गंगा देवी – मिथिला की मधुबनी चित्रकार और उनकी चित्रकारी

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मिथिला की प्रसिद्ध चित्रकार गंगा देवी की मधुबनी चित्रकारी  

गंगा देवी द्वारा अमरीका यात्रा का चित्रण
गंगा देवी द्वारा अमरीका यात्रा का चित्रण

आज मधुबनी और वार्ली चित्रकारी भारत की आदिवासी चित्रकला या लोक कला का प्रतीक बन चुकी है। यह चित्रकारी दिल्ली हाट की गलियों में, सूरजकुंड मेले में और अन्य कला उत्सवों में भी देखी जा सकती है। ये कला उत्सव भारत भर के विविध प्रकार के कलाकारों को एकत्र लाने का सबसे अच्छा माध्यम है। भारत के ग्रामीण घरों की दीवारों पर सजी इस चित्रकारी को जब कागज का सहारा मिला, तो चित्रकारों ने भी इस नए माध्यम के जरिये अपनी कला को पंख देने का निश्चय कर लिया। इस प्रकार पिछले 2-3 दशकों से आदिवासी चित्रकला व्यापक स्तर पर अपनी विशेष पहचान बनाने में सफल रही है।

एक बार मुझे गोवा विश्वविद्यालय में आदिवासी चित्रकला के संबंध में हुई संगोष्ठी में भाग लेने का मौका मिला था, जो नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक श्री ज्योतीन्द्र जैन द्वारा आयोजित की गयी थी। इस संगोष्ठी में उन्होंने कुछ आदिवासी चित्रकारों की जीवनकथाएं सुनाई थी, जिन्होंने ग्रामीण चित्रकला के क्षेत्र में आए परिवर्तनों को लाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इन्हीं में से एक थी मिथिला की गंगा देवी, जिन्होंने मधुबनी चित्रकारी के आंदोलन का मार्गदर्शन किया।

तो अब मैं इस महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध चित्रकार की जीवन कथा को आपके साथ साझा करने जा रही हूँ।

गंगा देवी और मधुबनी चित्रकारी   

गंगा देवी द्वारा रामायण में रावण वध का चित्रण
गंगा देवी द्वारा रामायण में रावण वध का चित्रण

गंगा देवी बिहार के मिथिला क्षेत्र में बसे एक छोटे से गाँव में रहती थी। बच्चा न हो पाने के कारण उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और दूसरा विवाह कर लिया। और इतना ही नहीं, उनके पास जो कुछ बचा था वह घरेलू मतभेदों के चलते उन्हें अपनी सौतन को सौपना पड़ा। समय के जिस दौर और वातावरण में गंगा देवी रह रही थी, उसमें उनकी किस्मत कुछ खास अलग नहीं थी। यद्यपि उनका भाग्य दूसरों से अलग जरूर था। इसी भाग्य ने एक दिन एक फ़्रांसिसी कला संग्राहक को उनके दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया। इस कला संग्राहक ने गंगा देवी को कागज देकर उसपर उनके लिए कुछ चित्र बनाने को कहा। उनकी चित्रकारी देखकर वे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने गंगा देवी को इनाम के तौर पर बहुत बड़ी रकम दे दी। उनके लिए शायद उन पैसों का कोई मोल नहीं था, लेकिन गंगा देवी के लिए ये पैसे ज़िंदगी काटने के लिए काफी थे।

इस प्रकार धीरे-धीरे उनकी कला चित्रकारी के क्षेत्र में उभरने लगी और उनके चित्रों की मांग बढ़ती गयी। वे दिल्ली के संग्रहालयों के अध्यक्षों की नजरों पर छाने लगी, जिन्होंने उन्हें शिल्प संग्रहालय जैसी जगहों पर आमंत्रित करना शुरू किया। इसी के साथ उन्होंने साधिकार चित्रों पर काम करना आरंभ किया। इसके बाद जैसे प्रसिद्धि ने उनके कदम चूम लिए।

मधुबनी चित्रकारी 

अनंतता का प्रतीक - मधुबनी, गंगा देवी
अनंतता का प्रतीक – मधुबनी, गंगा देवी

मधुबनी चित्रकारी पारंपरिक रूप से मिथिला के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित घरों की दीवारों पर की जाती थी। ये चित्र धार्मिक क्रियाकर्मों पर आधारित हुआ करते थे, जिन्हें कोहबर कहा जाता था। इन चित्रों में वर्णनात्मक प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें विशिष्ट रंगों में दर्शाया जाता है। ये चित्र ज्यादातर शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर बनाए जाते थे। उदाहरण के लिए, दूल्हे का कमरा जिसमें नव-विवाहित दूल्हा-दुल्हन रहते थे, उसे प्रजनन के प्रतीकों से चित्र रूप में सजाया जाता था, जैसे बांस का पेड़ या पूर्ण रूप से खिला हुआ कमल का फूल।

इन भित्तिचित्रों से एक प्रकार की पवित्रता की भावना जुड़ी होती थी। ये चित्र घर की औरतों से संबंधित हुआ करते थे, जो स्वयं ये चित्र बनाती थीं। यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि यह कला उन्होंने अपने परिवार की बुजुर्ग औरतों के अनुसरण द्वारा सीखी है क्योंकि, उस समय चित्रकारी सीखने के लिए कोई खास प्रशिक्षण केंद्र नहीं होते थे और महिलाओं के लिए तो इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। इसके पीछे या तो इन महिलाओं की व्यक्तिगत रुचि रही होगी या फिर हालात कारणीभूत रहे होंगे। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इनके चलते इनमें से कुछ महिलाओं ने शायद अपनी सखियों से कई अधिक चित्र बनाए होंगे।

मधुबनी चित्रकारी का कागजी सफर  

1960 के दौरान भारत सरकार ने इस गाँव में मुफ्त के कागज वितरित करने का निश्चय किया, जिसने महिलाओं को दीवारों के बदले कागजों पर अपनी कलाकारी को आकार देने के लिए प्रोत्साहित किया। चित्रकारी के बदलते माध्यम के साथ-साथ उसके विषयवस्तु की व्यापकता भी बढ़ती गयी। अब तक अनभिज्ञता के आवरण में ढके इस नए और प्रभावपूर्ण माध्यम की अचानक उपलब्धि ने गंगा देवी जैसी अनेकों महिलाओं की रचनात्मकता को अनावृत किया।

आगे जाकर इनमें से बहुत सी महिलाएं अपनी अनोखी चित्रण शैली के कारण सुविख्यात चित्रकार बन गईं। तथापि, विरासत के रूप में इन महिलाओं ने अपने क्षेत्र के लोगों के लिए कलाकेंद्र बनवाया। मधुबनी चित्रकारों की वृद्धि देखने के लिए आपको दिल्ली हाट जैसी जगहों की सैर करनी चाहिए या फिर किसी कला उत्सव में जाना चाहिए। इन कलाकारों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का यही सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे भी अधिक यह ग्रामीण समुदायों के लिए रोजगार का प्रमुख स्त्रोत है।

गंगा देवी द्वारा निर्मित रामायण की चित्रकथा  

राम लक्ष्मण सीता का केवट के नाव पे जाना - मधुबनी चित्र गंगा देवी
राम लक्ष्मण सीता का केवट के नाव पे जाना – मधुबनी चित्र गंगा देवी

धार्मिक क्रिया-कर्मों पर आधारित भित्तिचित्र बनाने वाली गंगा देवी ने रामायण जैसे विषय पर किस प्रकार की चित्रकारी की होगी? वैसे तो बचपन से हम सभी रामायण जैसे महाकाव्यों की गाथाएँ सुनते आए हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी से गुजरती रामायण की इन्हीं कथाओं को गंगा देवी ने अपनी चित्र श्रृंखला में अनुवादित किया। इसके अलावा उन्होंने बचपन से सुनती आयी अन्य लोक कथाओं को भी अपने चित्रों में ढाल दिया।

उनकी चित्रकारी में हाथ की संयमता, चित्रों की स्पष्टता और रंगों की प्रयोगात्मकता साफ झलकती है, जो चित्रकारी के इस व्यापक क्षेत्र में अन्यत्र दुर्लभ है। कागज के चौखटे में उपलब्ध सीमित जगह को चित्रकारी में इस्तेमाल करने की उनकी कला अप्रतिम है। चाहे उन्हें एक ही चित्र में अनेक दृश्य दिखाने हो या फिर गुजरते समय को दिखाना हो, उस छोटी सी जगह का प्रयोग वे उत्तम रूप से करती हैं।

गंगा देवी द्वारा बनाई गयी मानव जीवन की चित्र श्रृंखला  

गंगा देवी की मानव जीवन श्रृंखला
गंगा देवी की मानव जीवन श्रृंखला

मानव जीवन की चित्र श्रृंखला गंगा देवी की चित्रकारी का उत्कृष्ट नमूना है। इसमें उन्होंने एक ग्रामीण स्त्री का जीवन-चक्र चित्रित किया है। उस स्त्री के जन्म से लेकर यौनावस्था में उसका प्रवेश, उसकी शादी, उसका गर्भवती होना और विविध संस्कारों से गुजरना, बच्चे को जन्म देना, उसका पालन-पोषण करना, ताकि वह बच्चा आगे जाकर अपना एक नया जीवन चक्र आरंभ करने में सक्षम बन सके।

गर्भवती स्त्री का चित्रण - गंगा देवी
गर्भवती स्त्री का चित्रण – गंगा देवी

इस चित्र श्रृंखला में उन्होंने एक स्त्री के जीवन पड़ावों का चित्रण बहुत ही सादगी और सरलता के साथ किया है। इस में चित्रित दृश्यों को दर्शाने के लिए उन्होंने विशिष्ट प्रतीकों का उपयोग किया है और इन प्रतीकों के साथ भी उनकी प्रयोगात्मकता साफ दिखाई देती है। उनकी चित्रकारी जैसे समकालीन समाज की सांस्कृतिक बुनावट का दस्तावेजीकरण बन गयी है। जिसमें बच्चे को बुरी नज़र से बचाना या बच्चे के जन्म पर क्लीवों का नाच-गाना या कुलदेवता की पूजा करना जैसी छोटी-छोटी बातों को कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

गंगा देवी और अमरीका    

गंगा देवी की अमरीका यात्रा के दृश्य - मधुबनी चित्र शैली में
गंगा देवी की अमरीका यात्रा के दृश्य – मधुबनी चित्र शैली में

अमरीका जैसे पाश्चात्य देशों की यात्रा करने के पश्चात गंगा देवी के चित्रों में एक परिवर्तनात्मक मोड आया। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने जो भी देखा या अनुभव किया वह उनके लिए बिलकुल नया था। इन अनुभवित नज़ारों को उन्होंने अपनी चित्र श्रृंखला के जरिए अभिव्यक्त किया। उनकी इस चित्र श्रृंखला के कुछ चित्र मुझे सच में बहुत पसंद आए। उनके ये चित्र प्राच्य लोक कला और पश्चिमी समाज के अद्भुत सम्मिश्रण की उत्तम कलकारी है।

इन चित्रों को देखकर लगता है, जैसे गंगा देवी ने अपने अनुभवों को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया हो। मुझे याद है कि जब गोंड चित्रकार लंदन से वापस आए थे तब उन्होंने भी तारा बुक्स द्वारा प्रकाशित एक किताब के लिए कुछ इसी प्रकार की चित्रकारी की थी। इसके अलावा गंगा देवी ने अपनी अन्य यात्राओं, जैसे बद्रीनाथ और उत्तराखंड की यात्रा से अर्जित अनुभवों के आधार पर ऐसे ही चित्र बनाए थे।

बद्रीनाथ यात्रा - गंगा देवी की मधुबनी शैली में
बद्रीनाथ यात्रा – गंगा देवी की मधुबनी शैली में

अपने अनुभवों को चित्रानुवाद द्वार अभिव्यक्त करने की गंगा देवी की कला अद्वितीय है। चित्रकला के प्रति उनके इस योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

जीवन की इतनी सारी उपलब्धियों के दौरान गंगा देवी कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रही थी। लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी न बनाकर, अपने संघर्षों को कलात्मकता का रूप देकर उन्हें अपने चित्रों में ढाल दिया। तथापि कैंसर से उनकी इस लड़ाई में आखिर जीत उन्हीं की हुई और वे वापस अपने गाँव में रहने चली गयी। लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था। उनके सौतेले बेटे, जो शायद उनकी नयी-नयी अधिग्रहीत संपत्ति को हड़पना चाहता था, के हाथों गंगा देवी को बहुत ही हिंसक मृत्यु प्राप्त हुई।

चित्रकार और चित्रकारी  

गंगा देवी ने जिन परिस्थितियों में चित्रकारी का यह सफर शुरू किया था, उससे स्पष्ट होता है कि इस सफर में उन्होंने बहुत कुछ अर्जित किया है। लेकिन इससे अधिक वे अपने गाँव में अपने लिए एक पक्का घर बनवाना चाहती थी। आज उनकी इस कला के माध्यम से बहुत से लोग उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। उनके द्वारा बनाए गए चित्र, कला के बाज़ारों में लाखों–करोड़ों में बिक रहे हैं। इसके अलावा उनके कुछ भित्तिचित्र आप आज भी दिल्ली के शिल्प संग्रहालय में देख सकते हैं।

किसी भी चित्रकार की चित्रकारी की महत्ता और उसका मूल्य गुजरते समय के साथ बढ़ता जाता है। जो चित्रकारी जितनी पुरानी होती है, उसका मोल भी उतना ही अधिक होता है। ये कलाकृति जिसके भी पास जाती है उसकी झोली खुशियों और संपत्ति से भर देती है।

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