लाड बाजार – हैदराबाद की प्रतिष्ठा,प्रतीक एवं जीविका

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हैदराबाद में निवास करते समय मैंने यहाँ की धरोहरों के दर्शन हेतु कई पदयात्राएं की थीं। लाड़ बाज़ार उनमें से एक है। जिस किसी ने लाड बाजार के आसपास अथवा इसकी गलियों में भ्रमण किया है, वह इसकी चमक-धमक से अछूता नहीं होगा। यहाँ बिकती रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, स्वच्छ श्वेत मोती एवं विभिन्न प्रकार के वस्त्र व परिधान एक दूसरे के पूरक होकर आपका ध्यान आकर्षित करने में एक दूसरे से स्पर्धा करते भी प्रतीत होते हैं।

हैदराबाद का लाड बाजारयूँ तो मैं वहां हैदराबाद का एक विशेष दुपट्टा, खड़ा दुपट्टा क्या है एवं इसे कैसे धारण किया जाता है, यह जानने के लिए गयी थी। किन्तु बाजार में प्रवेश करते ही आपका ध्यान लाख की चूड़ियों पर ना जाए, यह हो नहीं सकता।

लाड बाजार हैदराबाद के दो प्रसिद्ध स्मारकों, चारमिनार एवं चौमहल्ला महल के मध्य स्थित है। यह बाजार चूड़ियों, आभूषणों एवं वस्त्रों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। मूसी नदी के तट पर स्थित हैदराबाद के लाड़ बाजार को मैं इस मनोरम नगरी का श्रृंगार रस मानती हूँ।

आईये मैं आपको इस लाड बाजार के मुख्य आकर्षण दिखाती हूँ।

खड़ा दुपट्टा – हैदराबाद की वधु पोशाक

हैदराबाद का खड़ा दुपट्टा
हैदराबाद का खड़ा दुपट्टा

मैंने जैसे ही लाड बाजार की गली में प्रवेश किया, स्वभाववश मैंने कैमरे में दृश्यों को अमर करना आरम्भ कर दिया। कैमरे की आँखों से भी वहां की चमक मुझे चकाचौंध करने लगी थीं। मेरे मन मष्तिष्क में सर्वप्रथम जो विचार कौंधा, वह था, ‘क्या यह हैदराबाद की शान है?’। चारों ओर चटकीले उजले रंगों के लहंगे, दुपट्टे एवं साड़ियाँ लटकी हुई थीं। उनमें खड़े दुपट्टे कुछ अधिक ही चटक एवं चमचमा रहे थे। उन पर पसरी रंगों की छटा एवं चमकीले जड़ाऊ काम ध्यान खींच रहे थे। किन पर दृष्टी टिके, किन पर नहीं, मेरी दृष्टी को ही समझ नहीं आ रहा था। मैंने निश्चय किया कि कुछ दुकानों में जाकर उन्हें खड़ा दुपट्टे दिखाने का आग्रह करूँ।

मेरी चाल-ढाल एवं मेरे परिधान देख दुकानदारों को गंभीर शंका हो रही थी कि मैं वास्तव में खड़ा दुपट्टा खरीदना चाहती हूँ। मैंने सत्यवादी बनाना ही ठीक समझा। मैंने उन्हें बताया कि मैं हैदराबाद की विशेष वस्तुओं की खोज में निकली हूँ तथा खड़ा दुपट्टा उनमें से एक है। उनमें से एक दुकानदार ने मुझे कृतार्थ किया तथा ६ मीटर से भी अधिक लंबा, पीले रंग का खड़ा दुपट्टा ओढ़ने व अपने कन्धों पर उसे संभालने में मेरी सहायता की।

वधु के लिए खड़ा दुपट्टा

12 मीटर की पोषक - खड़ा दुपट्टा
12 मीटर की पोषक – खड़ा दुपट्टा

मुझे बताया गया कि इस ६ मीटर के दुपट्टे के साथ २ मीटर का एक और दुपट्टा वधु को अपने सिर पर संभालना पड़ता है। इसके अतिरिक्त ४ मीटर कपड़ा कुर्ती एवं सलवार बनाने में आवश्यक होता है। इन सब पर भारी कढ़ाई एवं जरदोजी का काम होता है। आप सोच रहे होंगे इतना भार वधू कैसे ढोती होगी? यहाँ एक जानकारी आप को दे दूँ कि खड़ा दुपट्टा बनाने में प्रयोग किये जाने वाले वस्त्र का भार अधिक नहीं होता। अतः वधु के परिधान का भार अधिक नहीं होता।

खड़े दुपट्टों को सजाते कारीगर
खड़े दुपट्टों को सजाते कारीगर

लाड बाजार की गलियों में जाएँ तो आपको वहां कई कारीगर वस्त्रों पर कढ़ाई का कार्य करते दिखाई देंगे। एक खड़ा दुपट्टे पर एक साथ कई कारीगर कार्य करते हैं। कुछ उस पर धागों से कढ़ाई करते हैं तो कुछ उस पर सलमे-सितारे जड़ते हैं। इतने लम्बे दुपट्टे पर कढ़ाई करना आसान कार्य नहीं है।

लाड बाजार में लाख की चूड़ियाँ

मैं जब भी लाड बाजार आती थी, सदैव चूड़ियों की दुकानों के समक्ष मेरे पैर ठहर से जाते थे। मैंने यहाँ से अनेक चूड़ियाँ खरीदी हैं। रंगबिरंगी चूड़ियों से भरी यहाँ कई दुकानें हैं। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध वे चूड़ियाँ हैं जिन पर पुष्पाकृतियाँ बनी हुई हैं।

हैदराबाद के लाड़ बाज़ार में चमचमाती चूड़ियाँ
हैदराबाद के लाड़ बाज़ार में चमचमाती चूड़ियाँ

इस समय मैं चूड़ियाँ खरीदने नहीं, अपितु उन्हें बनाने वालों से भेंट करने की अभिलाषा लिए इन गलियों में आयी थी।

लाख की चूड़ियों की निर्मिती

धातु चूड़ी पे लाख चढाते कारीगर
धातु चूड़ी पे लाख चढाते कारीगर

टुकड़ों टुकड़ों में ही सही, अंततः मुझे लाख की चूड़ियों की निर्मिती की सम्पूर्ण प्रक्रिया को देखने एवं समझने का अवसर लाड़ बाजार की इन गलियों में प्राप्त हुआ।

धीमी आग पर सिकती चूड़ियाँ
धीमी आग पर सिकती चूड़ियाँ

• लाख की चूड़ियाँ बनाने के लिए सर्वप्रथम धातु की पतली चूड़ियाँ ली जाती हैं।
• इन्हें हाथों द्वारा पूर्ण गोलाकार दिया जाता है।
• लाख को अंगारों पर गर्म किया जाता है तथा इच्छित रंग उसमें मिलाया जाता है। इस लाख की पट्टियों को इच्छित आकृति एवं आकार दिया जाता है।
• तत्पश्चात इस लाख को धातु की चूड़ी पर चढ़ाया जाता है। हाथों द्वारा एक एक चूड़ी के आकार में सुधार किया जाता है ताकि इन्हें सही वृत्ताकार प्राप्त हो सके।
• तत्पश्चात इन मौलिक चूड़ियों को अन्य कारीगरों के पास भेजा जाता है जो इन पर सलमे-सितारे एवं नग जड़ते हैं।

हैदराबाद एवं राजस्थान की लाख की चूड़ियों में भिन्नता

हाथों से गढती एक एक चूड़ी
हाथों से गढती एक एक चूड़ी

एक कारीगर ने मुझे राजस्थान एवं हैदराबाद की लाख की चूड़ियों में भिन्नता समझाई। उसने अत्यंत गर्व से मुझे बताया कि हैदराबाद के कारीगरों में पायी जानी वाली कला अन्यत्र कहीं भी नहीं है। हैदराबाद की लाख की चूड़ियों को पहचानने का आसान माध्यम है उसकी चमक। जितनी अधिक चमक, उतनी ही अधिक संभावना है कि वह हैदराबाद की गलियों में बनी है। चमचमाती चूड़ियाँ हैदराबाद की विशेषताओं में से एक है।

राजस्थानी शैली में बनी लाख की चूड़ियों में एक चूड़ी पर सम्पूर्ण आकृति रंगी होती है जबकि हैदराबादी शैली की चूड़ियों में चूड़ियों का एक सम्पूर्ण समूह मिलकर एक आकृति चित्रित करता है।

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लाख की चूड़ियों की अर्थव्यवस्था

मैंने यहाँ गलियों में कई कार्यशालाएं देखीं जहां स्त्री एवं पुरुष एक छोटी अंगीठी के चारों ओर बैठकर लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं। तत्पश्चात ये रंगबिरंगी मनमोहक चूड़ियाँ मुख्य बाजार पहुंचकर ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। मुझे सहसा आभास हुआ कि ये चूड़ियों कितने ही घरों में उजाला करती हैं तथा कितने ही लोगों का उदर भरण करती हैं।

लाड बाज़ार में लाख की चूड़ियाँ
लाड बाज़ार में लाख की चूड़ियाँ

मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी गहनों एवं साजसज्जा का मोह नहीं रहा। मेरे लिए ये आभूषण, चूड़ियाँ इत्यादि ऐसी वस्तुएं हैं जिनके बिना भी आसानी से जिया जा सकता है। मैंने इन्हें सदैव दूसरों पर ही सराहा है। किन्तु हैदराबाद के लाड बाजार की इन गलियों में घूमते हुए मुझे आभास हुआ कि एक एक चूड़ी बनाने में कितना परिश्रम एवं समय लगता है। किसी की कलाइयों में सजने से पूर्व ये चूड़ियाँ कितने ही कारीगरों के हाथों से होकर जाती हैं। कितने परिवार इस उद्योग पर निर्भर हैं।

लाख की चूड़ियाँ ऑनलाइन खरीदें

अचानक मेरी भी इच्छा हुई कि मैं कुछ चूड़ियाँ अपने लिए भी ले लूं। नग जड़ी कुछ चूड़ियाँ मैंने भी खरीदी। लाड बाजार की गलियों में घूमने के पश्चात इन चूड़ियों एवं इन्हें बनाने वाले कारीगरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण में अब परिवर्तन आने लगा है। मेरे लिए अब ये मात्र आभूषण नहीं, अपितु इस उद्योग में रत कई परिवारों की जीविका है।

लाड बाजार के मोती

हैदराबाद के मोती हार
हैदराबाद के मोती हार

हैदराबाद को भारत की मोतियों की नगरी कहा जाता है। हैदराबाद किसी भी ऐसी नदी अथवा समुद्र के समीप स्थित नहीं है जहां मोतियों का उत्पादन होता हो। फिर भी यह मोतियों का सर्वाधिक विशाल संसाधन एवं व्यापारिक केंद्र है। आप जैसे ही इस बाजार के समीप पहुंचेंगे, आपको मोतियों की दूकान ढूंढनी नहीं पड़ेगी। जहां आपकी दृष्टी जायेगी, वहां मोतियों की दुकानें होंगी। दुकानों के विक्रेता आपको प्रेम से भीतर बुलाते हैं तथा मोतियों के आभूषणों को देखने का आमंत्रण देते हैं। आप चाहकर भी उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते।

श्वेत एवं धूमिल श्वेत रंग की मोतियों की लड़ियाँ चारों ओर लटकी हुई दृष्टिगोचर होंगी। मोतियों से बने गले के हार, कान के झुनके, चूड़ियाँ तथा अन्य आभूषण छलने लगते हैं। सबकी रूचि के अनुसार आभूषणों का अम्बार है। यहाँ मुझे भी मेरी रूचि के अनुसार मोती मिले। मैंने धूसर जैसे असाधारण रंगों के एवं असामान्य आकार के कई बड़े मोती खरीदे।

मोती उद्योग

मोतियों की छान बीन
मोतियों की छान बीन

यहाँ भी मुझे मोती संसाधन एवं उनसे आभूषण बनाने की कला को देखने की अभिलाषा थी। अतः मैं दुकान के पिछवाड़े स्थित मोती संसाधन इकाई में गयी। मोतियों को सर्वप्रथम इनके आकार के अनुसार छांटा जाता है। बड़ी बड़ी छलनियों द्वारा एक आकार की मोतियों के प्रथक ढेर बनाए जाते हैं। तत्पश्चात हाथों से उसकी माप एवं आकार के अनुसार छंटनी की जाती है।

हैदराबाद के मोती
हैदराबाद के मोती

तत्पश्चात छंटी हुई मोतियों में एक एक कर छोटी मशीन द्वारा छिद्र बनाए जाते हैं। इसके पश्चात उन्हें धागे में पिरोया जाता है। कुछ लड़ियाँ ऐसे ही बेची जाती हैं तथा कुछ को आभूषण निर्मिती इकाई में आकर्षण आभूषण बनाने के लिए भेज दिया जाता है। हम सबने इन इकाईयों को अवश्य देखना चाहिए। अंततः हमें भी जानना चाहिए कि जो आभूषण हम रूचि से धारण करते हैं, उन्हें बनाते कैसे हैं।

मोती के गहने
मोती के गहने

मेरी हार्दिक अनुशंसा है कि हैदराबाद के इस बाजार में आप अवश्य जाएँ एवं उसकी गलियों में विचरण करें। यह खरीददारों का स्वर्ग है।

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सरोजिनी नायडू की कविता ‘हैदराबाद के बाजारों में’

१०० से अधिक वर्षों पूर्व, प्रसिद्ध कवियित्री, लेखिका, स्वतंत्रता सेनानी एवं हैदराबाद की निवासी सरोजिनी नायडू ने हैदराबाद के बाजारों पर एक स्तुतिपूर्ण कविता रची थी। यह स्वदेशी अभियान का एक भाग भी था जहां देश के तात्कालिक नेताओं ने देश में बनी स्वदेशी वस्तुओं के उपभोग को बढ़ावा दिया था तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का अव्वाहन किया था। सरोजिनी नायडू ने हैदराबाद के इस जीवंत बाजार को किस प्रकार अपनी कविता द्वारा सजीव किया, यह आप इस कविता में देख सकते हैं। उस समय से अब तक इस बाजार में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है।

In The Bazaars of Hyderabad
What do you sell, O merchants?
Richly your wares are displayed
Turbans of crimson and silver
Tunics of purple brocade
Mirrors with panels of amber
Daggers with handles of jade
What do you weigh, O ye vendors?
Saffron, lentil, and rice
What do you grind, O ye maidens?
Sandalwood, henna, and spice
What do you call, O ye pedlars?
Chessmen and ivory dice
What do you make, O ye goldsmiths?
Wristlet and anklet and ring
Bells for the feet of blue pigeons
Frail as a dragonfly’s wing
Girdles of gold for the dancers
Scabbards of gold for the kings
What do you cry, O fruitmen?
Citron, pomegranate and plum
What do you play, O ye musicians?
Sitar, Sarangi, and drum
What do you chant, O magicians?
Spells for the aeons to come
What do you weave, O ye flower-girls?
With tassels of azure and red?
Crowns for the brow of a bridegroom
Chaplets to garland his bed
Sheets of white blossoms new-garnered
To perfume the sleep of the dead.

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अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    हैदराबाद के लाड बाजार की रंगबिरंगी लाख की चूडियों के बारे में सुंदर जानकारी, साथ ही आलेख में दिये गये चित्र से यहां की और राजस्थान की लाख की चूडियों मे अंतर सुस्पष्ट होता है । सही मे चूडियाॅं बनाने वाले कारीगरों की मेहनत काबील-ए-तारीफ है !
    हैदराबादी मोतीयों का तो जवाब ही नहीं !
    ज्ञानवर्धक आलेख हेतू साधुवाद !

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