चित्तौड़गढ़ किला – साहस, भक्ति और त्याग की कथाएँ

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चित्तौड़गढ़ इतिहास की पुस्तकों में से भारत का अगर कोई एक किला मुझे आज भी याद है, तो वह है मेवाड़ का चित्तौड़गढ़ किला। भारतीय इतिहास के कई महान और महत्वपूर्ण व्यक्ति यहां रह चुके हैं। इन महान व्यक्तियों से मेरा परिचय इतिहास की किताबों के द्वारा ही हुआ जब महाराणा प्रताप और राणा संघा जैसे महाराजाओं के किस्से पढ़ाये जाते थे। मीराबाई के काव्य के द्वारा भी चित्तौड़गढ़ से परिचय हुआ। किरण नागरकर के ‘कुक्कोल्ड’ (व्यभिचारी) जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों के द्वारा मेरी उनसे भेट होती रही। मैंने रानी पद्मिनी से प्रेरित अनेक कथाओं और उपन्यासों में उनके जौहर के बारे में सुना था। ऐसा लगा जैसे, किसी बड़े निर्माता का पूरा पात्रवर्ग चित्तौड़गढ़ में रह रहा था। बेशक यह सब कुछ कई सदियों की कालावधि में घटित हुआ होगा, लेकिन अगर वर्तमान की दृष्टि से देखें तो सब कुछ एक-दूसरे में संविलीन सा लगता है, जो कि इतिहास है।

किले का इतिहास

जब मैं चित्तौड़गढ़ पर पहुंची तब मुझे पता चला कि यह विशाल किला 7वी सदी में मौर्य कुल के राजा चित्रांगद मोरी द्वारा बनवाया गया था। इस किले का नाम भी इसी राजा के नाम के आता है। 8वी सदी के दौरान इस किले की बागडोर मेवाड़ के सिसोदिया कुल के हाथों में आयी जिन्होंने इस किले पर 800 सालों तक राज्य किया। बाद में उन्हें उदयपुर में अपनी नयी राजधानी स्थापित करनी पड़ी। इस किले में आज भी कई गाँव बसे हुए हैं जो अब भी इसे अपना घर मानते हैं। आप सोच भी नहीं सकते कि यहां की दीवारों और लोगों के पास इस किले से जुड़ी न जाने कितनी कथाएँ होगी जो सुनने लायक हैं।

चित्तौड़गढ़ किले का मानचित्र
चित्तौड़गढ़ किले का मानचित्र

लंबी सी मछली जैसे आकार का बना हुआ चित्तौड़गढ़ किला, भारत का विशालतम किला है जिसे एक दिन में देख पाना आसान नहीं है। यहां पर विरासती क्षेत्र भी है जिसे देखने बहुत से पर्यटक आते हैं। इसके अलावा यहां पर छोटे-छोटे गाँव, घने जंगल और पूरे किले में यहां-वहां फैले जल स्त्रोत हैं। मैंने एक पूरा दिन यह किला देखने में गुजारा। और यात्रा के अंत में वहां का प्रसिद्ध प्रकाश और ध्वनि का अद्भुत खेल देखा। आम तौर पर एक गाइड पर्यटकों को इस प्रसिद्ध परिपथ की यात्रा करवाता है जो लगभग 2-3 घंटों में पूरी होती है। लेकिन अगर आप आराम से अपनी यात्रा करे तो यहां पर देखने लायक बहुत कुछ है। चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान के 5 पहाड़ी किलों में से एक है, जिन्हें यूनेस्को के विश्व धरोहर के स्थलों में गिना जाता है। बाकी के 4 किले हैं – कुंभलगढ़, जैसलमेर का सोनार किला, अंबेर किला और रणथंबोर किला।

चित्तौड़गढ़ किले का कुंभ महल

कुम्भ महल चित्तौड़गढ़ किला
कुम्भ महल चित्तौड़गढ़ किला

यह चित्तौड़गढ़ किले का अंतर्भाग यानि यहां का प्रमुख महल है। इस किले की दिलचस्प बात यह है कि, यहां पर सिर्फ एक मुख्य प्रासाद है जहां पर राजसी परिवार रहते हैं, और जिसे स्त्रियों और पुरुषों के लिए दो अलग भागों में विभाजित किया गया है।

कुंभ महल की दीवारें बहुत ही जीर्ण अवस्था में हैं, जो अत्यंत भंगुर लगती हैं, खासकर कि उन विशाल खिड़कियों के कारण जिनसे आप दीवार के उस पार देख सकते हैं। इन दीवारों पे सजावट के हल्के से निशान दिखाई देते हैं। कुछ दीवारों को देखकर लगता है, जैसे उनके पास खड़े होने से या उन्हें ज़रा सा छूने से वे गिर जाएंगी। मेरे लिए कदाचित यह दीवारों की स्थिति का चित्रण है, जो सालों के रहन-सहन से थकी हुई, अनेक पीढ़ियों को देखते हुए, बहुत सारी हिंसा सहने के बाद भी, आज तक मौजूद हैं। झरोखे भी इन दिवरों पर ऐसे ही लटक रहे हैं, जैसे कि उन्हें वहां पर लटकाया गया हो।

कुंभ महल इस किले का सबसे प्राचीन भाग है और आवास स्थान के अलावा आप यहां पर शिव मंदिर के अवशेष भी देखने को मिलते हैं। यही वह जगह है जहां पर रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती, मीराबाई और पन्ना धाई रहती थीं। इस महल में एक भूमिगत मार्ग है, जो स्त्री कक्ष के पास में ही स्थित तालाब से जुड़ता है। यह मार्ग स्त्रियों के लिए बनवाया गया था, ताकि वें किसी की नज़र पड़े बिना अपने स्नान क्षेत्र तक पहुँच सके। यह जगह संध्या के समय जीवंत हो उठती है जब प्रकाश और ध्वनि के खेल के समय मेवाड़ की कथा प्रस्तुत करने के लिए इस जगह का उपयोग पृष्ठभूमि के रूप में किया जाता है।

किले की दीवार से आप पूरा चित्तौड़गढ़ शहर देख सकते हैं और अचानक से आपको एहसास होता है कि यह काफी बड़ा शहर है।

चित्तौड़गढ़ किले पर राम पोल

चित्तौड़गढ़ किले का राम पोल
चित्तौड़गढ़ किले का राम पोल

मेवाड़ में शहर या दुर्ग के प्रवेश द्वार को पोल कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ किले पर सूरज पोल, पड़ा पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल नाम से सात प्रवेश द्वार हैं। मैंने सूरज पोल देखा जो पूर्वी दिशा, यानि सूर्योदय की दिशा में स्थित है। यहां से आप मेवाड़ के परिदृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इस ऊंचाई पर खड़े होकर आप मेवाड़ के हरे-भरे खेतों से गुजरता हुआ महामार्ग देख सकते हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। प्रत्येक द्वार से जुड़ी एक कथा है। किसी ने अपने राजाओं और योद्धाओं की मृत्यु देखि है, तो किसी ने अपने शत्रुओं को पराजित कर उन्हें किले के भीतर प्रवेश करने से रोका है। इन साहसी सैनिकों के पुण्यस्मरण में इन प्रवेश द्वारों पर स्मारक बनवाए गए हैं। ये प्रवेश द्वार गोलाकार मार्ग के जरिये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक द्वार पत्थर की विस्मित कर देनेवाली संरचनाएं हैं, जिसकी प्रशंसा करते आप थकते नहीं।

चित्तौड़गढ़ के राम पोल पे शिल्पकारी
चित्तौड़गढ़ के राम पोल पे शिल्पकारी

मैंने राम पोल में कुछ समय बिताया। यह पर्यटकों के लिए किले में प्रवेश करने का प्रमुख द्वार है। प्रचुर नक्काशी काम से बने इन प्रवेश द्वारों पर अनेक देवी-देवताओं की खुदाई की गयी है, जिन्हें आज भी सक्रिय रूप से पूजा जाता है। यहां पर शिलालेख भी हैं जो देवनागरी लिपि हैं, लेकिन फिर भी इन्हें पढ़ने में थोड़ी सी दिक्कत होती है क्योंकि, ये स्थानीय बोली में हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि शब्दों को अलग-अलग लिखने की संकल्पना उस समय में ज्यादा प्रसिद्ध नहीं थी। इस प्रवेश द्वार का तल हथियों के आकार में तराशा गया है, जो किसी मंदिर के तल की भांति लगता है जो सैकड़ों हथियों की पीठ पर खड़ा हो।

विजय स्तंभ

विजय स्तम्भ - चित्तौड़गढ़
विजय स्तम्भ – चित्तौड़गढ़

विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ का सबसे मशहूर स्मारक है। यह खंबे जैसा दिखने वाला बहुत ऊंचा ढांचा है जो अपने आस-पास के बाकी ढांचो से ऊपर उठता हुआ स्थिर खड़ा है। यह स्तंभ 16वी सदी के मध्य में राणा कुंभ के मालवा के सुल्तान पर विजय पाने की खुशी में बनवाया गया था। वास्तव में ये दो स्तंभ हैं, जो एक दूसरे के भीतर स्थित हैं, जिनके बीच में पतली सी खोखली गुहा है। विजय स्तंभ का बाहरी और भीतरी भाग दिव्य तथा राजसी प्रतीकों से प्रचुर मात्रा में तराशा गया है। इस स्तंभ के नौ मंजिलों पर अनेक हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तराशी गयी हैं। यहां पर सूर्य की आकृति भी खुदाई गयी है जो सीसोदिया कुल का प्रतीक है, जो कि अपने आपको सूर्य के वंशज मानते हैं।

विजय स्तम्भ का प्रवेश द्वार - चित्तौड़गढ़
विजय स्तम्भ का प्रवेश द्वार – चित्तौड़गढ़

हमारे गाइड ने बताया कि विजय स्तंभ की ये नौ मंज़िले विष्णु के नौ अवतारों को दर्शाती हैं, जिनके नाम से यह स्तंभ बनवाया गया है। इस सुंदर नक्काशी काम के कारण इस स्तंभ को भारतीय प्रतिमा विज्ञान का मूलाधार के रूप में भी जाना जाता है। विजय स्तंभ का सबसे अनुपम पहलू है, पाँचवी मंज़िल जहां पर इस स्तंभ के वास्तुकार जाईता और उसके तीन पुत्रों नापा, पूजा और पोमा के चित्र तराशे गए हैं। इस स्तंभ का तल भी किसी मंदिर के तल के समान लगता है। मंदिर प्रबेश की तरह ही आपको इस स्तंभ में प्रवेश करने के लिए अपने जूते उतारने पड़ते हैं।

विजय स्तंभ की चढ़ाई

गगनचुम्बी विजय स्तम्भ - चित्तौड़गढ़
गगनचुम्बी विजय स्तम्भ – चित्तौड़गढ़

आप इस स्तंभ की 8वी मंज़िल तक जा सकते हैं। यहां तक पहुँचने के लिए आपको स्तंभ में मौजूद गोलाकार रूप में ऊपर जाती हुई 157 पतली सी सीढ़ियाँ चढ़कर जाना पड़ता है। ऊपर तक पहुँचने के लिए आपको थोड़ा सा धीरज रखना पड़ता है, लेकिन ऊपर पहुँचकर चित्तौड़ का जो दृश्य यहां से दिखाई देता है वही आपके सब्र का फल है। मैं तीसरी मंज़िल तक पहुँचते ही थक गयी। यद्यपि मैं जरूर कहना चाहूंगी कि स्तंभ के भीतर की खुदाई बहुत ही लुभावनी है जो आपको चकित कर देती है। ये सीढ़ियाँ बीच-बीच में केंद्रीय कक्ष से होते हुए बरामदे का चक्कर लेते हुए ऊपर की ओर बढ़ती जाती हैं। वास्तुकला की दृष्टि से देखे तो यह आश्चर्य की बात है कि कैसे इस खोखले से ढांचे को इस प्रकार बनाया गया है, कि वह आंधी-तूफान जैसी परिस्थितियों को झेल सके और हवा के रुख को अपने गलियारों के माध्यम से मोड सके।

चित्तौड़गढ़ के मेरे गाइड ने मुझे बताया कि, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल चाहते थे कि विजय स्तंभ हमारा राष्ट्रीय प्रतीक बने लेकिन नेहरू ने इस बात को अस्वीकार किया।

कीर्ति स्तंभ

कीर्ति स्तम्भ - चित्तौड़गढ़
कीर्ति स्तम्भ – चित्तौड़गढ़

चित्तौड़गढ़ किले के दोनों स्तंभों में से यह सबसे प्राचीन स्तंभ है। इसे जैन धर्म के सबसे पहले तीर्थंकर, आदिनाथ जी को समर्पित किया गया है। एक जैन व्यापारी ने शायद यह स्तंभ 12वी सदी में बनवाया था। मेरा अनुमान है कि विजय स्तंभ भी इसी से प्रेरित होकर बनवाया गया होगा।

आप कीर्ति स्तंभ के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते। आपको इसे बाहर से ही देखना पड़ता है। इस स्तंभ में भी गोलाकार सीढ़ियाँ हैं, जो आपको स्तंभ की छठी मंज़िल तक ले जाती हैं।

जौहर स्थल

जौहर स्थल - चित्तौड़गढ़
जौहर स्थल – चित्तौड़गढ़

विजय स्तंभ और समाधीश्वर मंदिर के बीच की ज़मीन जो दक्षिण और पूर्व दोनों दिशाओं में एक-एक अलंकृत प्रवेश द्वार से घिरी हुई है, जौहर स्थल के रूप में जानी जाती है। यहाँ पर मेवाड़ की रानियाँ ने अनेकों बार जौहर किये हैं।

13वी सदी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद रानी पद्मिनी द्वारा यहां पर सबसे पहला जौहर किया गया था। दूसरा जौहर अकबर के समय में रानी कर्णावती द्वारा किया गया था। इसके साथ ही तीसरा जौहर भी इतिहास में है। हर बार हजारों स्त्रियाँ और बच्चे जौहर की आग में कूद कर अपने आपको कुर्बान कर देते थे। वे आक्रमण करती हुई सेनाओं के हाथों अपना सम्मान खोने के बजाय मौत को अपनाना ज्यादा उचित समझती थीं।

आज यह स्थल खुले मैदान की तरह दिखाई देता है, जो एक जगह से दूसरी जगह पर जाते हुए पर्यटकों से भरा हुआ है। लेकिन मुझे बताया गया था कि उन दिनों में यह एक खोखली गुहा हुआ करती थी, जिसमें आग जलायी जाती थी और स्त्रियाँ ऊंची दीवारों से उसमें कूद जाती थीं। जब आप इस जमीन पर खड़े होते हैं, तो आपके मन में हजारों खयाल दौड़ने लगते हैं। आप आग को गले लगती हुई अनेक स्त्रियों के साहस को महसूस करते हैं, साथ ही इस समूहिक बलिदान के पीछे के कारणों को जानकर आप व्याकुल से हो जाते हैं। और आप स्वयं को भाग्यवान भी मानते हैं कि आप ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां आपके सामने अनेकों विकल्प हैं और आप अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र भी हैं।

रानी पद्मिनी महल

रानी पद्मिनी महल - चित्तौड़गढ़
रानी पद्मिनी महल – चित्तौड़गढ़

चित्तौड़गढ़ किले के एक सरोवर के बीचो-बीच एक बहू-मंज़िला महल खड़ा है, जो पद्मिनी महल के नाम से प्रसिद्ध है। इसी सरोवर के किनारे एक और महल है। कहा जाता है कि इसी महल से अलाउद्दीन खिलजी ने आईने में पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था। लेकिन हमारे गाइड के अनुसार यह महल बहुत बाद में यानि 17वी-18वी सदी में बनवाया गया थ। पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी से जुड़ा यह उपाख्यान शायद एक कहानी है जो बहुत बाद में बनायी गयी है, क्योंकि, पद्मिनी 13वी सदी की समाप्ती के आस-पास के काल में हुई थी। उनके द्वारा किया गया जौहर प्रलेखित प्रकरण के रूप में है। हालांकि इस समय यह महल बहुत ही जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है, इसके बावजूद भी लोग इसे देखने आते हैं, क्योंकि, यह जगह उस प्रसिद्ध कहानी का हिस्सा है। इस महले में देखने योग्य कुछ भी नहीं है। और अब जब मुझे पता चल गया है कि वह कहानी भी काल्पनिक ही है, तो इसके प्रति जो थोड़ा बहुत आकर्षण था वह भी अब खत्म हो गया।

मुझे लगता है कि यह जल महल बाकी सारे जल महलों के लिए, जो बाद में पूरे राजपूताना में उभर रहे थे, प्रेरणा का स्त्रोत रहा होगा।

फतेह प्रकाश महल और संग्रहालय

फतह प्रकाश महल एवं संग्रहालय - चित्तौड़गढ़
फतह प्रकाश महल एवं संग्रहालय – चित्तौड़गढ़

फतेह प्रकाश महल चित्तौड़गढ़ किले का सबसे नया महल है, जिसका निर्माण लग-भाग 100 साल पहले हुआ था। इस महल का एक भाग अब किले का संग्रहालय बन गया है। यहां पर प्राचीन काल की कुछ पुरातन वस्तुओं को और इस क्षेत्र की चित्रकारी की परंपरा को प्रदर्शित किया गया है। इसके अलावा यहां पर लोक कला की वस्तुओं का भी प्रदर्शन है। यह एक विशाल आयताकार भवन है जिसमें केंद्रीय आंगन है, जो गर्व से राणा फतेह प्रकाश की अर्ध-प्रतिमा को प्रदर्शित करता है।

लकड़ी का शिव शीष - चित्तौड़गढ़ संग्रहालय
लकड़ी का शिव शीष – चित्तौड़गढ़ संग्रहालय

अगर आपके पास समय की कमी हो तो आप इस संग्रहालय को देखे बिना भी आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन, अगर आपके पास वक्त हो तो इस संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर ही रखा गया शिवजी का लकड़ी का बनाया हुआ विशाल सिर जरूर देखिये।

इस संग्रहालय में जाने के लिए आपको अलग से टिकिट खरीदनी पड़ती है, क्योंकि, यह किले की टिकिट से अलग है।

चित्तौड़गढ़ किले का रतन सिंह महल

रतन सिंह महल - चित्तौड़गढ़
रतन सिंह महल – चित्तौड़गढ़

रतन सिंह महल गाँव के उस पार रतनेश्वर तालाब के पास ही स्थित है। यह महल बहुत ही जीर्ण स्थिति में है। जब मैं इस महल के वीरान से अंदरूनी भागों में घूम रही थी, मुझे लगातार इसी बात का भय सता रहा था कि, कहीं कोई दीवार या छत गिर ना जाए। और अगर ऐसा होता तो शायद कोई भी कभी भी मेरे अवशेष नहीं ढूंढ पाता। इस महल के किनारे पर विशिष्टता से तराशा हुआ एक छोटा सा मंदिर है, जिसे रतनेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

प्रकाश और ध्वनि का खेल संध्या के समय आप कुंभ महल में वापस आकर यहां पर बैठे-बैठे चित्तौड़गढ़ किले से जुड़ी कहानियाँ, उसके नायक, नायिका और खलनायकों की कहानियाँ सुन सकते हैं।

चित्तौड़गढ़ में खरीदारी और तस्वीरें खिचना

राजस्थानी पोषक पहनिए और तस्वीरें निकालिए
राजस्थानी पोषक पहनिए और तस्वीरें निकालिए

पूरे किले में आपको हर जगह रगबिरंगी राजस्थानी कपड़ों की दुकानें मिलेंगी, जिनमें अधिकतर घागरे और रंगीन ओढ़नियाँ होती हैं। यहां पर आपको चांदी के जेवरों के ढेर मिलेंगे – इतने की आपको चुनने में परेशानी होगी। तथा पुरुषों के लिए भी तरह-तरह की असंख्य टोपियाँ हैं। हमारे बहुत से साथी यात्री कपड़े खरीदने के लिए इन दुकानों पर गए, लेकिन वहां जाकर उन्हें पता चला कि ये कपड़े बिक्री के लिए नहीं है। वास्तव में ये सारी दुकानें फोटोग्राफी के स्टूडिओ हैं। यहां पर आपको राजस्थानी पोशाक पहनाकर आपकी तस्वीरें खिचकर आपको दी जाती हैं। 50/- रूपय में आप अपने ही कैमरा से अपनी तस्वीर खिचवा सकते हैं और उस तस्वीर की प्रिंट के लिए आपको थोड़े और पैसे देने पड़ते हैं।

यहां पर बहुत सारे हस्तकला के केंद्र भी हैं और प्रत्येक गाइड आपको इन केन्द्रों पर ले जाता है। इनके झांसे में मत पड़िए, आप चाहें तो दुकानों को छोड़ आगे बढ़ सकते हैं। मुझे बताया गया था कि वहां पर सीताफल और केले का कपड़ा और चंदन की साड़ियाँ बनायी जाती हैं। लेकिन मेरी राय से ये सारे सिंथेटिक कपड़े हैं। बाद में मैं इसी गाँव की एक स्थानीय महिला से बात कर रही थी, जिन्होंने हँसते हुए मुझसे पूछा, “क्या सच में वहां पर चंदन की सरियाँ 400/- रूपय में बेचते हैं?”

अगर आप सोच रहें हैं कि मैंने चित्तौड़गढ़ किले के विभिन्न मंदिरों का उल्लेख क्यों नहीं किया, तो चित्तौड़गढ़ के मंदिरों पे मेरे अगले पोस्ट का इंतेजार कीजिये।

2 COMMENTS

  1. I read your blog on chittorgarh fort…you have explained almost everything remarkably….your expression is quite to the point and attractive….

    • दिनेश जी, आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत धन्यवाद. यूँ ही हमारा हौसला बढ़ाते रहिये.

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