राम राज्य क्या है? जानिए गोस्वामी तुलसीदास जी से

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राम राज्य! यह शब्द हम सबने अनेक बार सुना है। किन्तु राम राज्य का अर्थ क्या है, यह जानने का प्रयत्न कदाचित हम में से किसी ने नहीं किया होगा।

राम राज्य मैंने ६ मास व्यतीत कर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस पढ़ा था। इस मूल रचना को पढ़ने के पश्चात मैंने अनेक तथ्यों के विषय में जाना। लाख व्याख्याएँ, समीक्षाएं तथा वाग्विस्तार कार्य भी मुझे वो संतुष्टि नहीं दे पाते जो मुझे कुछ समय व्यतीत कर इस मूल रचना को पढ़ने में प्राप्त हुआ है।

मेरा ये संस्करण पढ़ें: रामचरितमानस की मूल रचना पढ़ने के पक्ष में ५ तर्क

रामचरितमानस पढ़ते समय राम राज्य की व्याख्या ने मुझे सर्वाधिक मंत्रमुग्ध किया था। जब भी नेतागण सुशासन का दृष्टांत देते हैं तो वे बहुधा राम राज्य का उल्लेख करते हैं। मेरे अनुमान से मैं निस्संकोच यह अनुमान लगा सकती हूँ कि हम में से अधिकतर पाठकों ने राम राज्य के विषय में क्वचित ही पढ़ा होगा।

राम राज्य क्या है?

महाकाव्य रामायण के अनुसार, श्री राम जब लंका में रावण का वध कर अयोध्या लौटते हैं तब वे राम राज्य की स्थापना करते हैं। अयोध्या के राजा श्री राम ऐसे राज्य की रचना करते हैं जहां सम्पूर्ण प्रजा आनंदित एवं सुखी है। आज के समय में हमें राम राज्य की व्याख्या अत्यंत काल्पनिक प्रतीत होती है। यह कल्पना सहस्त्रो वर्षों पश्चात भी जीवित है, इसका यही अर्थ हो सकता है कि किसी समय ऐसा राम राज्य अस्तित्व में था, भले ही वह चिरकाल तक ना रहा हो।

राम राज्य की व्याख्या रामचरितमानस के उत्तर कांड अर्थात ७ वें. कांड में की गई है। श्री राम ने रावण वध एवं लंका विजय के पश्चात अपने साथ आए लंका, किष्किन्धा एवं प्रयाग के मित्रों को उनके संबंधित स्थलों में वापिस भेज दिया था। इस घटना के पश्चात उत्तर कांड है। दोहों एवं चौपाईयों के प्रयोग द्वारा इस कांड में राम राज्य के विभिन्न आयामों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। यह वर्णन इतना मनमोहक है कि उसने मुझे यह संस्करण लिखने के लिए तीव्रता से प्रेरित किया।

आशा करती हूँ कि २१ वीं. सदी के मेरे पाठक इस लेख को पढ़ेंगे तथा इससे प्रेरित होकर अपने स्वयं के राम राज्य की रचना करेंगे।

राम राज्य के अवयव

इस दोहे में तुलसीदासजी राम राज्य का सार प्रस्तुत कर रहे हैं:

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग   
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहि भय सोक न रोग

जब प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण एवं आश्रम के धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करता है अथवा जब प्रत्येक व्यक्ति जीवन के विभिन्न चरणों के अनुसार अपने निहित कार्य उसी प्रकार करता है जैसा कि वेदों में परिभाषित है, जब कहीं भी किसी भी प्रकार का भय ना हो, दुख ना हो तथा रोग ना हो – वही राम राज्य है।

कितनी सुंदरता से राम राज्य के सर्वोत्तम जीवन का सार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इसे पढ़कर इस कल्पना को सजीव करना कितना आसान प्रतीत होता है। जो कार्य आपके लिए निहित है उसे अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार प्रामाणिकता से करें। कल्पना कीजिए, जब हम सब वे सभी कार्य सम्पूर्ण श्रद्धा से करें जो हमारे लिए निहित है तो विश्व की ९९% समस्याएं चुटकी में हल हो जाएंगी।

इस दोहे के पश्चात तुलसीदासजी हमें राम राज्य के विषय में विस्तार से बताते हैं।

प्रजा एवं उनका आचरण

तुलसीदासजी कहते हैं कि राम राज्य में किसी को भी शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर किसी भी प्रकार की पीड़ा नहीं होती।

शास्त्रों में उल्लेख किये गए कर्तव्यों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति दूसरों के साथ सामंजस्य एवं प्रेम का भाव रखता है। आज के परिवेश में हम इसे कानून का अनुसरण करते हुए नैतिकता से जीवनयापन करना कह सकते हैं।

धर्म के चारों अंग – सत्य, पवित्रता, करूणा एवं दान की पूर्ति हो तथा कोई भी व्यक्ति स्वप्न में भी पाप ना करे। सब राम की भक्ति करें तथा जन्म मृत्यु के चक्र से मोक्ष अधिकार प्राप्त करें। संभव है, यहाँ राम का संबंध अयोध्या के राजा से ना हो अपितु वे कबीर द्वारा कहे गए निर्गुण राम हों।

किसी की भी अकाल मृत्य ना हो। प्रत्येक मनुष्य की रोगमुक्त सुंदर देह हो। कोई भी दरिद्र, दुखी अथवा दयनीय ना हो। कोई भी शुभ-लक्षण-विहीन मूर्ख ना हो।

कोई भी तुच्छ ना हो। प्रत्येक मानव धार्मिक हो तथा अपना धर्म निभाने में व्यस्त हो। सभी स्त्री एवं पुरुष बुद्धिमान एवं प्रतिभाशाली हों। सभी सुशिक्षित एवं ज्ञानी हों तथा दूसरों के ज्ञान का सम्मान करें। प्रत्येक मनुष्य कृतज्ञ हो तथा किसी भी प्रकार के छल कपट में लिप्त ना हो।

प्रत्येक व्यक्ति दानी, दयालु एवं सहायक हो तथा ज्ञानी का सम्मान करे। पुरुष केवल एक स्त्री से विवाह करे तथा स्त्री अपने तन, मन एवं आत्मा से अपने पति की ओर पूर्णतः समर्पित हो।

परिवर्तित अर्थ

राम राज्य में दंड केवल योगीयों के हाथों में विराजमान रहता है जिस पर तपस्यारत योगी अपने हाथ टिकाते हैं। जाति भेद, यह शब्द केवल नर्तकों के शब्दकोश में पाया जाता है जिसका प्रयोग वे विभिन्न ताल, लय, स्वरों इत्यादि में भेद करने हेतु करते हैं। जीत, यह शब्द मन जीतने के लिए प्रयोग किया जाता है क्योंकि राम राज्य में जीतने के लिए कोई शत्रु शेष नहीं होता है।

अयोध्या का पर्यावरण

सभी वन पुष्प एवं फलों से लदे हैं। वन में सिंह एवं हाथी एक साथ रहते हैं। पशु-पक्षी आपसी शत्रुता से अनभिज्ञ, आपस में सद्भाव एवं स्नेह से रहते हैं।

पक्षी चहचहाते हैं तथा विभिन्न पशु निर्भय होकर प्रसन्नता से जीते हैं। चारों ओर कोमल, शीतल एवं सुगंधित वायु बहती है तथा पुष्प से मधु एकत्र करते भौंरों की गुंजन सुनाई देती है।

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लताएं एवं वृक्ष मधु प्रदान करते हैं तथा गौएं मांगते ही दूध दे देती हैं। खेत खलिहान सदैव धान्य से भरे होते हैं। त्रेता युग में भी सतयुग प्रतीत होता है। यद्यपि सतयुग राम के त्रेता युग से पूर्व था। सतयुग में सब सर्वोत्तम था। पर्वत एवं पहाड़ अनमोल मणियों की खान हैं। सभी नदियां शीतल, स्वच्छ एवं मीठे जल से परिपूर्ण हैं जो आनंद का स्त्रोत हैं।

समुद्र अपनी सीमा में रहते हैं तथा मनुष्यों के लिए अपनी गोद से अनमोल रत्न तटों पर लाकर छोड़ देते हैं। सभी तालाब एवं पोखर कमल पुष्प से भरे हुए हैं जो दसों दिशाओं में हर्ष प्रसारित कर रहे हैं। चंद्रमा अपनी शीतल किरणें पृथ्वी पर बिखेरता है, सूर्य आवश्यकतानुसार चमकता है तथा मेघ जितना आवश्यक हो उतनी ही वर्षा करते हैं।

राजपरिवार का व्यवहार

श्री राम स्वयं दस लाख यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा ब्राह्मणों को दान देते हैं। कुशल सेविकाओं के साथ होते हुए भी देवी सीता अपने गृह की देखभाल स्वयं करती है, जिसमें सासु-माँओं की सेवा भी सम्मिलित है। सभी भ्राता किसी भी आवश्यकता के लिए सदैव चौकस रहते हैं। श्री राम उन्हे राजकौशल के विभिन्न कूटनीतियों की शिक्षा देते हैं।

अयोध्या का वैभव

अयोध्या की प्रजा संतुष्ट एवं प्रसन्न है। सभी हवेलियों की भित्तियाँ अनमोल रत्नों से जड़ी हुई हैं। नगर की भित्तियों पर रंगबिरंगे कंगूरे बने हुए हैं। वैभवशाली अयोध्या सीधे इन्द्र की अमरावती से स्पर्धा करती प्रतीत होती है। भवनों के शीर्ष पर स्थित चमचमाते कलश दमकते सूर्य एवं चमकीले चंद्रमा से प्रतिस्पर्धा करते हैं। हवेलियों के झरोखे प्रज्जवलित दीपों से प्रकाशमान हो रहे हैं जिन पर अनमोल मणियाँ जड़ी हुई हैं। मूँगे की किनारियाँ, मणियों की भित्तियाँ तथा पन्ने से जड़ी सुनहरी भित्तियाँ हैं। गलियारे स्फटिक द्वारा निर्मित हैं।

प्रत्येक गृह की भित्तियों पर चित्रशाला हैं जिन पर राम का चरित्र दर्शाया गया है। वे इतने मनमोहक हैं कि सन्यासियों का भी मन मोह लेते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का उद्यान पुष्प से तथा सतत फलते-फूलते वृक्षों से भरा हुआ है मानो सदैव वसंत ऋतु हो। कोमल बयार के मध्य भँवरों की गुंजन चारों ओर गूँजती है। नन्हे बालक बलिकाएं भी पक्षियों के संग दौड़ते हुए क्रीडा करते हैं।

मोर, हंस, सारस, कबूतर इत्यादि भवनों के ऊपर बैठते हैं तथा अपनी ही परछाई देखते हुए नृत्य करते हैं।

नन्हे बालक-बालिका तोते एवं मैनाओं से बतियाते हैं तथा श्री राम के विषय में चर्चा करते हैं। नगर में आकर्षक प्रवेश द्वार, पथ, चौराहे तथा हाट बाजार हैं। बाजार बिना मूल्य की अनेक वस्तुओं से भरी हुई हैं। वस्त्र व्यापारी, सुनार तथा  बाजार में  व्यापारी धन के देवता कुबेर के समान बैठे हैं।

सरयू तथा उसके तट

उत्तर में अथाह सरयू नदी बहती है जिसका जल अत्यंत निर्मल है। सरयू के किनारे स्वच्छ तट हैं जिस पर अंश मात्र भी कीचड़ एवं गंदगी नहीं है। कुछ दूरी पर घोड़े तथा हाथी नदी का शीतल जल पीने आते हैं।

सरयू के किनारे अनेक मंदिर हैं तथा उनके चारों ओर बाग-बगीचे हैं। कुछ सन्यासी नदी के तट के समीप निवास करते हैं जिन्होंने नदी के किनारे तुलसी के अनेक पौधे उगाए हैं।

अयोध्या नगरी वनों, बगीचों, बावड़ियों तथा तालाबों से सुशोभित है तथा दूर से भी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है। कुंड के भीतर जल तक पहुँचने के लिए आकर्षक उत्कीर्णित सीढ़ियाँ हैं। कुंडों एवं तालाबों के जलसतह कमल पुष्प की चादर से ढंके हुए हैं। पक्षी अपनी मधुर चहचहाहट से हमें आमंत्रित करते प्रतीत होते हैं।

राम राज्य – निष्कर्ष

राम राज्य क्या है राम राज्य एक ऐसे क्षेत्र की सम्पूर्ण परिभाषा है जहां सर्व क्रियाकलाप एक दूसरे के सामंजस्य से परिपूर्ण होते हैं। जिस प्रकार राम राज्य को परिभाषित किया गया है उसका अनुभव हमें रोमांचित कर देता है। सर्वप्रथम मानवी आचरण सर्वोत्तम होना चाहिए, तत्पश्चात पर्यावरण तथा उसके पश्चात किसी राज्य अथवा नगर का वैभव।

इसके विषय में आपके विचार क्या हैं, इसे जानने के लिए उत्सुक हूँ। कृपया निम्न टिप्पणी खंड मे अपने विचार हमसे अवश्य साझा करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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