कलिंग नागर स्थापत्य शैली – रेखा देउल, पीढ देउल, खाखरा देउल

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मंदिर स्थापत्य की जो नागर शैली ओडिशा से सम्बंधित रखती है, उसे कलिंग नागर शैली कहते हैं।

नागर शैली का प्रयोग सामान्यतः उत्तर भारत मंदिर वास्तुकला में किया गया है। मंदिर स्थापत्य में नागर शैली एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध शैली रही है। इसका प्रमाण है इस शैली में निर्मित मंदिर, जो हिमालय से लेकर उत्तर कर्णाटक तक तथा गुजरात से लेकर ओडिशा तक, सम्पूर्ण भारत में दृष्टिगोचर होते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के मंदिरों में शुद्ध नागर शैली में कुछ क्षेत्रीय सूक्ष्मताएँ व विविधताएं समाविष्ट हुई हैं। उनमें, ओडिशा के मंदिरों में जो क्षेत्रीय विविधताएं समाविष्ट हुई, वे सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

कोणार्क सूर्य मंदिर - कलिंग मंदिर वास्तुशैली का उत्कृष्ट उदहारण
कोणार्क सूर्य मंदिर – कलिंग मंदिर वास्तुशैली का उत्कृष्ट उदहारण

यद्यपि, ओडिशा में प्रचलित मंदिर स्थापत्य की कलिंग नागर शैली उस मूल नागर शैली से साम्य रखती है जो भारत के उत्तरी एवं मध्य भूभागों में दृष्टिगोचर होते हैं तथापि ओडिशा कलिंग देश के रूप में प्रख्यात होने के कारण, यहाँ विकसित मंदिर स्थापत्य शैली को इस क्षेत्र का नाम प्राप्त हुआ। इसीलिए मंदिर स्थापत्य की ओडिशा शैली को कलिंग नागर शैली कहा जाने लगा।

संस्कृति के सभी आयामों के आधार पर ओडिशा एक सर्व गुण संपन्न क्षेत्र रहा है। भारत के अन्य भागों के समान ओडिशा में भी प्राचीन काल से विभिन्न साम्प्रदाय बसे एवं विकसित हुए। ओडिशा के मंदिर ओडिशा की विविध संस्कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं।

ओडिशा के कलिंग नागर शैली में निर्मित मंदिरों की ऊंचाई अत्यंत विशाल होती है। वस्तुतः, यह तत्व ओडिशा स्थापत्यकला के विशेष लक्षणों में से एक है। ओडिशा में इस शैली में निर्मित प्रमुख मंदिर १०वीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी के अंतराल में गंग वंश के शासनकाल में निर्मित किये गए थे।

कलिंग नागर शैली के मंदिरों के प्रमुख तत्व

कलिंग नागर शैली में निर्मित मंदिरों के दो प्रमुख तत्व होते हैं, गर्भगृह एवं मंडप जो एक ही अक्ष अथवा धुरी पर स्थापित होते हैं। अलंकारिक आवश्यकताओं के अनुसार इन दो तत्वों का पुनर्विभाजन भी देखा गया है। कालान्तर में इस शैली में अन्य मंडपों का भी समावेश किया गया, जैसे भोग अर्पण करने के लिए भोग देउल, नृत्य प्रदर्शनों के लिए नाट्य देउल इत्यादि।

कुछ विरले मंदिरों में स्वतन्त्र तोरण भी दृष्टिगोचर हो जाते हैं। तोरण का अर्थ है मंदिर के समक्ष खड़ा प्रवेशद्वार जिसमें दो स्वतन्त्र स्तंभों पर संतुलित एक वृत्त-खंड होता है। उदहारण के लिए, भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर मंदिर  का स्वतन्त्र तोरण।

कलिंग नागर मंदिरों की विभिन्न उप-शैलियाँ

कलिंग वास्तु शैली में तोरण - मुक्तेश्वर मंदिर भुबनेश्वर
कलिंग वास्तु शैली में तोरण – मुक्तेश्वर मंदिर भुबनेश्वर

शैलीगत प्रारूप से देखें तो कलिंग नागर शैली के तीन प्रमुख वर्गीकरण हैं, रेखा देउल, पीढ देउल तथा खाखरा देउल। मंदिर निर्मिती में इन तीनों उप-शैलियों का बहुतायत में प्रयोग किया जाता था। इन तीनों शैलियों में निर्मित उत्कृष्ट मंदिरों के अनेक उदहारण हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रत्येक उप-शैली के अंतर्गत निर्मित मंदिरों में भी आप वास्तुकला के तत्वों के क्रियान्वयन में अनेक परिवर्तन एवं परिशोधन देख सकते हैं। इन सभी शैलियों में निर्मित मंदिरों का एक समतत्व यह है कि लगभग सभी मंदिर चौकोर ढाँचे पर खड़े होते हैं। केवल खाखरा देउल में आयताकार आधार होता है क्योंकि इसके शीर्ष पर निर्मित अधिरचना एक ढोल के आकार की होती है। इनके अतिरिक्त जो भी परिवर्तन हैं वे अधिकतर मंदिर के बाह्य भागों में होते हैं।

ओडिशा के मंदिरों में वास्तुकला के उपरोक्त उल्लेखित प्रथम दो वर्गीकरण अधिक दृष्टिगोचर होते हैं।

रेखा देउल

रेखा देउल की विशेषता प्रमुखतः मंदिर के शिखर में दृष्टिगोचर होती है जो गर्भगृह के ऊपर स्थित होती है। व्युपत्ति के आधार पर विवेचना की जाए तो रेखा देउल का अर्थ है “वक्रीय मंदिर”। इसके शिखर की बनावट वक्र रेखा में होती है। अर्थात् शिखर का निचला भाग कम सघन होता है तथा जैसे जैसे ऊपर की ओर जाएँ तो वक्रीय रूप से इसकी सघनता अत्यधिक होती जाती है। रेखा देउल में शिखर के चारों ओर गोलाकार रेखाएं होती हैं जो शिखर के आधार से अधिरचना के शीर्ष तक जाती हैं। लैटिना नागर शैली के विपरीत, जिसमें मध्य रेखा जंघा से आरम्भ होती है, यहाँ रेखाएं शिखर के आधार से आरम्भ होती हैं।

रेखा देउल शैली में बना लिंगराज मंदिर का शिखर - भुबनेश्वर
रेखा देउल शैली में बना लिंगराज मंदिर का शिखर – भुबनेश्वर

ओडिशा में रेखा देउल की शैली में निर्मित दो प्रसिद्ध मंदिर हैं, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर तथा पुरी का जगन्नाथ मंदिर। लिंगराज मंदिर की स्थापत्य तिथि सन् ११०० आंकी गयी है। यह मंदिर ओडिशा के अनेक मंदिरों के लिए एक मानदंड सिद्ध हुआ है। कुछ वर्षों पश्चात पुरी के जगन्नाथ मंदिर ने भी लिंगराज मंदिर की भव्यता एवं गरिमा को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।  नरसिम्हा-प्रथम के शासनकाल (सन् १२३८-१२६४) में निर्मित कोणार्क के जगप्रसिद्ध सूर्य मंदिर ने निर्माण-स्तर एवं क्रियान्वयन में लिंगराज मंदिर को भी पीछे छोड़ दिया था। वर्त्तमान में अपने खंडित रूप में भी कोणार्क सूर्य मंदिर अत्यंत भव्य एवं प्रभावशाली प्रतीत होता है। कोणार्क का सूर्य मंदिर कलिंग शैली का एक अत्यंत गूढ़ रहस्य ही है।

रेखा देउल को स्थूल रूप से आधार से शीर्ष तक तीन प्रमुख भागों में बांटा गया है:

  • बाडा (लम्बवत भित्ति)
  • गंडी (शिखर अथवा अधिरचना)
  • मस्तक (कलश अथवा शीर्ष)

पीढ देउल

व्युपत्ति के आधार पर पीढ देउल का अर्थ है “सपाट आसन का मंदिर”।  इसका शिखर चरणबद्ध किन्तु संकुचित पिरामिड के सामान होता है। क्रमशः घटते आकार में अनेक सपाट मंच एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। प्रत्येक मंच एक तल का प्रतिरूप होता है। इनके शीर्ष पर एक आमलक अथवा अमलका अवश्य होता है।

भास्करेश्वर मंदिर का पीढ देउल शैली में बना शिखर
भास्करेश्वर मंदिर का पीढ देउल शैली में बना शिखर

सामान्य रूप से, पीढ देउल वास्तव में एक धुरी पर स्थित मंडप होते हैं जो गर्भगृह के समक्ष स्थित होते हैं। ये एक प्रकार से मुख्य मंदिर के पूरक भाग होते हैं। स्वतन्त्र रूप से पीढ शैली में निर्मित मंदिर का एकमात्र ज्ञात प्रतिरूप भुवनेश्वर का भास्करेश्वर मंदिर है। इस मंदिर में पीढ देउल ही मंदिर की प्रमुख अधिरचना की भूमिका निभा रहा है।

खाखरा देउल

खाखरा देउल की लम्बी ढोलाकार छत होती है। अर्थात इसका शीर्ष एक आड़े ढोल के आकार का होता है। इन्हें वल्लभ तीर्थ का कलिंग प्रारूप कहा जा सकता है क्योंकि नागर शैली के मंदिर साधारणतः हिमालयीन क्षेत्रों में दृष्टिगोचर होते हैं। मंदिरों का यह रूप सल अथवा शल तत्व से प्रेरित प्रतीत होता है जो सामान्यतः बौद्ध स्थापत्य शैली में देखा जाता है।

जागेश्वर धाम का वल्लभी मंदिर
जागेश्वर धाम का वल्लभी मंदिर

लंबा सल/शल गर्भगृह को पर्याप्त चौड़ाई प्रदान करता है जिसके कारण मंदिर की बाह्य ऊंचाई इच्छित रूप से बढ़ जाती है। खाखरा देउल के समक्ष सपाट छत का एक मंडप होता है। खाखरा देउल कलिंग शैली के सर्वाधिक विशेष स्थापत्य शैलियों में से एक है जिसे आप सम्पूर्ण ओडिशा में देख सकते हैं। ओडिशा में इस शैली में निर्मित सर्वाधिक लोकप्रिय मंदिर हैं, भुवनेश्वर में स्थित वैताल देउल तथा चौरासी में स्थित वाराही देउल।

चौरासी का वाराही मंदिर
चौरासी का वाराही मंदिर

अतः आप देख सकते हैं कि कलिंग नागर स्थापत्य शैली में भी कितनी विविधताएँ हैं। इन्हें सराहने के लिए इन सभी रूपों के विभिन्न तत्वों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना एवं उन्हें समझना अत्यंत आवश्यक है। इन शैलियों में समय के साथ आई विविधताएँ साक्षी हैं कि किस प्रकार किसी क्षेत्र में कला, संस्कृति एवं धार्मिक मान्यताओं जैसे आयामों में नित्य चिरकालीन परिवर्तन व विकास होते रहते हैं।

भुबनेश्वर स्थित वैताल मंदिर
भुबनेश्वर स्थित वैताल मंदिर

मंदिर स्थापत्य के क्षेत्र में क्षेत्र के आधार पर नित नवीन परिवर्तन भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली की ओर महत्वपूर्ण योगदानों में से एक है। आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ओडिशा के विषय में जानकारी एवं स्थान संबंधी समझ ने नागर शैली के प्रचलित वास्तुकला संबंधी शब्दावली को नवीन आयाम एवं दिशा प्रदान की है। वास्तव में यह भारत की विविधता पूर्ण वास्तुकला धरोहर में जड़ा हुआ एक अद्भुत मणी है।

अतिथि संस्करण


यह श्री सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है। श्री सुशांत भारती एक संरक्षक वास्तुविद हैं। उन्होंने नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर तथा वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुकला में क्रमशः स्नातकोत्तर एवं स्नातक की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों में उनकी विशेष रुचि है। वास्तुकला की विविधता उनके अध्ययन का मुख्य विषय है। ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिरों की वास्तुकला’ उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। वर्तमान में वे जनपथ, नई दिल्ली में स्थित, भारतीय संग्रहालय के भारतीय संग्रहालय संस्थान में अनुसंधान सहायक के पद पर कार्यरत हैं।

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अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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