रुक्मिणी मंदिर – द्वारका की रानी से एक साक्षात्कार

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बालपन से ही हमने पढ़ा व सुना था कि श्री कृष्ण की पहली रानी रुक्मिणी थी। कहने का अर्थ है कि उन्होंने सर्वप्रथम रुक्मिणी से विवाह किया था। तत्पश्चात आयीं सत्यभामा, जाम्बवती तथा अन्य। यह और बात है कि कृष्ण के लोकप्रिय चित्रों व प्रतिमाओं में आप उन्हें अधिकतर राधा के साथ ही देखेंगे। यद्यपि कुछ रूपों में कृष्ण रुक्मिणी के संग भी दर्शाये जाते हैं। जैसे कृष्ण के विट्ठल रूप के संग उनकी शक्ति रुक्मिणी उनके साथ रहती है। अतः कृष्ण के साथ राधा तथा रुक्मिणी दोनों के नामों को श्रद्धा के साथ लिया जाता है। एक ओर बृज भूमि में राधा का बोलबाला है। इसे राधाक्षेत्र भी कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर द्वारका में कृष्ण के संग केवल रुक्मिणी को पूजा जाता है। राधा की भी कुछ प्रतिमाएं द्वारका में हैं किन्तु अधिकतर श्रद्धालू रुक्मिणी की ही आराधना करते हैं।

प्राचीन रुक्मिणी मंदिर - द्वारका
प्राचीन रुक्मिणी मंदिर – द्वारका

यह पहला अवसर था जब मैंने रुक्मिणी को दी जाने वाली प्राधान्यता का अनुभव किया। द्वारका में उनकी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। द्वारकावासी उन्हें प्रेम से रुक्ष्मणि पुकारते हैं। मैंने द्वारका नगरी के सीमापार स्थित उनका मंदिर भी देखा। वहां एक फलक पर रुक्ष्मणि के विवाह संबंधी सूचना लिखी हुई थी। यह सब देख कर मेरा कौतुहल चरम सीमा तक पहुँच गया था। द्वारका से लौट कर प्रथम कार्य जो मैंने किया वह था रुक्मिणी के विषय में और पढ़ना तथा जानना। विदर्भ की राजकुमारी, महालक्ष्मी का अवतार तथा श्री कृष्ण की पटरानी इन नामों के सज्जित रुक्मिणी के विषय में कितना कुछ था जो मुझे ज्ञात नहीं था।

तो आईए रुक्मिणी देवी के सुन्दर मंदिर के दर्शन करने चलते हैं।

द्वारका का रुक्मिणी मंदिर

द्वारका का रुक्मिणी मंदिर
द्वारका का रुक्मिणी मंदिर

द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर से २ की.मी. की दूरी पर रुक्मिणी का यह मंदिर स्थित है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह मंदिर द्वारका की सीमा में ना होते हुए नगर के बिलकुल बाहर बना हुआ है। हो सकता है कि प्राचीनकाल में यहाँ जंगल रहा हो। द्वारकाधीश के मुख्य मंदिर का समकालीन यह मंदिर अनुमानतः १२ वीं. शताब्दी में बनवाया गया है। वर्तमान में यहाँ केवल यह एक मंदिर है व समीप ही एक छोटा जल स्त्रोत है। मैंने इस जल स्त्रोत में कई पक्षी देखे जो इस मंदिर का साथ निभाते प्रतीत हो रहे थे।

रुक्मिणी मंदिर के शीर्ष पर एक ऊंचा शिखर है जिस पर प्राचीन नक्काशियां अब भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं। शिखर के सम्पूर्ण सतह पर कई मदनिकाएं अर्थात् रूपवती स्त्रियों की नक्काशी है। वहीं मंदिर का आधार उल्टे कमल पुष्प के आकार का है। इस पुष्प के ऊपर हाथियों की कतार है जिन के ऊपर बने आलों के भीतर विष्णु की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। आप समझ गए होंगे कि मैं अपने सम्मुख नागर पद्धति के वास्तुशिल्प का अभूतपूर्व चित्रण देख रही थी। शिखर के ऊपर फहराता चटक केसरिया ध्वज इस मंदिर की सुन्दरता को और बढ़ा रहा था।

रुक्मिणी मंदिर का प्रवेश द्वार
रुक्मिणी मंदिर का प्रवेश द्वार

समुद्र जल से होने वाले क्षरण के चिन्ह मंदिर के पत्थरों पर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

मंदिर के शिखर से विपरीत मंडप का शीर्ष गुम्बदाकार है। मेरे अनुमान से इसका कारण हो सकता है, मध्यकालीन अनुवृद्धी अथवा मुख्य मंदिर का प्रतिस्थापन। मेरे कहने का अर्थ है कि या तो यह मंडप मध्य काल में जोड़ा गया होगा अथवा मुख्य मंदिर के स्थान पर नवीन संरचना की गयी होगी।

रुक्मिणी की गाथा

रुक्मिणी मंदिर के शिखर पर शिल्पकारी
रुक्मिणी मंदिर के शिखर पर शिल्पकारी

रुक्मिणी मंदिर में प्रवेश करते से ही वहां के पंडित आप को रोक कर सर्वप्रथम रुक्मिणी की कथा सुनायेंगे। तत्पश्चात छोटे छोटे जत्थों में आपको मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश की अनुमति देंगे। मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही रुक्मिणीजी की मनमोहक छवि आपका मन मोह लेगी। मंदिर की भीतरी भित्तियों पर भी उनसे जुड़े अनेक प्रसंगों को सुन्दरता से चित्रित किया गया है। इनसे आप अनुमान लगा सकते हैं कि जनमानस में उनकी कितनी महत्ता है।

रुक्मिणी देवी मंदिर परिसर में मैंने एक और मंदिर भी देखा जो अम्बा देवी को समर्पित था। विशेष उल्लेख करना चाहूंगी, अम्बा देवी श्रीकृष्ण जी की कुलदेवी थी।

कमल पट्ट पर खड़ा रुक्मिणी मंदिर - द्वारका
कमल पट्ट पर खड़ा रुक्मिणी मंदिर – द्वारका

रुक्मिणी मंदिर के बाहर एक इकलौता मंडप था जिसका उद्देश्य मैं समझ नहीं पायी। मंदिर के बाहर साधुओं का एक झुण्ड बैठा हुआ था जिनके पास रुक्मिणी का चित्र भी था।

रुक्मिणी मंदिर के बाहर साधुओं का जमघट
रुक्मिणी मंदिर के बाहर साधुओं का जमघट

रुक्मिणी का मंदिर, द्वारका के मुख्य मंदिरों से भले ही छोटा हो किन्तु रुक्मिणी देवी के समान उनका मंदिर भी अपने आप में अनोखा है। अप्रतिम मंदिरों से भरी द्वारका नगरी के बाहर स्थित इस मंदिर की अपनी ही एक विशिष्टता है।

आखिर रुक्मिणी मंदिर द्वारका नगरी के बाहर क्यों बनाया गया?

गोपी तलाव के पास रुक्मिणी मंदिर
गोपी तलाव के पास रुक्मिणी मंदिर

इसके पीछे भी एक मनोरंजक कथा है। कहा जाता है कि यादवों के कुलगुरु, ऋषी दुर्वासा का आश्रम द्वारका से कुछ दूरी पर, पिंडारा नामक स्थान में था। एक बार श्रीकृष्ण व रुक्मिणी के मन में उनका अतिथी सत्कार करने की इच्छा उत्पन्न हुई। वे दोनों अपने रथ में सवार होकर ऋषी को निमंत्रण देने उनके आश्रम पहुंचे। ऋषि दुर्वासा का चिड़चिड़ा स्वभाव तथा त्वरित क्रोध किसी के छुपा नहीं है। दुर्वासा ऋषि ने कृष्ण रुक्मिणी का आमंत्रण स्वीकार तो किया किन्तु एक शर्त भी रख दी। शर्त थी कि उन्हें ले जाने वाले रथ को न तो घोड़े हांकेंगे ना ही कोई अन्य जानवर। बल्कि रथ को केवल कृष्ण व रुक्मिणी हांकेंगे। कृष्ण व रुक्मिणी ने उनकी मांग सहर्ष स्वीकार कर ली।

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चूंकि रुक्मिणी एक रानी थी, इन्हें रथ हांकने का कोई अनुभव नहीं था। कुछ समय पश्चात वे थक गयीं व प्यास से उनका कंठ सूखने लगा। उन्होंने कातर दृष्टी से कृष्ण की ओर देखा। स्थिति को भांप कर कृष्ण ने शीघ्र अपने दाहिने चरण का अंगूठा धरती पर दबाया। और वहीं गंगा नदी प्रकट हो गयीं। यहाँ रुक्मिणी से एक बड़ी भूल हो गयी। तृष्णा से वशीभूत रुक्मिणी दुर्वासा मुनि से जल ग्रहण का आग्रह करना भूल गयी तथा उनसे पूर्व, स्वयं ही जल ग्रहण कर लिया। यह देख दुर्वासा मुनि कुपित हो गए। उन्होंने तुरंत ही कृष्ण व रुक्मिणी को विछोह का श्राप दे डाला। यही कारण है कि रुक्मिणी का मंदिर कृष्ण मंदिर से दूर बनाया गया है। मानो वे अब भी दुर्वास मुनि के श्राप को जी रहे हों।

रुक्मिणी विवाह का निमंत्रण पत्र
रुक्मिणी विवाह का निमंत्रण पत्र

लोगों का कहना है कि कृष्ण व रुक्मिणी को श्राप देकर भी दुर्वासा मुनि का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने द्वारका नगरी को भी बंजर हो जाने का श्राप दे दिया। उनके श्राप का प्रभाव आज भी यहाँ देखा जा सकता है। द्वारका के आसपास की धरती सूखी व बंजर है जिस पर कुछ उगता नहीं । यहाँ के लोग नमक बना कर अपना जीवन यापन करते हैं।

यह कथा है रुक्मिणी मंदिर के नगर बाहर स्थापना करने का कारण!

जैसा कि मैंने आपको मेरे बेट द्वारका के संस्मरण में बताया था, द्वारकाधीश मंदिर में भी रुक्मिणी, स्व:रूप में ना होकर, महालक्ष्मी रूप में विराजती हैं।

रुक्मिणी का पृथक् सा एक छोटा मंदिर गोपी तलाव में भी है।

रुक्मिणी देवी से जुड़ी कुछ और कथाएं

रुक्मिणी देवी से जुड़ी कुछ ३-४ कथाएं प्रसिद्ध हैं जो अधिकतर श्रीमद भागवत से आयी हैं।

कृष्ण – रुक्मिणी विवाह

कृष्ण रुक्मिणी विवाह
कृष्ण रुक्मिणी विवाह

रुक्मिणी विदर्भ की राजकुमारी थी। विदर्भ अर्थात् वर्तमान में नागपुर के आसपास का क्षेत्र। इसी कारण उन्हें वैदर्भी भी पुकारा जाता है। रुक्मिणी विदर्भ-राज भीष्मक की सुपुत्री थी। उनका विवाह चेदि राजा शिशुपाल के संग तय किया गया था। रुक्मिणी को यह विवाह स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने नारद मुनि तथा कई अन्य महानुभावों से श्री कृष्ण के इतने गुणगान सुने थे कि उन्होंने कृष्ण संग विवाह का मन बना लिया था। भागवत पुराण के अनुसार, गुणों के आधार पर रुक्मिणी केवल कृष्ण को ही स्वयं हेतु योग्य वर मानती थी।

कहा जाता है कि भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार रुक्मिणी अब तक की सर्वाधिक सुन्दर स्त्री है। क्यों ना हो! वे महालक्ष्मी की अवतार जो हैं। लक्ष्मी के रूप में वे नारायण की शक्ति हैं तथा रुक्मिणी रूप में कृष्ण की।

रुक्मिणी पत्र

रुक्मिणी पत्र
रुक्मिणी पत्र

श्रीकृष्ण की ख्याति से प्रभावित होकर रुक्मिणी ने उन्हें अपना वर मान लिया था। शिशुपाल संग विवाह निश्चित किये जाने पर उन्होंने कृष्ण को एक प्रेम पत्र लिखा था जो कुल सात श्लोकों में सीमित था। पत्र में उन्होंने कृष्ण के समक्ष स्वयं का अपहरण कर ले जाने का आग्रह किया। विवाह पूर्व मंदिर दर्शन हेतु जाते समय अपहरण करने की भी सलाह दी। यह पत्र उन्होंने एक पत्रवाहक द्वारा भिजवाया था। कुछ का मानना है कि पत्रवाहक एक ब्राम्हण था तो कुछ के अनुसार रुक्मिणी ने यह पत्र हनुमान के हाथों भिजवाया था। कुछ लोग कहते हैं कि पत्रवाहक गरुड़ थे।

इस पत्र की छपी प्रति द्वारका के रुक्मिणी मंदिर में उपलब्ध है। मैंने इस पत्र का हिंदी संस्करण उठाया। श्वेत पन्ने पर लाल अक्षरों में लिखे इस पत्र में मूल ७ श्लोक तथा हिंदी में उनके अर्थ अंकित हैं। वैसे तो प्रकाण्ड पंडित घंटों इसकी व्याख्या कर सकते हैं। फिर भी इस पत्र में विस्तार पूर्वक की गयी अर्थ-विवेचना पर्याप्त है।

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पत्र का आरम्भ रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण गुणगान से किया है। तत्पश्चात प्रेम प्रकट कर उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की है। शिशुपाल संग उनके विवाह समारोह के मध्य अपहरण की योजना उन तक पहुंचाई। साथ ही भावी युद्ध तथा रक्तपात की आशंका भी जताई। जन्म जन्मान्तर तक उनकी प्रतीक्षा करते रहने के प्रण की जानकारी देते हुए उलाहना भी दी।

रुक्मिणी पत्र पठन

द्वारकाधीश मंदिर में प्रत्येक रात्री, कृष्ण की निद्रा पूर्व, इस पत्र का पठन किया जाता है। कहा जाता है कि इच्छित प्रेमी के संग विवाह की आस रखती प्रत्येक स्त्री को इसका पठन करना चाहिए।

कृष्ण-रुक्मिणी विवाह की कथा पर लौटते हुए आगे की घटना की चर्चा करते हैं। पूर्वयोजना अनुसार श्री कृष्ण रुक्मिणी के अपहरण में सफल हो गए। तत्पश्चात चैत्र मास की एकादशी को पोरबंदर के निकट स्थित माधवपुर खेड नामक एक गाँव में वे दोनों विवाह बंधन में बंध गए। द्वारका पहुंचकर कृष्ण व रुक्मिणी ने एक बार फिर अपना विवाह रचाया।

आज भी द्वारका में कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष इस दिन द्वारकाधीश मंदिर से कृष्ण की बारात निकलती है तथा रुक्मिणी मंदिर पहुंचती है जहां उनका विवाह-संस्कार किया जाता है। द्वारका सहित बेट द्वारका तथा माधवपुर खेड में भी यह प्रथा अनवरत चली आ रही है।

रुक्मिणी को ९ पुत्ररत्नों तथा एक सुपुत्री के मातृत्वसुख की प्राप्ति हुई। कालान्तर में उनका पुत्र प्रद्युमन श्री कृष्ण का उत्तराधिकारी बना।

तुलाभार

रुक्मिणी - महालक्ष्मी के स्वरुप में
रुक्मिणी – महालक्ष्मी के स्वरुप में

इस कथा के अनुसार एक बार नारद मुनि ने श्रीकृष्ण की तृतीय पत्नी सत्यभामा के मन में यह कहकर शंका उत्पन्न की, कि कृष्ण का रुझान रुक्मिणी की ओर अधिक है। कृष्ण के प्रति प्रेम सिद्ध करने हेतु उनके भार के बराबर संपत्ति दान देने के लिए कहा। चुनौती स्वीकार करते हुए सत्यभामा ने तुला के एक पलड़े पर कृष्ण को बैठने का आग्रह किया। किन्तु तुला के दूसरे पलड़े पर अपनी सम्पूर्ण संपत्ति रखने के पश्चात भी कृष्ण के भार को पार नहीं कर पायी। पराजय के भय से सत्यभामा ने कृष्ण की अन्य पत्नियों से मदद माँगी। उनकी सम्पूर्ण संपत्ति भी सत्यभामा की सहायता करने में असफल रही। अंततः हारकर सत्यभामा ने रुक्मिणी से सहायता करने का आग्रह किया।

कृष्ण के प्रति निश्छल प्रेम तथा अगाध भक्ति ह्रदय में लिए रुक्मिणी ने केवल एक तुलसी के पत्ते को तुला के दूसरे पलड़े पर रखा। और तुलाभार दूसरी ओर झुक गया! अतः कृष्ण को केवल भक्ती एवं समर्पण से पाया जा सकता है, ना कि धन संपत्ति द्वारा।

यह विरोधाभास ही है कि तुलाभार की प्रथा आज भी द्वारका में प्रचलित है। गोमती नदी के किनारे रखे एक तुलाभार पर भक्तगण अपने भार के बराबर ७ प्रकार के विभिन्न धान्य दीन-दुखियों को दान करते हैं। द्वारका यात्रा के समय इस प्रकार दान करना कथित रूप से मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

पंढरपुर में रुक्मिणी

सुदामा को पंखा करती रुक्मिणी
सुदामा को पंखा करती रुक्मिणी

Talking Myths’ इस वेब पोर्टल के अनुसार रुक्मिणी को महाराष्ट्र के पंढरपुर तक लाने के पीछे भी एक मनोरंजक कथा है। कृष्ण की मुख्य रानी होने के कारण सर्व गोपियों तथा अन्य रानियों को रुक्मिणी का सम्मानपूर्वक अभिवादन करना आवश्यक था। एक बार जब वह कृष्ण के संग थी, राधा ने उठकर उनका अभिवादन नहीं किया। इससे क्रोधित होकर रुक्मिणी ने द्वारका छोड़ दी तथा रूठकर डिंडीर्वन आ गयी। डिंडीर्वन वर्तमान में पंढरपुर के नाम से जाना जाता है।

कहा जाता है कि कृष्ण, उनकी गउएँ, गंगा तथा गोवर्धन पर्वत भी रूठी रुक्मिणी को मनाने उनके पीछे पीछे चल दिए। अंततः कृष्ण उनको मनाने में सफल हो गए। तब दोनों ने मिलकर दही तथा मक्के से दहीकाला नामक पदार्थ बनाकर सब उपस्थित शुभचिंतकों को प्रीतिभोज कराया। इसी प्रथा को जीवंत रखते हुए आज भी वार्षिक पंढरपुर यात्रा के समय भक्तों को दहीकाला परोसा जाता है।

द्वारका में हुई कृष्ण-सुदामा की विशिष्ठ भेंट की गाथा कहते हुए भी रुक्मिणी का स्मरण किया जाता है। कृष्ण ने उनसे सुदामा को पंखा झलने का आग्रह किया था। उनके आतिथ्य-सत्कार के सर्व प्रबंध का उत्तरदायित्व भी कृष्ण ने रुक्मिणी को दिया था। यह और बात है कि रुक्मिणी द्वारा पंखा झलवाने के लिए आखिर सुदामा ने क्या किया, यह कईयों को असमंजस में डाल देता है।

रुक्मिणी से सम्बंधित और भी कई कथाएं होंगीं जिन्हें आप इस सूची में सम्मिलित करना चाहेंगे। मुझे आपके योगदान की प्रतीक्षा रहेगी।

द्वारका पर एक वीडिओ

अपनी द्वारका यात्रा के समय मेरे द्वारा लिए गए इस विडियो पर अवश्य दृष्टी डालिए।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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