जींद रियासत की भूतपूर्व राजधानी- संगरूर के पर्यटक स्थल

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कल के बिना आज संभव नहीं। किन्तु आज केवल उनकी स्मृतियाँ ही शेष रह गई हैं। बीते हुए कल की स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क में सदा के लिए घर कर जाती हैं। छोटे-बड़े नगरों की अनेक स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में भी हैं किन्तु पंजाब के संगरूर जैसे ऐतिहासिक स्थल की कोई बराबरी नहीं।

संगरूर का संक्षिप्त इतिहास

भूतपूर्व जींद रियासत अब हरियाणा राज्य में एक जनपद है। किसी काल में संगरूर नगरी इसकी राजधानी थी। अब संगरूर पंजाब राज्य में एक जनपद है।

शाही समाधान संकुल - संगरूर
शाही समाधान संकुल – संगरूर

जींद का इतिहास हमें प्राचीन काल में ले जाता है। इसका नामकरण देवी जयंती अथवा जैन्ती देवी पर किया गया है जो विजय की देवी हैं। इसे पूर्व में जैन्तापुरी कहा जाता था। महाभारत काल में पांडवों ने जैन्ती देवी के सम्मान में यहाँ एक मंदिर का निर्माण कराया था। कौरवों के विरुद्ध अपने युद्ध में विजय प्राप्त करने की प्रार्थना लिए वे इस मंदिर में आते थे। पूर्व-महाभारत काल से १९ वी. सदी तक जींद का भूगोल अनेक परिवर्तनों का साक्षी रहा है। अंततः जींद नामक राज्य की रचना की गई जो अपभ्रंशित हो कर जिंद हो गई। उसकी राजधानी संगरूर को बनाई गई थी।

फुलकिया राज्य

जींद उन तीन फुलकिया राज्यों में दूसरा विशालतम राज्य था जिसका नाम उनके एक ही पूर्वज रहे फुल के नाम पर रखा गया था। तीन फुलकिया राज्यों में अन्य दो राज्य पटियाला एवं नाभा हैं। फुलकिया शासक भट्टी राजपूतों के वंशज है जो घोर अकाल के समय जैसलमेर राजस्थान से स्थलांतरित होकर यहाँ आए थे।

संगरूर की बारादरी की जाली
संगरूर की बारादरी की जाली

फुलकिया सिख समूह के महाराजा गजपत सिंह ने, जो सिख संधिकर्ताओं में से एक थे, सन् १७६३ में जींद राज्य की रचना की थे। सरहिन्द के अफगानी गवर्नर जैन खान को पराजित करने के पश्चात महाराजा गजपत सिंह को उनके अंश की यह भूमि प्राप्त हुई थी। भूमि के इस अंश में जींद, सफीदों, कुरुक्षेत्र के कुछ भाग, पानीपत तथा करनाल सम्मिलित हैं। सन् १७७२ में महाराज शाह आलम के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत के मालगुजारों ने गजपत सिंह को राजा की उपाधि प्रदान की थी।

कालांतर में जींद राज्य के क्षेत्र का उत्तर में सतलज नदी से और दक्षिण में रोहतक के गोहाना तक विस्तार किया गया। राजा गजपत सिंह ने सन् १७७२ से सन् १७८६ तक यहाँ राज किया। तत्पश्चात राजा भाग सिंह ने सन् १७८६ से सन् १८१९ तक तथा राजा फतेह सिंह ने सन् १८१९ से सन् १८२२ तक शासन किया। राजा फतेह सिंह के पुत्र राजा संगत सिंह ने सन् १८२२ से सन् १८३४ तक शासन किया। उन्होंने सन् १८३० में अपनी राजधानी जींद से नव-स्थापित संगरूर में स्थानांतरित की थी।

संगरूर शब्द की व्युत्पत्ति

स्थानीय अभिलेखों के अनुसार, संगरूर गाँव की स्थापना लगभग ४०० वर्षों पूर्व संगु नामक एक जाट ने की थी। सन् १७७४ तक यह नाभा रियासत का एक भाग था। जींद रियासत के महाराजा गजपत सिंह एवं नाभा रियासत के महाराजा हमीर सिंह के मध्य हुए अनबन के कारण जींद रियासत की सेना ने अमलोह, भादसों एवं संगरूर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। महाराजा हमीर सिंह को बंदी बना लिया गया। कालांतर में पटियाला के महाराजा के हस्तक्षेप के पश्चात जींद रियासत ने उन्हे मुक्त कर दिया। भादसों एवं अमलोह गाँव वापिस किए गए। किन्तु उन्होंने संगरूर अपने पास ही रखा।

जींद रियासत की राजधानी

सन् १८३० से संगरूर ही जींद रियासत की राजधानी रही है। किन्तु राज्याभिषेक का आयोजन अब भी जींद में ही किया जाता है जो उनका पैतृक पावन स्थल है।

जींद राज्य का चिन्ह
जींद राज्य का चिन्ह

राजा स्वरूप सिंह के पश्चात उनका पुत्र राजा रघुबीर सिंह उनका उत्तराधिकारी हुआ जिसने सन् १८६४ से सन् १८८७ तक गद्दी संभाली। उनके जीवनकाल में ही उनके पुत्र बलबीर सिंह का देहांत हो गया था। इस कारण उनके पोते महाराजा रणबीर सिंह ने सन् १८८७ से सन् १९४८ तक राजगद्दी का कार्यभार संभाला। उनके पश्चात महाराजा राजबीर सिंह राजा बने। उनके शासनकाल के पश्चात जींद रियासत का पेप्सु (पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ) में विलय हो गया। आगे जाकर पेप्सु का एक बार फिर भारतीय संघ के संयुक्त पंजाब में विलय हुआ। कालांतर में इनका जींद एवं संगरूर में विभाजन हो गया। जींद हरियाणा का भाग बना तथा संगरूर पंजाब का एक भाग बन गया।

महाराजा रघुबीर सिंह ने संगरूर को एक प्रगतिशील एवं विशिष्ट राज्य की राजधानी के रूप में विकसित किया। वे इतने कर्मठ एवं उत्साही थे कि एक आदर्श राजधानी का निर्माण करने के लिए सुझावों एवं विचारों को एकत्रित करने हेतु उन्होंने दूर दूर तक व्यापक भ्रमण किया। सन् १८७० में मनमोहक नगरी जयपुर की रूपरेखा का अध्ययन करने के लिए उन्होंने भेस बदल कर जयपुर का भ्रमण किया। अंततः सन् १८७५ में उन्होंने अपनी राजधानी की रूपरेखा नियोजित की तथा उसका कार्य आरंभ किया। सरदार राम सिंह जैसे उस काल के सर्वोत्तम वास्तुविदों को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। सरदार राम सिंह ने अमृतसर के अमृतसर खालसा महाविद्यालय की भी रूपरेखा बनाई थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने लंदन के बकिंघम पैलिस के एक खंड एवं अनेक ऐसी संरचनाओं की भी योजना तैयार की थी।

ख्यातिप्राप्त महापुरुष 

संगरूर के अनेक निवासियों ने भारतीय फौज की १३ वी. पंजाब बटालियन में सेवाएं दी हैं। यह बटालियन पूर्व में प्रथम जींद इन्फन्ट्री अथवा पैदल सेना थी। संगरूर नगरी अनेक महान बहादुर सेनानियों एवं कमांडरों की नगरी रही है। काहन सिंह, रतन सिंह, गुरनाम सिंह, नाथा सिंह तथा जनरल गुलाम बेग खान उनमें से कुछ वीरों के नाम हैं।

यहाँ के लोगों को लाभप्रद रोजगार में संलग्न होने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। यहाँ के लोग तलवार, बंदूक तथा कलम एक साथ रखते थे।

संगरूर के दर्शनीय धरोहर

यह नगरी एक ऐसा ऐतिहासिक केंद्र है जो ऐतिहासिक धरोहरों में रुचि रखने वाले पर्यटकों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, छायाचित्रकारों एवं ब्लॉगर्स के लिए स्वर्ग है।

संगरूर नगरी के चारों ओर चार प्रवेश द्वार थे। उनके नाम थे, पटियाला द्वार, नाभा द्वार, सुनामी द्वार तथा धुरी द्वार। ये नाम उन समीप की नगरियों के ऊपर रखे गए थे जहां इन द्वारों से जाते मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता था। दुर्भाग्य से इन चारों द्वारों में से एक भी अब अस्तित्व में नहीं है।

शाही समाधान संकुल

शाही समाधान के मंदिर से शिखर
शाही समाधान के मंदिर से शिखर

नाभा द्वार के बाहर निर्मित इस संकुल के भीतर जींद रियासत के सभी शासकों की समाधियाँ हैं। महाराजा गजपत सिंह से महाराजा रणबीर सिंह तक तथा रियासत की सभी महारानियों की यहाँ समाधियाँ हैं। इन समाधियों की विशेषता यह है कि इनके शीर्ष किसी मंदिर के शिखर के समान प्रतीत होते हैं। इन संरचनाओं की ढलुआं छत किसी तटीय प्रदेश की संरचनाओं के समान भी प्रतीत होती हैं।

दो तलवारें लिए माँ काली
दो तलवारें लिए माँ काली

बनसार बाग बारादरी तथा दरबार

महाराजाओं के समय से बनसार बाग सज्जित पुष्पों से अलंकृत एक सुंदर विश्राम बाग था। इसमें एक बारादरी अर्थात् बैठक है जो चारों ओर एक जलधारा से घिरी हुई है।

बनसार बारादरी - संगरूर
बनसार बारादरी – संगरूर

इस बाग को राजपरिवार के मनोरंजन क्रीड़ाओं के लिए बनाया गया था। इस परिसर के बागों के मध्य एक राजसी बारादरी है। यह बारदारी महाराजा रंजीत सिंह द्वारा दीनानगर में बनाए गए इसी प्रकार के एक बारादरी से प्रेरित है। महाराजा रंजीत सिंह ने दीनानगर की बारादरी जींद रियासत को भेंट स्वरूप दी थी। आपको स्मरण करा दूँ कि महाराजा रंजीत सिंह की माँ महाराजा जींद की पुत्री थी जिनका विवाह शुकरचरिया मिसल में हुआ था।

घंटाघर

संगरूर का घंटाघर
संगरूर का घंटाघर

यह विरसती घंटाघर सन् १८७० में निर्मित है।

आयुधागार इमारत

इस आयुधागार का प्रयोग जींद रियासत के गोलाबारूद एवं युद्ध के अन्य उपकरणों के भंडार के रूप में किया जाता था।

निहंग सिंह वाला गुरुद्वारा

प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रार्थना करने के लिए एक पुराने मस्जिद का प्रयोग किया गया था। सन् १९४७ के पश्चात इसे निहंग सिंह वाला गुरुद्वारा में परिवर्तित कर दिया गया।

सन् १९०५ में एक रेल स्थानक का भी निर्माण किया गया।

जींद सहकारी बैंक

जींद सहकारी बैंक
जींद सहकारी बैंक

जींद सहकारी बैंक की स्थापना सन् १९२२ में की गयी थी। सन् १९२२ में हुए इसके उद्घाटन के समय की एक प्राचीन शिलाखंड अब भी यहाँ उपस्थित है। सन् १९४७ में भारत में पंजीकृत होते समय जब जींद रियासत का पेप्सु (पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ) में विलय हुआ था तब यह इमारत स्टेट बैंक ऑफ पटियाला को भेंट स्वरूप दी गई थी। सहयोगी स्टेट बैंकों के विलय के पश्चात अब इस इमारत में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा कार्यरत है। नगर के बीचों बीच बारा चौक में स्थित यह शाखा अपनी स्थापना शताब्दी सन् २०२२ में मनाने वाली है।

पशु चिकित्सालय

पशु चिकित्सालय - संगरूर
पशु चिकित्सालय – संगरूर

पशु चिकित्सालय का निर्माण सन् १९१० में शाही परिवार के घोड़ों एवं हाथियों की चिकित्सा-सुश्रूषा के लिए किया गया था। इस संकुल का प्रयोग उन परिवारों के लिए शरणार्थी शिविर के रूप में भी किया गया था जो सन् १९४७ में पाकिस्तान से स्थानांतरित होकर यहाँ आए थे। नगर के सार्वजनिक सिवल अस्पताल में महाराजा जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक का भी एक भाग है।

गवर्नर राज उच्च विद्यालय इमारत की संरचना भी एक धरोहर है। एक काल में यह जींद रियासत का अनाथ आश्रम था।

संगरूर दुर्ग

संगरूर दुर्ग
संगरूर दुर्ग

बनसार बाग संकुल के निकट इस दुर्ग के अवशेष देखे जा सकते हैं। यहाँ के निवासियों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण महाराजा गजपत सिंह के शासनकाल में सन् १७७५ से सन् १७८६ के आसपास हुआ था।

बदरूखान दुर्ग तथा बगरियाँ हवेली   

महाराजा रंजीत सिंह के शासनकाल में जींद रियासत की बढ़ती शक्तियों का मुख्य कारण महाराजा रंजीत सिंह की माँ बीबी कौर हैं जो जींद रियासत के महाराजा गजपत सिंह की पुत्री भी हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार महाराजा रंजीत सिंह का जन्मस्थल समीप स्थित एक गाँव, बदरूखान माना जाता है। वहाँ जींद रियासत के राजपरिवार का दुर्ग है।

बागरियां हवेली
बागरियां हवेली

कथाओं के अनुसार जब बीबी कौर का जन्म हुआ था, तब बगरियाँ हवेली के भाई गुद्दार सिंह को उन्हे आशीष देने के लिए आमंत्रित किया था। किन्तु योजना उस नवजात शिशु को दफनाने की थी। तब भाई गुद्दार सिंह ने राजा से ऐसा ना करने का आग्रह किया। कालांतर में वही कन्या पंजाब के सर्वोत्तम योद्धा को जन्म जो देने वाली थी। वस्तुतः, कालांतर में बीबी कौर महाराजा रंजीत सिंह की माँ बनी।

बगरियाँ हवेली एक प्राचीन गुरुद्वारा है। किसी समय यहाँ गुरु हरगोबिन्द जी ने लंगर सेवा को आशीष दिया था। आज भी इस लंगर में गीली हरी लकड़ी पर खाना पकाया जाता है।

राज राजेश्वरी मंदिर

राज राजेश्वरी मंदिर
राज राजेश्वरी मंदिर

दुर्ग के समक्ष माता काली देवी का मंदिर है। मंदिर के भीतर माता काली देवी की प्रतिमा उसी काली शिला में बनी है जैसी कोलकाता के काली बाड़ी में है।

गुरुद्वारा ननकियाना साहिब

गुरद्वारा ननकियाना साहिब
गुरद्वारा ननकियाना साहिब

गुरुद्वारा ननकियाना साहिब में सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोबिंद जी ठहरे थे। यहाँ एक प्राचीन करेर का वृक्ष अब भी है जिस के तने से गुरु जी ने अपना अश्व बांधा था तथा उसकी छाँव में विश्राम किया था। यहाँ इस वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती है।

वड्डा घल्लुघारा

वड्डा घल्लुघारा
वड्डा घल्लुघारा

वड्डा घल्लुघारा हमें कूप रोहिरा गाँव में हुए निहत्थे सिखों के वीभत्स नरसंहार का स्मरण कराता है। यह स्मारिका संगरूर के माले कोटला तहसील के समीप स्थित है।

संगरूर धरोहर संरक्षण संस्था

इस संस्था की स्थापना २८ जनवरी २०१४ में हुई थी। इसका ध्येय था, संगरूर का संरक्षण एवं पुनर्स्थापना ताकि इस नगरी को उसकी प्राचीन महिमा एवं सुंदरता पुनः प्राप्त हो सके। यह एक गैर लाभ संस्था है। इसके कार्यक्षेत्र हैं, धरोहरों के संरक्षण, जागरूकता अभियान, कला, संगीत व काव्यशास्त्र को बढ़ावा, संगीत वाद्यों की धरोहर, युवा लेखक, हस्तकला तथा अब पर्यटक विकास एवं बढ़ावा।

इस हरित प्रदेश में शब्दों, सुरों एवं कला के विश्व को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान करने हेतु यह संस्था विरासत एवं साहित्य उत्सव का आयोजन करता है।

कैसे पहुंचे?

काली माता मंदिर की चित्रकारी
काली माता मंदिर की चित्रकारी

संगरूर चंडीगढ़, दिल्ली, भटिंडा तथा लुधियाना से सड़क मार्ग द्वारा भलीभाँति जुड़ा हुआ है। यह नगर चंडीगढ़-भटिंडा राष्ट्रीय राजमार्ग तथा दिल्ली-जालंदर राजमार्ग पर स्थित है।

रेल मार्ग द्वारा संगरूर दिल्ली एवं लुधियाना से जुड़ा हुआ है।

यह एक अतिथि यात्रा संस्मरण है। इसे नवलदीप थरेजा ने लिखा है।


नवलदीप थरेजा संगरूर में ही शिक्षित एक वस्त्र अभियंता हैं। अपने व्यवसाय के अंतर्गत उन्हे भारत के अनेक ऐसे स्थानों की यात्रा करनी पड़ती है जिनके विषय में लोग अधिक नहीं जानते। उन्हे भारत देश के विभिन्न शिल्पकलाओं एवं वास्तु रत्नों के छायाचित्र लेने में विशेष रुचि है। उनमें पूर्ववर्ती रियासतें उन्हे अत्यंत प्रिय हैं। दिसंबर २०१९ में संगरूर नगर के विरासत उत्सव में उन्होंने अपनी छायाचित्रों की प्रदर्शनी लगायी थी। इंस्टाग्राम में उनके हैन्डल ‘बहरूपिया’ को अवश्य देखें।

यह संस्करण की रचना श्री करणवीर सिंह सिबिया के मार्गदर्शन में किया गया है। श्री करणवीर सिंह सिबिया संगरूर विरासत संरक्षण संस्था (Sangrur Heritage Preservation Society) के प्रमुख संस्थापक हैं। संगरूर को भारत के धरोहरों के नक्शे पर लाना उनका प्रमुख ध्येय है। उनसे आप [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,सदियों पुरानी जींद रियासत की पूर्व राजधानी संगरूर के इतिहास को प्रतिपादित करता बहुत ही सुंदर आलेख । आलेख में जींद रियासत के इतिहास तथा यहाँ के शासकों का सिलसिलेवार वर्णन किया गया है ।वास्तव में संगरूर नगर अपनी सुंदरता और सदियों पुराने ऐतिहासिक महत्व को अपने आप में समेटे हुए हैं ।आपका कथन सही है संगरूर नगर पर्यटकों,शोधकर्ताओं,इतिहासकारों तथा छायाचित्रकारों के लिये स्वर्ग है ।भारतीय सेना में भी यहाँ के जाँबाज़ो ने अपनी सेवाएं दी हैं इससे यहाँ की महत्ता और भी बढ़ जाती हैं ।
    ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करते आलेख हेतु धन्यवाद !

    • भारत कहानियों से भरा हुआ है, एक ढूँढने निकालो, १०० मिलती हैं, जो मेरे हाथ लगी, वो साँझा कर रही हूँ।

  2. मीताजी एवं अनुराधाजी
    जींद राज्य का पुर्व महाभारत काल से १९वी शताब्दि तक के इतिहास के बारे मेँ आपका लेख बहुतअच्छा लगा.संगरुर जो अभी पंजाबमें स्थित है को विकसित करनेमे महाराजा रघुवीर सिंह का बहुत योग दान है.
    यहां की समाधियों पर मंदिरके समान शिखर है और यहां के बहुत से लोग भारतीय फौज मे है जानकर गर्व महसूस हुवा.
    महाराजा रंजीत सिंह की मा के बारे मे भी जानकर आश्चर्य हुआ. संगरुर के सनसार बाग,घंटाघर,दुर्ग के अवशेष,राजेश्वरी मंदिर और ननकिया साहब गुरुद्वरा बहोत सुंदर लगे. महत्वपुर्ण जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यावाद.

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