बेट द्वारका महाभारत की स्वर्णिम नगरी के दर्शनीय स्थल

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बेट द्वारका को ले जाती नावें
बेट द्वारका को ले जाती नावें

कुछ दिनों पूर्व मुझे गुजरात के द्वारका की यात्रा का अनमोल अवसर प्राप्त हुआ था। मैंने इस अवसर का पूर्ण लाभ उठाने का निश्चय किया तथा बेट द्वारका को अपनी यात्रा कार्यक्रम में प्रथम स्थान पर रखा। प्रातः अपने होटल से हम बेट द्वारका पहुँचने के लिए निकले। हमारे होटल से बेट द्वारका लगभग ३५ की.मी. दूर था जिसका ३० की.मी. भाग सड़क मार्ग से तथा ५ की.मी. भाग समुद्र मार्ग से पूर्ण करना था। इसके पश्चात ही हमें बेट द्वारका में चरण रखने का सुख प्राप्त होने वाला था। बेट द्वारका एक द्वीप है जिसे शंखोधर भी कहा जाता है।

द्वारका से बेट द्वारका की ओर

ओखा से बेट द्वारका की और
ओखा से बेट द्वारका की और

जब हम सड़क मार्ग द्वारा द्वारका नगरी पार कर रहे थे, हमने बाईं ओर गोमती द्वारका देखी तथा दायीं ओर रुक्मिणी मंदिर। कुछ क्षण पश्चात हम एक वीरान शुष्क मैदानी क्षेत्र पार कर रहे थे। शनैः शनैः हमारे समक्ष हल्के भूरे रंग के उतार चड़ाव लिए छोटे बड़े कई टीले आये। वे सर्व असंसाधित या कच्चे नमक के टीले थे। टाटा नमक आप सब ने खाया होगा। इसी टाटा नमक के निर्माता टाटा केमिकल्स का निर्माण कारखाना यहीं गोमती द्वारका तथा बेट द्वारका के मध्य स्थित मीठापुर में है। मीठापुर अर्थात नमक नगरी, क्योंकि गुजराती भाषा में नमक को मीठ कहा जाता है। मेरे गुजराती मित्र मीठापुर के विषय में अवश्य जानते होंगे। जैसे जैसे हम आगे बढे, हमारे बाईं ओर भारतीय नौसेना के कार्यालय आये तथा दायीं ओर धीरे धीरे रंगबिरंगी नौकाओं से भरी जेट्टी प्रकट होने लगी थी।

बेट द्वारका की ओर नौका सवारी

मन बहलाती सामुद्रिक चिड़िया - बेट द्वारका
मन बहलाती सामुद्रिक चिड़िया

नौका द्वारा बेट द्वारका की बची दूरी पूर्ण करने के लिए हम एक पगडंडी से जेट्टी की ओर बड़े। दोनों ओर दुकानों की कतारें थीं जो मूंगा, सीपियाँ, कौंच, समुद्री पौधे, लकड़ी के खिलौने, पूजा सामग्री आदि बेच रहे थे।

जेट्टी पहुँचने पर नौकाओं की कतार दिखी किन्तु उनमें से एक नौका ही यात्रियों को उस पार पहुंचा रही थी। हम भी पहले से ही भरी उस नौका में चढ़ गए। अनोखा तथ्य तो कुछ क्षण पश्चात सामने आया। हम नौका को भरी समझ रहे थे किन्तु नौका चालक हमसे सहमत नहीं था। उसे तो अपनी नौका कगार तक भरनी थी ताकि अधिक से अधिक यात्रियों को बिठा सके तथा उतनी अधिक कमाई हो सके। मुझे शहरों में दौड़ते परिवहन साधनों की स्मृति ताजा हो आयी। उनके चालकों के सामान यहाँ भी एक नौजवान चालक घूम घूम कर यात्रियों के मध्य स्थान बनाने का प्रयत्न कर रहा था ताकि वो और अधिक यात्रियों को बिठा सके। उस पर रुष्ट होकर भी क्या होगा? अंततः यह एक जनसामान्य की नौका थी तथा  प्रत्येक यात्री के लिए शुल्क मात्र २० रुपये ही था।

यदि आप बेट द्वारका तक की स्वच्छंद शांतिपूर्ण यात्रा चाहते हों तो अपने लिए पूर्णतः निजी नौका सेवा भी प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि इस सुविधा के लिए जेब कुछ अधिक हलकी करनी पड़ेगी क्योंकि ऐसी सुविधाओं का शुल्क लगभग २०००रुपये तक है।

समुद्र से निकले उपहार - पाषाण एवं सीपियाँ - बेट द्वारका
समुद्र से निकले उपहार – पाषाण एवं सीपियाँ

बेट द्वारका के लिए नौका सवारी लगभग १० से १५ मिनटों की है। यद्यपि समय अधिक नहीं है, फिर भी समुद्री पक्षियों की जल अठखेलियाँ देखते यह समय भी कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। नौका चढ़ने से पूर्व ही आप चिड़ियों तथा मत्स्यों के लिए दाना अवश्य खरीद लें। इसी दाने को जल में बिखेरकर आप इन समुद्री पक्षियों को और पास बुला सकते हैं। अपने चारों ओर अठखेलियाँ करते इन श्वेत जल पक्षियों को देखने का आनंद प्रत्यक्ष अनुभव करने पर ही समझा जा सकता है। आप उन्हें खिलाते रहिये, वे आपका भरपूर मनोरंजन करते रहेंगे।

बेट द्वारका शब्द की व्युत्पत्ति

बेट द्वारका के प्रथम दर्शन
बेट द्वारका के प्रथम दर्शन

बेट द्वारका को भेंट द्वारका भी कहा जाता है। दोनों नामों के सम्बन्ध में कथाएं प्रसिद्ध हैं।

जल से घिरी भूमि जिसे हम द्वीप कहते हैं, इसे गुजराती में बेट कहा जाता है। अतः द्वारका का वह भाग जो मुख्य भूमि से पृथक होकर द्वीप में परिवर्तित हो गया, उसे बेट द्वारका कहा जाने लगा।

भेंट द्वारका यह शब्द सुनते ही आपको अवश्य कृष्ण तथा सुदामा का प्रसिद्ध भेंट स्मरण हो आया होगा।  जी हाँ! बेट द्वारका से सम्बंधित एक अन्य किवदंती के अनुसार यह वही स्थल है जहां कृष्ण के प्रिय किन्तु दरिद्र मित्र सुदामा ने उनसे भेंट की थी। बेट द्वारका के मंदिर में कथावाचक रस लेकर इसका बखान करते नहीं थकते। उसी अजर अमर भेंट के कारण ही इस स्थल को भेंट द्वारका भी कहा जाता है।

बेट द्वारका को बेट शंखोधार भी कहा जाता है। आप जानना नहीं चाहेंगे कि बेट द्वारका का यह अनोखा नाम कहाँ से उत्पन्न हुआ है?

बेट द्वारका के उपहार - पानी में तैरता पत्थर, इंद्रजाल, शंख और मिट्टी के खिलोने
बेट द्वारका के उपहार – पानी में तैरता पत्थर, इंद्रजाल, शंख और मिट्टी के खिलोने

कुछ लोगों का मानना है कि यह द्वीप शंख के आकार का था, इस लिए इसे शंखोधार कहा जाता है। मेरे अनुमान से इन सैकड़ों वर्षों पश्चात इस द्वीप के आकार में अनेक परिवर्तन आये होंगे। फिर भी यदि गूगल मानचित्र में बेट द्वारका देखा जाय तो यह एक लंबा शंख प्रतीत होता है।

बेट द्वारका के कुछ अन्य नाम हैं – रमणद्वीप अर्थात रमणीय द्वीप, कृष्ण विलास नगरी अर्थात कृष्ण की आमोद नगरी, कलारकोट इत्यादि।

बेट द्वारका का इतिहास तथा सम्बंधित कथाएं

बेट द्वारका का उन्मुक्त जीवन
बेट द्वारका का उन्मुक्त जीवन

द्वारका के विषय में हम सब जानते हैं कि यह कृष्ण की बसाई तथा राज की गयी स्वर्णिम नगरी थी। इसी कारण कृष्ण को द्वारकाधीश कहा जाता है। कृष्ण को रणछोड़ राय भी कहा जाता है। रणछोड़ अर्थात  वह जो रणभूमि छोड़कर भाग गया। कृष्ण ने कंस के अत्याचारों से अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिए मथुरा छोड़ दी थी। अपनी प्रजा के लिए उन्होंने द्वारका में नवीन नगरी की स्थापना की थी। आज भी द्वारका के लोग एक दूसरे को जय द्वारकाधीश कहकर अभिवादन करते है।

सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के महल

कृष्ण की सोलह हजार रानियों के विषय में तो आप जानते ही हैं। किन्तु कई लोग इस विषय में मिथ्याबोध से ग्रसित हैं। यद्यपि कृष्ण की ८ प्रमुख रानियाँ थीं। कृष्ण ने नरकासुर द्वारा अपहृत लगभग १६००० राजकुमारियों को उससे मुक्ति दिलायी थी। समाज में बहिष्कृत होने के भय से उन्होंने कृष्ण से विनती की कि वे पाणिग्रहण कर उनका उद्धार करें। अतः कृष्ण ने उनसे विवाह कर उन सब के लिए यहीं बेट द्वारका में अलग अलग महल बनवाये थे। जबकि कृष्ण का राजपाट गोमती द्वारका में था। वर्तमान में आपको केवल उस विशाल स्वर्णिम द्वारका का एक छोटा सा भाग ही दृष्टिगोचर होता है। एक बड़ा भाग समुद्र के नीचे है।

बेट द्वारका में श्री कृष्ण-सुदामा भेंट

आज के सुदामा - साधू बाबा - बेट द्वारका
आज के सुदामा – साधू बाबा

सुदामा-कृष्ण की मित्रता की कहानियां हम सबने बालपन में सुनी तथा पढी हैं। ऐसी कहानियाँ अब भी हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। आईये एक बार फिर उस कहानी को दुहराते हैं। निर्धन ब्राम्हण-पुत्र सुदामा, अवंतिका या उजैन स्थित संदीपनी आश्रम में बालकृष्ण के सहपाठी थे। कालान्तर में कृष्ण राजा बन गए किन्तु सुदामा निर्धन ही रहे।

पत्नी के आग्रह पर वे एक बार कृष्ण से भेंट करने पोरबंदर से द्वारका आये। निर्धनता के कारण वे भेंट स्वरूप केवल मुठ्ठी भर कच्चे चावल ही साथ लाये थे। सुदामा के हाथों से छीनकर बड़े ही चाव से चावल खाते कृष्ण सुदामा की परिस्थिति बिना कहे ही जान गए थे। वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ सुदामा को घर पहुँचने के पश्चात ही कृष्ण की उदारता का अनुभव हुआ जब उन्होंने धन-धान्य से परिपूर्ण हर्षोल्लसित पत्नी तथा पुत्रों को देखा। ऐसी थी कृष्ण सुदामा की मित्रता।

इसी अनमोल मित्रता की महानता समझाने के लिए बहुधा बालक बालिकाओं को यह कथा अवश्य सुनायी जाती थी। द्वारकाधीश मंदिर के भीतर यह कथा आप एक बार फिर सुनेंगे। आपसे आग्रह किया जाएगा कि आप भी मंदिर का संरक्षण करने वाले ब्राम्हणों को चावल दान करें। ऐसी मान्यता है कि भगवान् कृष्ण सुदामा की तरह आपका घर भी धन धान्य से भर देंगे।

शंखासुर तथा शंखोधार तीर्थ

आपने कदाचित कृष्ण द्वारा शंखासुर नामक असुर के वध की कथा सुनी होगी। अपने गुरु संदीपनी के पुत्र को बचाने के लिए कृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख के भीतर निवास करते शंखासुर का वध किया था। किवदंतियों के अनुसार प्रभास क्षेत्र जहां शंखासुर निवास करता था, वही वर्तमान में बेट द्वारका है। बेट घाट तथा द्वारकाधीश मंदिर से १ की.मी. दूर शंख सरोवर नामक एक पवित्र जलाशय है। ऐसा मानना है कि कृष्ण ने शंखासुर का वध वहीं किया था। शंख सरोवर आप आज भी यहाँ देख सकते हैं। इसके आसपास अनेक पक्षियों को देख आपका मन भी मेरी तरह प्रसन्न हो उठेगा। शंख सरोवर के किनारे एक छोटा प्राचीन शिव मंदिर भी है।

और पढ़ें – दिनकर जोशी की द्वारका का सूर्यास्त 

मीराबाई के जीवन के अंतिम क्षण

बेट द्वारका में मीरा बाई का मंदिर
बेट द्वारका में मीरा बाई का मंदिर

यह तो सब जानते हैं कि मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ की रानी मीराबाई बालपन से भगवान् कृष्ण की परम भक्त थी। किन्तु, क्या आप जानते हैं कि मीराबाई ने अपने जीवन के अंतिम क्षण बेट द्वारका में व्यतीत किये थे? कथाओं के अनुसार विवाह के पश्चात भी मीराबाई कृष्ण भक्ति में लीन रहती थी। राजमहल की अपेक्षाओं तथा षड्यंत्रों से त्रस्त होकर अंततः उन्होंने राजमहल का त्याग किया तथा बालकृष्ण की नगरी वृन्दावन चली गयी। उन्होंने अपना सर्व जीवन कृष्ण भजन रचने तथा उनकी स्तुति गाने में लगा दिया। गाँव गाँव भ्रमण कर कृष्ण भजन गाने वाली मीराबाई की ख्याति चारों ओर पसरने लगी।

जीवन के अंतिम क्षणों में बेट द्वारका पहुंचकर उन्होंने मंदिर में भोग लगाने की इच्छा व्यक्त की। उनकी ख्याति से अवगत पंडितों ने उन्हें इसकी स्वीकृति दे दी। मंदिर के भीतर वे अपनी भक्ति द्वारा भगवान् कृष्ण में विलीन हो गयी। उनके पवित्र वस्त्र कृष्ण की प्रतिमा को अर्पित किये गए। इस कथा पर विश्वास करना आपकी श्रद्धा पर निर्भर है। यह कथा इस ओर अवश्य इंगित करती है कि मीराबाई ने अपने अंतिम क्षण बेट द्वारका में व्यतीत किये थे। इसी कारण मैंने इस कथा का यहाँ उल्लेख किया।

बेट द्वारका के मंदिर

कृष्ण की नगरी बेट द्वारका में अनेक मंदिर होंगे, ऐसा आपका अनुमान होगा। किन्तु बेट द्वारका की जीवनरेखा द्वारकाधीश मंदिर के चारों ओर ही घूमती है। अधिकतर यात्री इसी मंदिर के दर्शन करने आते हैं। भाग्यवश मैंने द्वारकाधीश मंदिर के साथ साथ कुछ अन्य मंदिरों के भी दर्शन किये। इन सभी मंदिरों में मेरा अनुभव आपके साथ बांटना चाहती हूँ।

बेट द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर

द्वारकाधीश मंदिर की सीढियां - बेट द्वारका
द्वारकाधीश मंदिर की सीढियां

द्वारकाधीश मंदिर बेट द्वारका का अति विशेष मंदिर है। इसी कारण लाखों की संख्या में भक्त इसके दर्शनार्थ ओखा से यहाँ तक की नौका सवारी करते हैं। यद्यपि बेट द्वारका में कई अनेक महत्वपूर्ण मंदिर भी हैं।

जहां तक द्वारकाधीश मंदिर का प्रश्न है, ऐसा कहा जाता है कि यहाँ स्थापित श्री कृष्ण की प्रतिमा रुक्मिणी देवी ने स्वयं स्थापित की थी। उन्होंने यह प्रतिमा श्री कृष्ण द्वारा देह त्यागने के  समय अर्थात आज से लगभग ५२४४ वर्षों पहले स्थापित की थी। जैसा की हम जानते हैं कि रुक्मिणी कृष्ण की पटरानी थी, और उनकी ८ मुख्य रानियों में से एक है। विडम्बना यह है कि बेट द्वारका के इस मंदिर परिसर में रुक्मिणी देवी का एक भी मंदिर नहीं है।

द्वारकाधीश मंदिर में कई दैनिक अनुष्ठान किया जाते हैं जिसमें मुख्यतः १३ बार भोग, ९ बार आरती तथा २२ देव दर्शन सम्मिलित हैं।

नाथद्वारा मंदिर की तरह बेट द्वारका के इस श्री कृष्ण मंदिर में भी शिखर नहीं है। अन्य घरों की तरह इसकी छत भी सामान्य रूप से सपाट है। इसके पीछे का कारण नहीं जानना चाहेंगे? यह इसलिए क्योंकि द्वारकाधीश मंदिर परिभाषिक रूप से मंदिर है किन्तु वास्तव में यह कृष्ण का निवासस्थान था जहां वे अपने परिवार संग निवास करते थे।

द्वारकाधीश मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिर

द्वारकाधीश की श्रृंगार मूर्ति
द्वारकाधीश की श्रृंगार मूर्ति

बेट द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर परिसर के भीतर कृष्ण के साथ साथ उनके परिवार के सदस्यों के भी मंदिर हैं। वे इस प्रकार हैं-

राधिका रानी मंदिर– राधा को द्वारका में गोलोक की महारानी के नाम से जानते हैं। इसके तथ्य में ना जाते हुए आईये मैं आपको वह बताती हूँ जो मैंने इस मंदिर मैं देखा । राधा को समर्पित इस मंदिर के लकड़ी के द्वार तथा नक्काशीदार कोष्ठक इस मंदिर की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे। जहां कृष्ण होंगे वहां राधा अवश्य होगी। किन्तु राधाजी कृष्ण की प्रिय सखी होते हुए भी यहाँ उनका मंदिर मुख्य मंदिर परिसर के बाहर स्थित है। परिसर के भीतर केवल श्री कृष्ण, उनके भ्राताओं, उनके पुत्रों तथा उनकी पत्नियों के मंदिर हैं।

इस मंदिर में राधाजी की उत्सव मूर्ति है अर्थात् मूर्ति अचल नहीं है। इसका अर्थ यह है कि उनकी मूर्ति सतत यहाँ स्थापित नहीं रहती बल्कि उन्हें विशेष रूप से यहाँ लाया व ले जाया जाता है। राधाजी की मूर्ति को आप देखना चाहें तो आपको यहाँ श्रावण मास में आना होगा। श्रावण मास में ही उनकी मूर्ति को एक मास के लिए बाहर निकाला जाता है। उनकी मूर्ति को शरद पूर्णिमा के दिन भी बाहर लाया जाता है।

द्वारकाधीश मंदिर– द्वारकाधीश मंदिर का मुख्य आकर्षण है श्री कृष्णजी की मूर्ति जिसे रुक्मिणी ने स्वयं बनायी है। उनकी मूर्ति को देख आपका मन प्रसन्न हो जाएगा। सम्पूर्ण दिवस उन्हें भिन्न भिन्न श्रृंगार में सज्जित किया जाता है। यदि आप यहाँ जन्माष्टमी के दिन आयें तो आप इस श्रृंगार की चरम सीमा के दर्शन कर सकते हैं। कृष्ण मंदिर के रजत द्वार पर आप सूर्य, चन्द्रमा, शंख, चक्र, गदा तथा पद्म देख सकते हैं। द्वार के निचले भाग में श्री कृष्ण ग्वाले के रूप में उत्कीर्णित (तराशे) हैं जो गौमाता के साथ खड़े अपनी बांसुरी बजा रहे हैं।

बलराम – श्री कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम को यहाँ त्रिविक्रम रूप में दर्शाया गया है। चार भुजाधारी त्रिविक्रम की काले पत्थर की मूर्ति प्राचीन प्रतीत हो रही थी।

कृष्ण-रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युमन यहाँ कल्याण राय के रूप में उपस्थित हैं।

पुरुषोत्तम राय – इन्हें अधिक मास के देवता कहा जाता है। अधिक मास अर्थात् हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक ३-४ वर्षों पश्चात आने वाला एक अधिक मास। भूरे बलुआ पत्थर में बनी पुरुषोत्तम राय की मूर्ति के बाजू उनकी चारपाई रखी हुई है।

देवकी मंदिर– देवकी को समर्पित मंदिर आपने कहीं नहीं देखा होगा। कृष्ण की मूर्ति जिस आँगन में है वहीं भूरे बलुआ पत्थर में बनी देवकी की भी प्रतिमा स्थापित है। आप यहाँ एक आश्चर्यजनक दृश्य देखेंगे। द्वारका में माता यशोदा का कहीं भी उल्लेख नहीं है। कृष्ण को समर्पित मंदिर के भीतर उनकी माता के रूप में देवकी ही विराजमान रहती हैं।

जब आप मुख्य प्रांगण की परिक्रमा करेंगे आप अन्य कई मंदिर देखेंगे। ये मंदिर क्रमवार कुछ इस प्रकार हैं-

महालक्ष्मी मंदिर – आप आश्चर्यचकित होंगे कि कृष्ण मंदिर के भीतर महालक्ष्मी का मंदिर! यहाँ रुक्मिणी को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है। अतः महालक्ष्मी को कृष्ण की पटरानी के रूप में स्थापित किया गया है। यहाँ उनका अपना मंदिर है जहां काले पत्थर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गयी है।

माधव राय जी – माधव राय जी के विषय में जानकारी नहीं होने के कारण मैंने कुछ पूछताछ की। मुझे बताया गया कि माधव राय कृष्ण के काका थे। आपको बता दूं कि प्रयाग में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले के वे पीठासीन देव हैं।

कृष्ण की कुल देवी अम्बाजी थीं। तो उनका मंदिर तो यहाँ होना ही चाहिए। मुझे इस मंदिर के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ।

प्रांगण के एक ओर मैंने देखा कि एक पंडित चारों ओर से भक्तों से घिरे बैठे थे तथा उन्हें कुछ जानकारी दे रहे थे। समीप जाकर जाना कि वे भक्तों को बेट द्वारका की कथा सुना रहे थे। उन्होंने कृष्ण सुदामा की मित्रता तथा शंखासुर की कथा सुनाई। भक्तों को द्वारका दर्शन की महत्ता समझाते हुए उन्हें मंदिर में चावल के दान का सुझाव भी दे दिया। यह सब उन्होंने मात्र ३ मिनट में संपन्न किया।

वहां से आगे जाकर मैंने गोवर्धन मंदिर देखा। आगे शेषावतार मंदिर में शेषावतार की प्रतिमा थी जिस के ऊपर शेषनाग की छत्री थी।

परिसर में मुझे कलियुग के देव सत्यनारायण भगवान् का भी मंदिर दिखा। मंदिर के भीतर जाकर संगमरमर में बनी उनकी सुन्दर मूर्ति देख गद्गद हो गयी।

साक्षी गोपाल, यह एक उत्सव मूर्ति है जो बेट द्वारका के द्वारकाधीशजी की अचल मूर्ति की एवज में यात्रा करती है। इन्हें द्वारका धाम की तीर्थ यात्रा का देव माना जाता है। अतः जब भी आप द्वारका धाम की तीर्थ यात्रा पर यहाँ आयें, साक्षी गोपाल आपकी यात्रा के दर्शन करेंगे तथा आपका संरक्षण भी करेंगे। यह मेरा प्रथम अनुभव था जब मैंने देखा कि देव स्वयं भक्तों द्वारा किये द्वारका तीर्थ का समक्ष खड़े होकर दर्शन करते हैं।

लक्ष्मी नारायण, अर्थात् शक्ति समेत विष्णु। बेट द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में लक्ष्मीनारायण की जोड़ी की मूर्ति है जो काले पत्थर से निर्मित है।

क्या आपने कहीं कृष्ण के पुत्र तथा पौत्र के मंदिर देखे हैं? यदि नहीं, तो यहाँ आप ऐसे मंदिर अवश्य देखेंगे। मैंने यहाँ कृष्ण पुत्र प्रद्युमन तथा पौत्र अनिरुद्ध के मंदिर भी देखे। कृष्ण के कुलगुरु अर्थात् ऋषि दुर्वासा को समर्पित भी यहाँ एक मंदिर स्थापित है।

जामवंती – ये कृष्ण की द्वितीय पत्नी तथा रीछ राजा जाम्बवंत की पुत्री थी।

सत्यभामा – ये कृष्ण की तृतीय पत्नी तथा द्वारका के खजांची सत्रजित की पुत्री थी।

गरुड़ – गरुड़ के विषय में आपने पौराणिक कथाओं में पढ़ा ही होगा। किन्तु क्या आप जानते हैं कि गरुड़ का भी द्वारकाधीश मंदिर के भीतर यथोचित स्थान है। मुझे ऐसा बताया गया कि विष्णु अर्थात कृष्ण का वाहन गरुड़, भगवान् कृष्ण को प्रत्येक दिवस प्रातः अपनी पीठ पर बिठाकर उनकी राजधानी गोमती द्वारका ले जाते थे तथा सांझ होते ही उन्हें बेट द्वारका में उनके महल में ले आते थे।

गणेश मंदिर – मंदिर परिसर के भीतर प्रवेश करते से ही जो प्रथम देव के आप दर्शन करेंगे वे हैं गणेशजी। इस गणेश मंदिर में गणेशजी की खड़ी प्रतिमा स्थापित है।

द्वारका के कृष्ण मंदिर की एक अनोखी बात मेरे ध्यान में आयी। यहाँ सर्व पंडित प्रत्येक देव अथवा देवी के विषय में जानकारी देते समय कृष्ण का सन्दर्भ अवश्य देते हैं। देव-देवी की महत्ता का गुणगान करते समय उनका कृष्ण से नाता तथा घटनाओं में उनके योगदान की जानकारी चर्चा में लाते नहीं थकते। इन देवी-देवताओं के अन्य दैवी अस्तित्वों से सम्बन्ध की भी वे जानकारी देते हैं।

इन सर्व मंदिरों के दर्शनोपरांत मैंने कुछ क्षण बेट द्वारका के श्री कृष्ण मंदिर की वास्तु को निहारने में व्यतीत किये। मंदिर की भित्त मुझे अपेक्षाकृत नवीन प्रतीत हुई। भित्तियों पर कृष्णलीला के दृश्य उत्कीर्णित थे। हांडी से माखन चुराते बालकृष्ण, कदम्ब वन में बांसुरी बजाते कृष्ण, गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा में उठाये गोवर्धनधारी, गज को पूंछ से उठाये कृष्ण इत्यादि उनमें से मुख्य हैं। मेरे विचार से अन्य कई प्रमुख दृश्य भी चित्रित किये जा सकते थे। भित्तियों के अन्य रिक्त स्थान ज्यामितीय तथा पुष्पों के आकारों से उत्कीर्णित हैं।

रानियों के मंदिरों की बाहरी भित्तियों पर मुझे लाल रंग में हथेलियों के चिन्ह दिखे। उत्सुकता वश मैंने पंडितजी से इस विषय में जानना चाहा। उन्होंने मुझे बताया कि दीपावली तथा होली जैसे त्योहारों के समय हथेलियों द्वारा भित्तियों को इसी प्रकार चिन्हित किया जाता है।

डांडी हनुमान मंदिर

दांडी हनुमान एवं मकरध्वज मंदिर - बेट द्वारका
दांडी हनुमान एवं मकरध्वज मंदिर

डांडी हनुमान मंदिर द्वारकाधीश मंदिर से लगभग ५ की.मी. की दूरी पर था। अतः वहां पहुँचने हेतु हमें कृष्ण मंदिर के सामने से ऑटो की सहायता लेनी पड़ी। किन्तु वहां पहुंचते पहुंचते हमें हमारी नानी याद आ गयी। सड़क के नाम पर ऊबड़ खाबड़ मार्ग तथा बेट द्वारका द्वीप की संकरी सी भूमि दोनों और से समुद्र से घिरी। समुद्र किनारे से होते हुए हमारा ऑटो एक छोटे अवर्णित से मंदिर के समक्ष पहुंचा। मंदिर के बाहर कुछ छोटी दुकानें भी दिखाई दीं।

जैसे ही मैं मंदिर के समीप पहुँची, मेरे कर्ण हनुमान चालीसा के मधुर स्वरों से सराबोर हो गए। मैंने भी अपने स्वर जप के स्वरों से एकाकार कर लिए। जप सम्पूर्ण होने पर उतावली होकर मंदिर के पट खुलने की बाट जोहने लगी। इस मंदिर को कोई भी राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं है। बल्कि यह सदैव पूर्ण रूप से जनता का मंदिर रहा है। मंदिर के चारों ओर एक धर्मशाला अवश्य बाँध दी गयी है।

मंदिर का भीतरी भाग अत्यंत छोटा है। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह कोई छोटा सा गुफा मंदिर हो। भीतर दो मूर्तियाँ दिखीं। एक मूर्ति हनुमानजी की थी जो धरती में समाती हुई प्रतीत होती है। दूसरी मूर्ति हनुमाजी के पुत्र मकरध्वज की है। अतः इसे पिता पुत्र का मंदिर कहा जाता है।

आप सबने रावण भ्राता अहिरावण तथा पाताल राजा महिरावण द्वारा श्री राम तथा लक्षमण के अपहरण की कथा अवश्य सुनी या पढी होगी। ऐसी माना जाता है कि पुत्र इन्द्रजीत की मृत्यु के पश्चात रावण के अनुरोध पर अहिरावण तथा महिरावण ने दोनों दिव्य पुरुषों का अपहरण इसी स्थान पर किया था। इसका अर्थ आप आसानी से लगा सकते हैं कि बेट द्वारका द्वीप का इतिहास कृष्ण युग से भी अधिक प्राचीन है।

यहाँ के निवासियों की मान्यता है कि यदि आप इस मंदिर में वास करते हनुमानजी को सुपारी अर्पण करें तो वे आपकी सर्व इच्छा पूर्ण करेंगे।

मीरा बाई का मंदिर

बेट द्वारका की एक गली में मुझे मीरा बाई को समर्पित एक छोटा सा मंदिर भी दिखाई दिया।

बेट द्वारका के सरोवर (तलाव)

मत्सयेश्वर मंदिर - बेट द्वारका
मत्सयेश्वर मंदिर – बेट द्वारका

बेट द्वारका में मुझे दो मुख्य सरोवर दिखे। दोनों सरोवरों की अवस्था अत्यंत उपेक्षित थी। मेरे अनुमान से इसका मुख्य कारण है समुद्र तले स्थित जल नलिकाएं जिनके द्वारा बेट द्वारका को जल आपूर्ति की जाती है। आप चौंक गए होंगे। बेट द्वारका की जनता को अब आसानी से जल प्राप्ति हो रही है। इसलिए अब वे इन सरोवरों की उपयोगिता तथा अब तक दी गयी इनकी सेवाओं को भूलने लगे हैं। इन सरोवरों से जुड़ी किवदंतियां भी लोगों को इनकी देखभाल हेतु प्रोत्साहित नहीं कर सकीं। इन सरोवरों की यह अवस्था देख मैंने अनुमान लगाया कि यहाँ कई अन्य सरोवर भी रहे होंगे जो अब लुप्त गए हैं।

शंख सरोवर

शंख सरोवर - बेट द्वारका
शंख सरोवर – बेट द्वारका

बेट द्वारका द्वीप की लम्बाई-चौड़ाई देखें तो शंख सरोवर तदनुसार विशाल प्रतीत होता है। इसके चारों ओर घाट तथा पौड़ियाँ बाँधी हुई हैं। मैंने द्वारका यात्रा अप्रैल मास में की थी। अप्रैल मास की उष्णता के कारण सरोवर में जल नाममात्र ही शेष था। यही जल वहां उड़ते पक्षियों की प्यास बुझा रहा था। सरोवर के प्रवेश द्वार के समीप ही नीलकंठ का छोटा सा मंदिर था। इसका एक भाग प्राचीन तथा दूसरा भाग अपेक्षाकृत नवीन व जागृत था।

यह वही स्थान है जहां द्वारकाधीश मंदिर से साक्षी गोपाल की मूर्ति परिक्रमा हेतु आती है।

इसके अलावा राम नवमी के दो दिवस पश्चात आयोजित कृष्ण-रुक्मिणी के विवाह की बरात भी यहीं आती है।

रणछोड़ तलाव

नकाशीदार प्रवेश पथ युक्त यह सरोवर भी छोटा नहीं था। इसकी निर्मिती, इस क्षेत्र के शासक अर्थात् बरोदा के गायकवाड वंश ने की थी।

बेट द्वारका के लोग

मेरी द्वारका यात्रा के समय मेरे परिदर्शक तथा वाहनचालक जयेश बेट द्वारका के ही निवासी हैं। जब मैं उससे द्वारका के विषय में कुछ अधिक ही प्रश्न पूछने लगी तब उसे मेरी सच्ची उत्सुकता का अनुमान लगा। वह सीधे मुझे अपने दादाजी के पास ले गए। इसका कारण मुझे दादाजी से परिचय के पश्चात ही ज्ञात हुआ। जयेश के ९२ वर्षीय दादाजी श्री वरसिंह माला राबरी, बेट द्वारका के एक पुस्तकालय में कार्यरत थे। दुर्भाग्यवश उस पुस्तकालय को २००७ में आये भूकंप ने पूर्णतः नष्ट कर दिया था। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता। उसका जीता जागता उदाहरण थे स्वयं श्री वरसिंहजी। यह मेरा सौभाग्य था कि मेरी भेंट श्री वरसिंहजी से हुई तथा उनसे द्वारका व बेट द्वारका की कथाएं सुनाने मिलीं।

श्री वरसिंह रबाड़ी - बेट द्वारका
श्री वरसिंह रबाड़ी

वरसिंहजी ने मुझे भाई मोहकम सिंह के विषय में भी जानकारी दी। भाई मोहकमजी गुरु गोबिन्दजी के पांच प्यारों में से एक थे तथा बेट द्वारका के निवासी भी थे। उनकी स्मृति में शंख सरोवर के समीप एक गुरुद्वारा भी निर्मित है। सिख धर्म की शपथ लिए ५ प्रथम सिखों को पांच प्यारे कहा जाता है। अतः बेट द्वारका सिख धर्म का पालन करने वाले भक्तों हेतु भी अति महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। ।

बेट द्वारका की जनसंख्या लगभग १०००० है जिसमें ८००० मुसलमान तथा २००० हिन्दू धर्म का पालन करने वाले हैं। जहां मुसलमान समुदाय के अधिकतर लोग मछली पकड़ने का व्यवसाय करते हैं वहीं हिन्दुओं की गुजर-बसर द्वारकाधीश मंदिर की अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। अतः आप कह सकते हैं कि कृष्ण अब भी उनका लालन पालन कर रहे हैं।

राबरी – यह गड़रियों का समुदाय कहीं न कहीं बेट द्वारका की ऐतिहासिक धरोहर है।

बेट द्वारका की यात्रा – कुछ सुझाव

बेट द्वारका - नौकाएं
बेट द्वारका – नौकाएं
  • बेट द्वारका पहुँचने के लिए ओखा से नौका सवारी ही एकमात्र साधन है। द्वारका के मुख्य भूभाग से बेट द्वारका द्वीप के मध्य सेतु की योजना बन गयी है किन्तु इसके निर्माण में कुछ वर्ष लग सकते हैं।
  • नौका सवारी प्रातः ६ बजे से सायं ७ बजे तक उपलब्ध रहती है। बेट द्वारका के अधिकतर मंदिर दोपहर में बंद रहते हैं तथा सायं ५ बजे के आसपास खुलते हैं। अतः प्रथम प्रहर, जब अधिक श्रद्धालू आते हैं तथा संध्या, मंदिर के पट खुलने के पश्चात नौका सेवायें अधिक हैं।
  • मंदिर के भीतर चित्र खींचना मना है।
  • बेट द्वारका में खाने-पीने की अधिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। अतः मेरा सुझाव है कि आप प्रातः भरपेट नाश्ता कर यहाँ आयें तथा दोपहर भोजन के समय तक वापिस मुख्य द्वारका पहुँच जाएँ।
  • बोतल-बंद जल उपलब्ध हैं किन्तु आप अपनी पानी की बोतल भर कर साथ ले जाएँ। यह अधिक उचित होगा।
  • यूँ तो बेट द्वारका के द्वीप में आप ऑटो रिक्शा द्वारा भ्रमण कर सकते हैं। अपितु यदि आपके पास पर्याप्त समय हो तथा धूप कम हो तो आप आसानी से पदयात्रा भी कर सकते हैं।
  • बेट द्वारका में रहने के लिए अच्छे होटल नहीं हैं। अधिकतर पर्यटक द्वारका के होटलों में ही रहते हैं।
  • द्वारका से बेट द्वारका के लिए कई नियोजित यात्राएं हैं। आप उनका लाभ उठा सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    बहुत ही सुंदर शब्द-चित्रण ! बेट द्वारका के बारे में प्रचलित विभिन्न किंवदंतीयों के बारे में पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ । प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर के परिसर में ही श्री कृष्ण के लगभग संपूर्ण परिवार के सदस्यों के मंदिर होने से, एक ही स्थान पर पुरे परिवार की जानकारी सहजता से प्राप्त होती हैं ।
    यहां पर सिख धर्मावलंबीयों का भी तीर्थ होने से बेट द्वारका का महत्व निश्चित रूप से और भी बढ जाता है ।
    बेट द्वारका की कुल जनसंख्या में हिन्दूओं का अनुपात आश्चर्य जनक हैं !
    यात्रा संबंधी सुझाव अत्यंत उपयोगी हैं ।
    सुंदर आलेख हेतू धन्यवाद ।

    • प्रदीप जी – जब में बेट द्वारका गयी थी तो मुझे इसके बारे में कुछ भी नहीं पता था, इसलिए जो कुछ भी बटोर पाई,उसे अपने पाठकों के लिए ज्यों का त्यों लिख दिया। हम अपने देश और अपने इतिहास के बारे में इतना कम जानते है, यह सोच कर आश्चर्य होता है। प्रयास है की रोचक ढंग से कुछ ज्ञान वर्धन कर पायें, इस ब्लॉग के माध्यम से।

    • अनुराधा जी
      बहुत ही सुन्दर शब्द चित्रण किया है
      जिससे द्वारिका के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकी
      . . धन्यवाद

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