पटना का बिहार संग्रहालय – अप्रतिम कलाकृतियों का संग्रह देखें

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पटना नगर के मध्य में स्थित बिहार संग्रहालय अप्रतिम कलाकृतियों का अद्भुत संग्रह है। इस संग्रहालय का सर्वाधिक विशेष तत्व इसकी रूपरेखा है। इस संग्रहालय में बिहार के इतिहास एवं धरोहर को सुंदर रीति से प्रदर्शित किया गया है जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है, विशेषतः युवा दर्शकों को।

भारत के अधिकतर संग्रहालयों के अनुरूप यह संग्रहालय भी आपके सम्पूर्ण मनोयोग एवं समय की अपेक्षा रखता है। मुझे आपको यह जानकारी देते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि इस संग्रहालय में छायाचित्रीकरण निषिद्ध नहीं है। आप स्वेच्छा से इन अप्रतिम कलाकृतियों के छायाचित्र ले सकते हैं।

पटना के बिहार संग्रहालय में प्रदर्शित कुछ अद्भुत कलाकृतियों की यहाँ संक्षिप्त व्याख्या करना चाहती हूँ। मुझे विश्वास है, इसे पढ़कर आप शीघ्र ही पटना यात्रा का नियोजन अवश्य करेंगे।

दीदारगंज यक्षी – बिहार संग्रहालय का उत्कृष्ट मणि

यह एक यक्षी का अत्यंत ही शोभायमान विग्रह है जिसके एक हाथ में चँवर है। यह बिहार की सर्वाधिक लोकप्रिय शिल्पकला है। अनेक वर्षों पूर्व यह पटना संग्रहालय का मुख्य आकर्षण थी। अब इसने बिहार संग्रहालय में अपना वही स्थान अर्जित किया है।

दीदारगंज यक्षी - बिहार संग्रहालय की शान
दीदारगंज यक्षी – बिहार संग्रहालय की शान

यक्षी की यह सुंदर प्रतिमा संग्रहालय के प्रथम तल पर उसके निर्धारित कक्ष के भीतर कुछ इस प्रकार स्थित है कि आप उसे चारों ओर से निहार सकते हैं। इस प्रतिमा में एक ओर जहाँ यक्षी के विभिन्न अंगों की रचना एवं उनके शारीरिक अनुपात सम्मोहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर शैल प्रतिमा की सतही चमक चकित कर देती है।

इतनी मनमोहक यक्षी जिस महानुभाव को यह सुंदर चँवर डुला रही है, वह स्वयं कितना मनमोहक होगा, इस प्रतिमा को देख ऐसे विचार अनायास ही मन में उभरने लगते हैं। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं। इस प्रतिमा को मुलायम चुनार बलुआ पत्थर पर जटिल व सूक्ष्म उत्कीर्णन कर रचित किया गया है। सूत्रों के अनुसार इसकी रचना मौर्य वंश के कालखंड में की गयी है।

बिहार संग्रहालय में बुद्ध प्रतिमाएं

बिहार बुद्ध की भूमि है। बुद्ध ने अपने जीवन का लगभग सम्पूर्ण काल इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। बोध गया में उन्हे परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यही कारण है कि यहाँ भिन्न भिन्न कालखंडों की अनेक बुद्ध प्रतिमाएं एवं छवियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।

भूमि स्पर्श मुद्रा में भगवान् बुद्ध
भूमि स्पर्श मुद्रा में भगवान् बुद्ध

इस संग्रहालय में बुद्ध की अनेक धातु एवं शैल प्रतिमाएं हैं जिन्हे देख आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। उन सभी प्रतिमाओं में जो मुझे सर्वाधिक प्रिय है, वह है बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में एक विशाल मूर्ति। बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा उनके द्वारा परम ज्ञान प्राप्ति के उस पावन क्षण का द्योतक है। इस प्रतिमा के पृष्ठभाग में जो चित्र है, उसके द्वारा उनके वन परिवेश को प्रदर्शित किया गया है। सम्पूर्ण दृश्य हमें सहजता से उस कालखंड में एवं उस स्थान पर स्थानांतरित कर देता है जहाँ भाग्यशाली जनमानस को बुद्ध के सत्संग का अवसर प्राप्त हुआ था।

धातु शिल्प में बुद्ध
धातु शिल्प में बुद्ध

बुद्ध की अन्य आकर्षक प्रतिमाओं में एक अन्य प्रतिमा जो ध्यानाकर्षित करती है, वह है धातु में निर्मित बुद्ध की खड़ी मुद्रा। उसे देखना ना भूलें!

और पढ़ें: बौद्ध कलाशैली में कथाकथन के रूप – शिलालेखों में बौद्ध कथाएं

कागज लुगदी की मातृका

बिहार की विविध कला शैलियों में माध्यम के रूप में कागज की लुगदी का एक विशेष स्थान है। यहाँ लोक -देवी मातृका की एक विशाल व अद्भुत प्रतिमा है जिसकी रचना में कागज की लुगदी का प्रयोग किया गया है। यह प्रतिमा आपको अवश्य अचंभित कर देगी।

इस प्रतिमा में एक दूसरे तो पीठ टिकाए दो स्त्रियाँ हैं जिन्होंने एक शिशु को अपने कटि क्षेत्र में पकड़ा हुआ है। मुझे यह जानकारी दी गयी कि ऐसी प्रतिमाएं बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में बहुधा दृष्टिगोचर होती हैं। किन्तु बिहार के जिन ग्रामीण क्षेत्रों में मैंने भ्रमण किया, वहाँ मुझे ऐसी कोई छवि दिखाई नहीं दी। आशा करती हूँ कि अन्य कई परंपराओं के अनुरूप यह परंपरा भी लुप्त ना हो जाए।

इनके अतिरिक्त संग्रहालय में अनेक ऐसे तीन-आयामी भित्तिचित्र हैं जिन्हे कागज की लुगदी द्वारा बनाया गया है।

मधुबनी की कोहबर चित्रकला शैली

मिथिला चित्रकारी शैली अथवा मधुबनी चित्रकारी शैली पर मैंने एक विस्तृत संस्करण पूर्व में प्रकाशित किया है। उस संस्करण में मैंने कोहबर चित्रकला शैली के विषय में भी वर्णन किया है। ये चित्र बहुधा विवाहोत्सव जैसे आयोजनों में चित्रित किये जाते हैं। इस शैली के विषय में अधिक जानकारी आप वहाँ से प्राप्त कर सकते हैं।

बिहार संग्रहालय में आप कोहबर शैली के कुछ भव्य चित्र देख सकते हैं जिनमें कुछ बहुरंगी हैं तथा कुछ केवल श्वेत-लाल रंग में चित्रित हैं। कोहबर चित्रों के विषय में प्रत्यक्ष रूप से जानने के लिए यह बिहार संग्रहालय सर्वोत्तम साधन है। आप देखेंगे कि कोहबर चित्रों में शुभ चिन्हों, समृद्धि चिन्हों एवं प्रजनन सूचक चिन्हों का विपुलता से प्रयोग किया जाता है।

मौर्यवंशी राजसी ठाठ का आनंद उठायें

हम जानते हैं कि पाटलीपुत्र, अर्थात पटना, विशाल मौर्य साम्राज्य की राजधानी थी। पटना के कुम्रहार में मौर्य साम्राज्य के राजमहल के प्रसिद्ध सभागृह के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उसी सभागृह का एक सुंदर प्रतिरूप बिहार संग्रहालय में पुनः निर्मित किया है।

मौर्य सिंहासन
मौर्य सिंहासन

इस सभागृह में मौर्य वंश का सिंहासन है जिसके ऊपर बैठकर आप अपना छायाचित्र ले सकते हैं। यह इस संग्रहालय भ्रमण की अविस्मरणीय स्मृति होगी।

ब्राह्मी लिपि

ब्राह्मी एक प्राचीन लिपि है। हम में से अधिकांश ब्राह्मी लिपि समझने में असमर्थ हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार ब्राह्मी लिपि में लिखित पांडुलिपियों में प्राचीन काल के अनंत तथ्य लुप्त हैं। उन्हे देखकर यह अनुमान लगता है कि हमारे पूर्वज इन अभिलेखों के माध्यम से हमारे लिए असंख्य संकेत एवं संदेश छोड़कर गए हैं।

ब्राह्मी लिपि - बिहार संग्रहालय
ब्राह्मी लिपि – बिहार संग्रहालय

एक प्रकार से ये हमारे समक्ष प्राचीन काल की अद्भुत संस्कृतियों को उजागर करते हैं। इनके द्वारा हम यह जान सकते हैं कि हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए इतनी सम्पन्न संस्कृति की रचना की थी जो अब हमारी अनभिज्ञता के चलते लुप्त होती जा रही है।

एक विशाल भित्ति पर ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्णित शिलालेख ने मुझे अत्यंत आकर्षित किया। इसके समक्ष खड़े होकर लिया गया मेरा चित्र मुझे अतिप्रिय है।

नालंदा की पुनर्रचना

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय एवं आततायीयों द्वारा उस पर किये गये अत्याचारों के विषय से हम सब अभिज्ञ हैं। यह विश्वविद्यालय अब पूर्ण रूप से खंडित अवस्था में है। नालंदा विश्वविद्यालय के स्थल पर किये गए उत्खनन में इसके अवशेष पाये गए थे। लाल रंग की ईंटों द्वारा निर्मित भित्तियों के आलों में अनेक प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। उनमें से अधिकांश प्रतिमाओं को उसी स्थान पर निर्मित भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

नालंदा का अवलोकन
नालंदा का अवलोकन

पटना के बिहार संग्रहालय में उसी प्रकार की भित्ति पर वैसे ही आलों को पुनर्निर्मित किया गया है। उन  आलों के भीतर नालंदा उत्खनन में पायी गयीं कुछ मूल प्रतिमाएं एवं कुछ की प्रतिकृतियाँ प्रदर्शित की गयी हैं। यद्यपि यह पुनर्रचना मूल नालंदा विश्वविद्यालय का कण मात्र है, तथापि उन्हे देख आप प्राचीन नालंदा के भव्य रूप का अनुमान लगा सकते हैं। यहाँ प्रदर्शित भगवान विष्णु की चमक से परिपूर्ण शैल प्रतिमा ने मेरा मन मोह लिया था।

सूर्य प्रतिमाएं

बिहार सूर्य आराधकों का क्षेत्र है। वस्तुतः, बिहार भारत का एकमात्र क्षेत्र है जहाँ छठ पूजा के रूप में सूर्य भगवान की पूजा-अर्चना अब भी अनवरत की जा रही है। बिहार के लगभग सभी क्षेत्रों में अनेक सूर्य मंदिर हैं।

सूर्य प्रतिमा
सूर्य प्रतिमा

बिहार में अनेक ऐसे गाँव हैं जहाँ से सूर्य की अनेक प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, कुछ जलाशयों से तो कुछ उत्खनन स्थलों से। पटना के बिहार संग्रहालय में आपको सूर्य भगवान के कुछ उत्कृष्ट विग्रहों के अवलोकन का अवसर प्राप्त होगा।

मुझे भगवान सूर्य को समर्पित एक विशाल शिल्प कृति का अब भी स्मरण है जिसमें अपने सात अश्वों से लैस रथ को हाँकते हुए उनका भव्य रूप दर्शाया गया है। सूर्य के विग्रह को पहचानने के लिए दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेत हैं। एक है, पुरुष की आकृति जिसके दोनों हाथों में खिले हुए कमल के पुष्प हैं। दूसरा संकेत है, बड़े जूते एवं सात अश्व।

शैल शिल्पों का अवलोकन करते हुए प्रथम तल पर स्थित मातृका की मानवाकृति शैल प्रतिमा के दर्शन अवश्य करें।

बिहार के पुरातात्विक मानचित्र को समझें

बिहार भारत के उन विरले क्षेत्रों में से एक है जहाँ प्राचीनतम संस्कृति अखंडित अनवरत वसाहत के रूप में अब भी जीवित है। यह महाभारत काल का मगध एवं अंग महाजनपद था, मौर्यवंश का पाटलीपुत्र था तथा नालंदा, उदंतपुरी तथा विक्रमशिला जैसे जगप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों की पावन भूमि थी।

बिहार का पुरातत्त्व मानचित्र
बिहार का पुरातत्त्व मानचित्र

बिहार की भूमि अपने विभिन्न परतों में अपने गौरवशाली इतिहास को सँजोये हुए है। बिहार संग्रहालय में एक मानचित्र है जो बिहार के भिन्न भिन्न पुरातात्विक स्थलों को दर्शाता है। बिहार में किस रूपरेखा के अंतर्गत उत्तम पुरातात्विक उत्खनन किये गए, उसका अद्भुत वर्णन किया गया है। सिक्के, औजार, मिट्टी के पात्रों के अवशेष जैसी कौन कौन सी पुरातत्व वस्तुओं की किन किन स्थानों से प्राप्ति हुई, उसका सुंदर चित्रण यहाँ किया गया है।

मुझे संग्रहालय के इस विभाग ने विशेष रूप से आकर्षित किया। मुझे यह विभाग अत्यंत शिक्षाप्रद एवं दृश्य रूप से अत्यंत मनमोहक प्रतीत हुआ।

चलित मधुबनी चित्रकारी

बिहार का नाम लेते ही वहाँ की लोकप्रिय मधुबनी चित्रकला शैली का स्मरण हो आता है। वस्तुतः, विश्वभर में बिहार की पहचान इन मधुबनी चित्रों से होती है।

चलित मधुबनी चित्रकारी
चलित मधुबनी चित्रकारी

बिहार संग्रहालय में मधुबनी चित्रकला शैली का एक नवीन रूप मेरे समक्ष था जिसने मुझे पुलकित कर दिया था। बिहार संग्रहालय में मधुबनी चित्रों की एक चलित दीर्घा थी। संग्रहालय में संगणक द्वारा रचित डिजिटल चित्रों के पटल थे। आप जैसे ही इनके समक्ष खड़े हो जाएँ, ये पटल गति करने लगते हैं। चित्र से संबंधित संगीत बजने लगता है। इन प्रोद्योगिकी क्रियान्वयनों से चालित चित्रपटल का आभास होता है।

जब मैं बिहार संग्रहालय के इस दीर्घा में पहुँची, उसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ एकत्र थी। मुझे संगीत सुनाई नहीं पड़ रहा था। उस आयाम को त्याग दिया जाए तब भी वह मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव था। बिहार की संस्कृति से अभिज्ञ होने का यह एक उत्तम मार्ग है।

बिहार संग्रहालय के अन्य आकर्षण

बिहार संग्रहालय में उपरोक्त  आकर्षणों के अतिरिक्त अनेक ऐसे प्रदर्शन हैं जो बिहार की संस्कृति को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं। उनमें मंजूषा से लेकर टेरकोटा उत्कीर्णन की सिक्की कला तक अनेक कला शैलियाँ सम्मिलित हैं।

बिहार का सांस्कृतिक मानचित्र
बिहार का सांस्कृतिक मानचित्र

संग्रहालय का ‘बिहार के वन्यजीव’ प्रदर्शन विभाग बिहार के वन्यजीवों को समर्पित है। किन्तु बिहार के वन्यजीवों को संग्रहालय में देखने के स्थान पर उन्हे प्रत्यक्ष देखने में मुझे अधिक आनंद आता। यदि इन वन्यजीव अभयारण्यों में भ्रमण करने के लिए अधिक सुविधाएं प्रदान कराई जाएँ तथा सुगम्य आधारभूत संरचनाएं विकसित किये जाएँ तो मुझे अधिक प्रसन्नता होगी।

संग्रहालय का नौनिहाल विभाग नन्हे दर्शकों को क्रियात्मक रूप से व्यस्त रखने में पूर्ण रूप से सक्षम है।

व्यापार तंत्र – किसी भी महान सभ्यता का आधार उसका व्यापारिक तंत्र होता है। पुरातन काल से बिहार की सभ्यता का आधार उसका व्यापार रहा है। बिहार संग्रहालय में प्राचीन काल के सिक्कों, व्यापारिक वस्तुओं तथा व्यापारियों की जीवनशैली को अप्रतिम रूप से प्रदर्शित किया गया है। इन प्रदर्शित वस्तुओं में विचित्र रूपों के भारों एवं मापों ने मुझे अत्यंत आश्चर्यचकित किया था।

बिहार संग्रहालय के दर्शन के लिए कुछ यात्रा सुझाव

बिहार संग्रहालय पटना नगर के मध्य स्थित है।

बिहार संग्रहालय के दर्शन के लिए कम से कम दो घंटों का समय आवश्यक है। मुझसे पूछें तो मुझे ऐसे संग्रहालय के अवलोकन के लिए एक सम्पूर्ण दिवस आवश्यक है।

संग्रहालय में एक जलपानगृह है। यहाँ आप बिहार के विशेष व्यंजन, लिट्टी-चोखा का आनंद ले सकते हैं।

संग्रहालय के विषय में अधिक जानकारी के लिए इनके museum map इस वेबस्थल अप संपर्क करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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