित भित्तिचित्र तथा अन्य अनेक प्रकार की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।

बंगाल के आदिवासी जीवन का चित्रण
बंगाल के आदिवासी जीवन का चित्रण

सृजनी शिल्पग्राम के भित्तिचित्रों पर प्रथक संस्करण प्रकाशित करने का मेरा विचार है। अतः यहाँ उनके विषय में अधिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत नहीं कर रही हूँ।

आदिवासी कला एवं भित्तिचित्रों के प्रति अपनी रुचि के अनुसार आप यहाँ १ से २ घंटों का समय व्यतीत कर सकते हैं। इस स्थान को आप सम्पूर्ण कभी भी नहीं कह सकते। यहाँ कला एवं कलाकृतियों का सतत विकास होता रहता है। अतः यहाँ कार्य सदैव प्रगति पर रहता है।

अमर कुटीर

अमर कुटीर हस्तकला द्वारा निर्मित वस्तुओं की एक दुकान है जहाँ से आप शिल्पग्राम में ही हाथों से बनी कलाकृतियाँ क्रय कर सकते हैं। यहाँ से क्रय करने योग्य वस्तुओं में अधिक प्रचलित हैं, परिधान, वस्त्र, ढोकरा शिल्पकला की कलाकृतियाँ, नारियल की कवटी से बने कृत्रिम आभूषण, चमड़े की वस्तुएं इत्यादि।

शांतिनिकेतन में बाउल संप्रदाय का संगीत

बाउल बंगाल का एक वैष्णव संप्रदाय है। बंगाल के जिस क्षेत्र में शांतिनिकेतन स्थित है वह क्षेत्र बाउल गायकों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। हमारा सौभाग्य था कि उस दिन अमर कुटीर के निकट एक वृक्ष के नीचे बैठकर गाते एक बाउल गायक से हमने भेंट की। उसके द्वारा गायी गयी रवींद्रनाथ ठाकुर की रचना ‘एकला चलो रे’ का हमने भरपूर आनंद उठाया।

मैं उस गायक से इतना प्रभावित हुई कि मैंने एक सम्पूर्ण संस्करण उस पर समर्पित कर दिया। उस संस्करण का नाम है, ‘एकला चलो रे’।

यात्रा सुझाव

टुक-टुक - शांतिनिकेतन देखने का सबसे बढ़िया साधन
टुक-टुक – शांतिनिकेतन देखने का सबसे बढ़िया साधन

शांतिनिकेतन कोलकाता से रेल व सड़क मार्ग द्वारा सुविधाजनक रूप से जुड़ा हुआ है। रेल मार्ग पर निकटतम स्थानक बोलपुर है। यह शांतिनिकेतन से अत्यंत समीप स्थित है। वास्तव में बोलपुर स्थानक पर ही आपको शांतिनिकेतन की प्रथम झलक प्राप्त हो जाएगी।

हमने ठहरने की व्यवस्था नगर के पश्चिम बंगाल पर्यटन लॉज में की थी। यह लॉज अधिकतर पर्यटन स्थल से पैदल चलने लायक दूरी पर स्थित है। बैटरी चालित रिक्शा अथवा टुक-टुक भी सभी स्थानों पर उपलब्ध हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कर्म स्थली शांतिनिकेतन के बारे में बहुत ही सुंदर आलेख । प्रकृति के सानिध्य में बैठकर अध्ययन करने की,गुरूदेव की संकल्पना,उनके कवि ह्रदय के प्रकृति प्रेम को दर्शाता है । वर्तमान आधुनिक दौर में भी उनकी यह संकल्पना आज भी जीवित है यह सुखद ही है !
    साथ के वीडीयो में गुरूदेव की कालजयी रचना”एकला चालो रे” वहीं के ही एक बाउल गायक ने कर्णप्रिय सुरों में गाई है ।
    यह एक विडम्बना ही हैं कि वर्षों पूर्व संग्रहालय से चोरी हुआ गुरूदेव रवीन्द्रनाथ जी का नोबेल पदक आज भी अप्राप्य हैं ।
    सुंदर पठनीय आलेख हेतू साधुवाद !

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