आमेर दुर्ग विश्व की तीसरी विशालतम प्राचीर – एक विश्व धरोहर

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आमेर दुर्ग, जयपुर नगर की बाह्य सीमा पर स्थित एक विशिष्ठ दुर्ग है। प्राचीनकाल में यह मात्र एक दुर्ग ना होते हुए, एक प्रमुख संरक्षित नगरी थी। कालान्तर में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इसके पड़ोस में एक नए सुनियोजित नगर का निर्माण एवं विकास किया था। अतः आमेर दुर्ग को तात्कालिक जयपुर नगर का पूर्वज कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

आमेर दुर्ग के भित्तिचित्र
आमेर दुर्ग के भित्तिचित्र

यूनेस्को द्वारा राजस्थान के छः दुर्गों को विश्व विरासत स्थल का गौरव प्राप्त है। आमेर दुर्ग उन्ही में से एक दुर्ग है। इस सूची के अन्य दुर्ग हैं, कुम्भलगढ़ दुर्ग, चित्तौड़गढ़ दुर्ग, जैसलमेर दुर्ग, रणथम्बोर दुर्ग तथा गागरोन दुर्ग।

आमेर दुर्ग का संक्षिप्त इतिहास

पहाड़ियों से घिरा आमेर दुर्ग - राजस्थान
पहाड़ियों से घिरा आमेर दुर्ग – राजस्थान

जैसा कि आप सब ने भी अनुभव किया होगा, दुर्ग बहुधा पहाड़ी की चोटी पर निर्मित किये जाते थे। आमेर दुर्ग भी एक पहाड़ी पर स्थित है। इस पहाड़ी को चील का टीला कहा जाता है, अर्थात् पहाड़ी जिस पर चीलों का वास हो। इस पहाड़ी पर सर्वप्रथम एक दुर्ग का निर्माण मीणा नामक आदिवासी जनजाति ने सन् १०वीं ई. में की थी। कालान्तर में इस दुर्ग का भाग्य परिवर्तन हुआ जब राजा मानसिंह ने इस पर अधिपत्य प्राप्त किया तथा १७वीं ई. में इस पर एक भव्य दुर्जेय दुर्ग का निर्माण करवाया था। इसी कार्य को सम्पूर्ण करते हुए राजा सवाई जय सिंह ने कालान्तर में समीप ही एक नवीन नगर की स्थापना की थी। यही नियोजित नगर आज राजस्थान की राजधानी जयपुर है।

आमेर दुर्ग को घेरती बस्ती को आमेर कहा जाता है। मुझे बताया गया कि आमेर में ही कुल ३६५ छोटे बड़े मंदिर हैं। इनमें से कई मंदिरों के शिखर स्तंभ आप आमेर दुर्ग की प्राचीर से देख सकते हैं। इन मंदिरों के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिए आमेर की पदयात्रा करणी होगी।

चीन की प्रसिद्ध भित्त एवं कुम्भलगढ़ दुर्ग के पश्चात आमेर दुर्ग का स्थान है जिसकी सीमा भित्त सर्वाधिक लंबी है।

आमेर शब्द की व्युत्पत्ति अम्बिका मंदिर अथवा अम्बिकेश्वर नामक एक शिव मंदिर से हुई है।

आमेर दुर्ग के १० प्रमुख अवलोकनीय स्थल

आमेर एक प्राचीन दुर्ग नगरी होने के कारण यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का भण्डार है। विशेष रूप से ऐतिहासिक स्थलों में रूचि रखते पर्यटकों हेतु यह स्वर्ग सदृश है। प्रस्तुत है कुछ महत्वपूर्ण स्थलों की सूची जिनके आप आमेर यात्रा पर अवश्य दर्शन करें:-

जलेब चौक

जलेब चौक - आमेर दुर्ग
जलेब चौक – आमेर दुर्ग

आमेर दुर्ग की प्रसिद्ध भित्त को पार करते ही हम दुर्ग के विशाल प्रवेश द्वार पर पहुंचे जिसे सूरज पोल अथवा सूरज द्वार कहा जाता है। इस प्रवेशद्वार से भीतर प्रवेश करते ही आप स्वयं को एक खुले प्रांगण में पायेंगे जो तीन ओर से पीली संरचनाओं से घिरा है। चौथी ओर भित्त है जो ताल के समक्ष स्थित है। इस ताल के मध्य एक केसर क्यारी है। यह राजस्थान के गर्म एवं शुष्क जलवायु में ठण्ड में उगने वाला केसर उगाने का एक प्रयास था। यह प्रयास सही मायनों में सराहनीय है।

शिला देवी मंदिर

शिला देवी मंदिर, शक्ति अर्थात् काली को समर्पित मंदिर है। कहा जाता है कि मंदिर में स्थापित शिला अथवा पाषाणी प्रतिमा बंगाल से लाई गयी है जहां देवी काली की आराधना की जाती है। युद्ध पर प्रस्थान करने से पूर्व क्षत्रिय योद्धा देवी काली का आव्हान करते हैं। इसीलिए प्रत्येक दुर्ग के भीतर एक शक्ति अथवा काली का मंदिर आप अवश्य देखेंगे। मैंने तो नेपाल के कपिलवस्तु के ६वीं ईसा पूर्व के खंडहरों में भी देवी मंदिर के अवशेष देखे थे।

शिला देवी मंदिर के चांदी के आकर्षक उत्कीर्णित द्वार आपका मन मोह लेंगे।

दीवान-ए-आम

दीवान-ए-आम - आमेर किला
दीवान-ए-आम – आमेर किला

दीवान-ए-आम, अर्थात् जनसाधारण की सभा। यह वही स्थान है जहां राजा प्रजा की समस्याओं को सुनते थे, उनका हल निकालते थे तथा सार्वजनिक घोषणायें करते थे। इस सभाग्रह के स्तंभों ने मेरा विशेष ध्यान आकर्षित किया। ये स्तंभ इस सभाग्रह को विशेष आयाम प्रदान कर रहे थे। सभाग्रह की छत के किनारे बने वृत्ताकार तोरण ऐसा आभास दिला रहे थे मानो मैं सभाग्रह के भीतर खड़ी हूँ। वहीं चारों ओर स्थित खुले प्रांगण एक मुक्त वातावरण का आनंद प्रदान कर रहे थे।

इस सभाग्रह की एक ओर विशेषता जो मुझे भायी वह थे स्तंभों पर बने गज रुपी स्तंभशीर्ष।

गणेश पोल

गणेश पोल - आमेर दुर्ग राजस्थान
गणेश पोल – आमेर दुर्ग

यह पोल आमेर दुर्ग के भीतर स्थित निजी क्षेत्र अर्थात् आमेर राजमहल का प्रवेशद्वार है। इस प्रवेशद्वार पर बने भित्तिचित्र जगप्रसिद्ध हैं। महीन, जटिल तथा सूक्ष्म, वहीं मनमोहक रंगों भरी ये भित्तिचित्र छायाचित्रकारों हेतु अतिप्रिय तथा प्रेरणा स्त्रोत हैं। गणेशजी के जैसे चित्र आप अन्य मंदिरों, दुर्गों एवं महलों में देखते हैं, वैसे ही एक भित्तिचित्र यहाँ मध्य भाग में चित्रित है। शेष भित्त एवं छत पर फूल-पत्तियों की चित्रकारी की गयी है। ये भित्तिचित्र विभिन्न कला-संस्कृतियों का मनमोहक मिश्रण है। गणेश का चित्र हिन्दू कला-संस्कृति का , फूल-पत्तियाँ मुग़ल कला-संस्कृति का तथा हलके रंगों का चुनाव अंग्रेजी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्थात् आमेर दुर्ग उस काल का प्रतीक है जब भारत में हिन्दू, मुग़ल तथा अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव भारतीय संस्कृति को नयी दिशा दे रहे थे।

छत एवं दीवार की निचली झालर पर बने भित्तिचित्र देखना ना भूलें।

हमाम

गणेश पोल के बाईं ओर एक हमाम है। कदाचित आमेर दुर्ग के निर्माण के समय हमाम निर्माण का प्रचालन रहा होगा। यह हमाम तो छोटा है पर इसकी यंत्रप्रणाली अत्यधिक रोचक है। इसके छोटे से झरोखे से बाह्य दृश्य दिखाई देता होगा, किन्तु सुरक्षा की दृष्टी से इसे अभी अवरुद्ध किया गया है।

शीश महल – आमेर दुर्ग का सर्वाधिक सुन्दर भाग

शीश महल - आमेर किला जयपुर
शीश महल – आमेर किला जयपुर

शीश महल वास्तव में दीवान-ए-ख़ास अर्थात् राज-काज से सम्बंधित विशिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों का परामर्श कक्ष था। यहाँ राजा अपने मंत्रियों तथा राजपरिवार के अतिथियों से भेंट करते थे। इस सभाग्रह की सम्पूर्ण भित्तियाँ तथा छत छोटे छोटे दर्पण अर्थात् शीशे के टुकड़ों से मढ़ी हुई हैं। इसी कारण इस सभाग्रह को शीश महल कहा जाता है। ऐसा मानना है कि मुग़ल-ए-आज़म चलचित्र में दर्शाए गए शीश महल की कल्पना इसी शीश महल से प्राप्त की गयी थी। चूंकि यह दर्पण के टुकड़े स्वच्छ श्वेत भित्तियों पर मढ़े हुए है, अतः रात्रि में जले दीपों के प्रकाश में इनकी चमक की कल्पना करने में मैं असमर्थ थी।

शीश महल की कारीगरी - आमेर
शीश महल की कारीगरी – आमेर

मेरे मतानुसार दर्पण के टुकड़ों से भित्तियों को मढ़ना इनकी सुन्दरता में वृद्धि तो करता ही है, साथ ही रोशनी के कुछ ही साधनों से प्रकाश कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

आमेर दुर्ग के शीश महल के समक्ष एक व्यवस्थित बाग़ शोभायमान है।

शीश महल के स्तम्भ पर जादुई फूल
शीश महल के स्तम्भ पर जादुई फूल

सुझाव – शीश महल के एक स्तंभ के आधार पर एक जादुई पुष्प उत्कीर्णित है जो उड़ते तितली के जोड़े को दर्शाते हैं। उस पर सही स्थानों पर हथेली को सही प्रकार से रख कर आप इसमें एक मछली की पूंछ, एक नाग का फण, एक गज की सूंड, सिंह की पूंछ, एक बिच्छु तथा एक भुट्टा खोज सकते हैं। इस स्तंभ को देखना ना भूलें। इन जंतुओं को खोजने में असमर्थ हों तो किसी परिदर्शक की सहायता आवश्यक लें।

सुख महल

सुख महल का हाथीदांत युक्त द्वार
सुख महल का हाथीदांत युक्त द्वार

सुख महल सही मायनों में सुख सुविधाओं से युक्त महल था। इसके भीतर जल की संकरी नालियाँ चारों ओर बनी हुई हैं जिनसे बहता जल महल को शीतल रखता है। यह उस काल का वातानुकूलित महल था। रेगिस्तानी ऊष्ण जलवायु के रहते यह ठंडक ही असली सुख है। भित्तियों पर बनी आकृतियों को नीले रंग के अनेक छटाओं से रंग गया है। नीला रंग महल के परिवेश को अतिरिक्त शीतलता प्रदान कर रहा था।

सुझाव – चन्दन की लकड़ी द्वारा निर्मित द्वार पर हाथी दन्त की जडाऊ कारीगरी देखने योग्य है। यद्यपि अधिकतर जड़ाई वर्तमान में भंगित है, तथापि शेष जड़ाई द्वारा इसके यशस्वी अतीत की कल्पना की जा सकती है।

सुहाग मंदिर

सुख मंदिर - आमेर दुर्ग
सुख मंदिर – आमेर दुर्ग

यह एक आकर्षक मंडप है जिसके ऊपर अर्धगोलाकार गुम्बद बना हुआ है। गुंबद पर हलके हरे व लाल रंग की पट्टियां रंगी गयी हैं। भित्तियों पर भी चटक रंगों में फूल-पत्तियों की आकृतियाँ बनायी गयी हैं। वहां लगे एक संगमरमर पट्टिका पर इसका नाम सुहाग मंदिर लिखा हुआ है। संभवतः यह मंडप सुहागनों द्वारा धार्मिक संस्कार तथा उत्सव मनाने के उपयोग में लाया जाता होगा।

मैंने इस मंडप के भीतर प्रवेश कर जालीदार नक्काशी के छिद्रों से चारों ओर दृष्टी दौड़ाई। उस ऊंचाई से चारों ओर की पहाड़ियां तथा महल के दीवान-ए-आम तथा अन्य निचले भागों का मनभावन दृश्य मुझे प्राप्त हो रहा था।

मानसिंह महल की बारादरी

आमेर के मान सिंघ महल की बारादरी
आमेर के मान सिंघ महल की बारादरी

बारादरी एक छोटा मंडप है जो एक खुले प्रांगण के मध्य बनाया गया है। यह महल का प्राचीनतम भाग भी है। अतः मेरे अनुमान से दीवान-ए-आम से पूर्व, यही स्थान जनता से भेंट हेतु प्रयोग में लाया जाता रहा होगा। कदाचित यह राजा का आमोद-प्रमोद स्थल भी रहा हो।

यह प्रांगण भित्तियों से घिरा हुआ है तथा इसके चारों ओर निवासकक्ष बने हुए हैं।

जनाना

आमेर के रानीवास की कलाकृतियाँ
आमेर के रानीवास की कलाकृतियाँ

जनाना का अर्थ है महल में स्त्रियों के कक्ष। महल का यह भाग स्वयं में एक सम्पूर्ण विश्व होता था। जनाना अथवा अन्तःपुर पर कई पुस्तकें एवं कथाएं लिखी गयी हैं। पर-पुरुषों का उस ओर जाना निषेध था। परिवार के पुरुष सदस्यों को भी यहाँ प्रवेश की सीमित अनुमति होती थी। यही कारण है कि महल का जनाना तथा अन्तःपुर जनसाधारण हेतु सदैव पहेली का विषय रहा है।

आमेर दुर्ग में मुझे यह भाग अत्यंत अव्यवस्थित प्रकार से निर्मित प्रतीत हुआ। बहुत विचार करने के पश्चात मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि कदाचित इसकी भूलभुलैय्या संरचना आक्रमणकारियों को भ्रमित कर उनसे रानियों एवं दासियों की रक्षा करने के लक्ष्य से बनाया गया हो। अथवा कालान्तर में आवश्यकतानुसार अतिरिक्त कक्षों को उपलब्ध स्थानों पर निर्मित किया गया हो। मेरे मष्तिष्क का नटखट भाग यह अनुमान लगा रहा था कि कदाचित इसकी अव्यवस्थित संरचना जानबूझ कर की गयी थी ताकि राजा स्वेच्छानुसार किसी भी रानी के कक्ष में जा सकें तथा अन्य रानियों को इसकी भनक भी ना लगे। यह और बात है कि राजा किसी रानी के कक्ष में जाएँ तथा अन्य रानियों को इसकी जानकारी ना मिले, यह इतना आसान नहीं। अंततः मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि इस भूलभुलैय्या जनाने में आप आसानी से राह भटक सकते हैं।

जनाने के कक्षों को स्त्रीसुलभ प्रकार से सजाया गया है। इनमें से कुछ कक्षों के छतों तथा भित्तियों पर की गयी नक्काशी आपका मन मोह लेगी। यहाँ उगाया गया तुलसी का एक पौधा उसी प्रकार से रखा गया है जैसा उस काल में यहाँ निवास करती रानियाँ इसकी पूजा अर्चना करती थीं।

आमेर दुर्ग पर ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन

आमेर का ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम
आमेर का ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम

आमेर दुर्ग पर प्रदर्शित ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन बहुत अच्छा था परन्तु यह भारत के सर्वोत्तम ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन की टक्कर में किंचित पीछे था। चित्तोड़गढ़ का ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन निश्चित रूप से इससे श्रेष्ठ था। तथापि आमेर दुर्ग के इतिहास को समझने का श्रेष्ठतम उपाय यही है। समक्ष दुर्ग का प्राचीर, अग्रभाग में जल श्रोत तथा उन पर खेलती रंग बिरंगी प्रकाश की किरणें! इस आकर्षक परिवेश में गूंजते स्वर आमेर का इतिहास वर्णन कर रहे थे।

इतिहास की गाथाएँ कहते स्वरों के मध्य बजते राजस्थानी लोक संगीत इसमें अपना रंग घोल रहे थे। कुछ स्थानों पर कहानियों को अनावश्यक रूप से खींचा गया प्रतीत हुआ। कुल मिलाकर वहां विश्रांति लेते, बड़े परदे पर आमेर दुर्ग पर संगीत नाटक देखना अच्छा था।

आमेर का अनोखी संग्रहालय

अनोखी संग्रहालय - आमेर
अनोखी संग्रहालय – आमेर

यह अनोखी संग्रहालय भारतीय, विशेषतः राजस्थानी वस्त्रों को समर्पित है। यह संग्रहालय तथा इनमें प्रदर्शित वस्तुएं देखने योग्य हैं। साथ ही संग्रहालय की हवेली में हुए जीर्णोद्धार की गाथाएँ भी अनोखी हैं। इसे चंवर पालखीवालों की हवेली भी कहा जाता है। इसके नाम से मैंने अनुमान लगाया कि यह हवेली उन पालखी तथा चावडी धारकों की थी जो राजपरिवार की पालखी कन्धों पर उठाते थे। वर्तमान में यह प्रथा विलुप्त हो गयी है परन्तु उनका नाम धरे यह हवेली अभी भी उनकी गाथाएं कह रही है। इस हवेली में पुनरुद्धार का कार्य इतनी कुशलता से किया गया है कि मैं इसके अतीत को जीवंत अनुभव कर पा रही थी।

अनोखी संग्रहालय में पर्दर्शित परिधान
अनोखी संग्रहालय में पर्दर्शित परिधान

इस संग्रहालय में प्रदर्शित वस्त्र  तथा परिधान भारतवर्ष की संस्कृति की विविधता को सजीव प्रदर्शित कर रही थे। वस्त्रों पर रंगे नमूने, धारकों के सामाजिक ओहदे दर्शा रहे थे। छपाई में उपयोग में लाए जाने वाले  लकड़ी के ठप्पे किस प्रकार बनाए जाते हैं यह आप यहाँ देख सकते हैं। इसी प्रकार वस्त्रों पर छपाई का कार्य भी आप यहाँ देख सकते हैं। इस संग्रहालय के अवलोकन हेतु १ से २ घंटों का समय पर्याप्त है। स्मारिका खरेदी हेतु यहाँ एक विक्री खिड़की है, किन्तु यहाँ वस्तुओं का सीमित संग्रह है। अनोखी संग्रहालय के स्मारिकाओं की एक दुकान शहर में भी है जहां से आप हर प्रकार की स्मारिका खरेदी कर सकते हैं।

और पढ़ें:- अहमदाबाद का कैलिको संग्रहालय

आमेर दुर्ग के समीप विश्रामगृह

गणेश पोल - आमेर किला
गणेश पोल – आमेर किला

अपनी आमेर तथा जयपुर की इस यात्रा के समय में जयपुर के लेबुआ रेसॉर्ट में ठहरी थी। इस रेसॉर्ट का एक  लेबुआ लॉज आमेर में भी है जो आमेर दुर्ग की भित्त के बाजू स्थित है। यहाँ सर्व सुख सुविधाओं युक्त कई विशेष तम्बू हैं। मैंने निश्चय किया कि मेरी अगली जयपुर यात्रा के समय मैं इन्ही तम्बुओं में ठहरूंगी ताकि उन मंदिरों के भी दर्शन कर सकूं जिन्हें इस यात्रा में नहीं देख पायी. साथ ही सूर्योदय के समय इस क्षेत्र के पक्षियों का भी अवलोकन कर सकूं।

आमेर दुर्ग के अवलोकन के लिए कुछ सुझाव

  • आमेर दुर्ग के दर्शन के लिए १ से २ घंटों का समय पर्याप्त है।
  • अनोखी संग्रहालय के लिए कम से कम २ घंटो का समय लगता है।
  • आमेर दुर्ग के भीतर चलने तथा चढ़ने-उतरने की आवश्यकता रहती है। अतः पैरों में आरामदायक जूते पहनें।
  • आमेर दुर्ग को समझने हेतु एक जानकार परिदर्शक की सेवायें अवश्य लें। टिकट खिड़की पर श्रव्य परिदर्शक की सुविधा भी उपलब्ध है।

जयपुर के अन्य पर्यटन स्थलों की जानकारी प्राप्त करने हेतु निम्न संस्मरणों को पढ़ें:-

  1. आभानेरी की चाँद बावड़ी – भारत की सर्वोत्कृष्ट बावड़ी
  2. खाटू श्याम – महाभारत के पराजितों के देव
  3. जयपुर के १५ सर्वोत्कृष्ट स्मारिकायें – जयपुर में खरेदी
  4. जयपुर का जंतर-मंतर – सवाई जयसिंह की दर्शनीय वेधशाला
  5. भानगढ़ दुर्ग – भारत का सर्वाधिक भुतहा स्थान

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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