गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य

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मेरा ध्येय है कि मैं सदा मूल भारतीय ग्रंथों का ही पठन करूँ। इसी कड़ी में मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। हम सब जानते हैं कि भारत के दो प्रमुख महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत पर असंख्य व्याख्याएं, टिप्पणियाँ तथा व्युत्पन्न रचनाएँ प्रकाशित की गयी हैं। इसी कारण मैंने सर्वप्रथम कालिदास की रघुवंशम् से मेरा पठन आरम्भ किया। इसके पश्चात मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। इसका मुख्य कारण था कि भले ही यह अत्यंत विस्तृत ग्रन्थ है, मैंने अनुमान लगाया कि इसका पठन अपेक्षाकृत सरल होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य
गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा का प्रयोग किया है। अवधी भाषा से स्वयं को अभ्यस्त करने में मुझे कुछ समय लगा। ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन के आरंभिक चरण में मेरी पठन की गति अत्यंत धीमी थी। जैसे आरम्भ में मैं एक दिवस में केवल एक अथवा दो पृष्ठ ही पठन कर पाती थी। किन्तु मैंने रामचरितमानस पठन में विराम लगने नहीं दिया। शनैः शनैः मैं अवधी भाषा से अभ्यस्त होने लगी तथा मेरी पठन गति में भी वृद्धि होने लगी। कुछ दिवसों पश्चात् मैं औसतन १० पृष्ठ प्रतिदिन पठन करने लगी थी। एक यात्रा संस्करण लेखिका होने के कारण यात्राओं एवं संस्करण लेखन के लिए भी मुझे समय निर्दिष्ट करना पड़ता है। अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी योगदान देने का मेरा सतत प्रयास रहता है। अतः, प्रायः अपनी सभी गतिविधियों को यथावत रखते हुए मुझे ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन में लगभग ६ मास का समय लगा।

मूल रामचरितमानस ग्रन्थ के पठन के पश्चात मैंने जो अनुभव प्राप्त किया, वह आपसे साझा कर रही हूँ।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित मूल रामचरितमानस पठन

यदि मेरे लिए संभव है तो आपके लिए भी संभव है।

मेरे पास गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस ग्रन्थ है जिसमें ११०० पृष्ठ हैं। इसमें अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है। साथ ही कुछ स्थानों पर संस्कृत भाषा में श्लोक इत्यादि हैं। उन सभी का क्रमशः हिन्दी में अनुवाद किया गया है। आरम्भ में मुझे यह एक कठिन कार्य प्रतीत हुआ।

ग्रन्थ आरम्भ करने से पूर्व मैंने इसे पूर्ण करने के लिए ३ वर्षों से अधिक समय का अनुमान लगाया था। किन्तु जैसे ही अवधी भाषा में मेरी प्रवीणता में वृद्धि होने लगी, उसका पठन शनैः शनैः सरल प्रतीत होने लगा। पठन गति में वृद्धि होने लगी। मैं प्रतिदिन प्रातः शीघ्र उठती, स्नानादि के पश्चात पृष्ठों की नियत संख्या का पठन करती, उसके पश्चात ही अपने दैनिक व्यवसायिक कार्यों का आरम्भ करती थी।

जो पाठक हिन्दी भाषा में धाराप्रवाह पठन करते हैं, उन्हें अवधी कदापि कठिन प्रतीत नहीं होगी। अवधी भाषा में कुछ शब्दों के अर्थ समझ में आ जाएँ तथा उनके समान्तर शब्दों का प्रयोग भी जान जाएँ तो आपको पुनः पुनः शब्दकोष के पृष्ठ पलटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अपने अनेक व्यवसायिक क्रियाकलापों के साथ यदि मैं इसका पठन कर सकती हूँ तो आप भी कर सकते हैं। यदि आपकी इच्छाशक्ति दृढ़ है तो आप इसके लिए समय अवश्य निकाल सकते हैं।

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यह केवल श्रीराम की एक कथा नहीं है

यद्यपि रामचरितमानस में श्री राम की कथा का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है, तथापि यह ग्रन्थ कथा के विभिन्न आयामों को विस्तार से दर्शाता है। भगवान राम के जन्म से पूर्व भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह का विस्तृत वर्णन किया गया है। ऐसी अनेक घटनाओं  का उल्लेख है जिनका श्रीराम की कथा से सीधा सम्बन्ध नहीं है। जैसे भगवान विष्णु द्वारा अयोध्या में भगवान राम के रूप में जन्म लेने की पृष्ठभूमि में स्थित विभिन्न कारण।

राम-जानकी विवाह की कथा में राम एवं लक्ष्मण के संबंधों पर प्रमुखता से ध्यान केन्द्रित किया गया है। राम-भरत मिलाप की कथा भरत के चरित्र को उजागर करती है तथा उसी पर ध्यान केन्द्रित करती है। सुन्दर काण्ड में गोस्वामीजी ने हनुमान जी एवं भगवान राम के प्रति उनके प्रेम से हमें अवगत कराया है। लंका नरेश रावण की स्वर्ण नगरी की भव्यता का विस्तृत रूप से उल्लेख किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के विभिन्न पात्रों के चरित्र को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया है कि हम सहज रूप से उनके संबंध हमारे आसपास के व्यक्तिमत्वों से जोड़ने लगते हैं।

जब भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त कर सीता माता के साथ अयोध्या वापिस आते हैं तथा राम राज्य की स्थापना करते हैं, वहीं रामचरितमानस की कथा समाप्त होती है। मेरे लिए सम्पूर्ण रामचरितमानस का सर्वाधिक मनमोहक भाग है, राम राज्य का उल्लेख। यह उस आदर्श राज्य की कल्पना है जब सृष्टि के प्रत्येक तत्व का अन्य तत्वों से पूर्ण सामंजस्य होता है। अपने सुन्दर दोहों व छंदों द्वारा उन्होंने राम राज्य की अप्रतिम संकल्पना दी जिसके अनुसार – यदि प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म एवं वर्ण के अनुसार कृति करे तब यह सम्पूर्ण विश्व भय, रोगों एवं दुखों से मुक्त हो जाएगा। मेरे अनुमान से राम राज्य की संकल्पना पर एक स्वतन्त्र एवं विस्तृत संस्करण लिखा जाना चाहिए।

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रामचरितमानस में मिथकों का खंडन

हमने अनेक सूत्रों द्वारा रामायण की कथाओं को सुना तथा देखा है। जिसे रामायण के पात्रों का जैसा चरित्र उचित जान पडा, उसने उसका वैसा वर्णन किया है। इसके कारण पाठकों एवं दर्शकों के मन-मस्तिष्क में अनेक मिथकों ने जन्म लिया है। मैं भी उनसे अछूती नहीं थी। किन्तु जब मैंने रामचरितमानस का मूल ग्रन्थ पढ़ा, मेरे मस्तिष्क में घर कर बैठे अनेक मिथकों का खंडन हो गया। जैसे रामचरितमानस के अरण्य काण्ड में, जहां से सीता माता का अपहरण किया गया था, वहाँ लक्ष्मण रेखा का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। लक्ष्मण केवल आसपास के वृक्षों से निवेदन करते हैं कि वे उनकी अनुपस्थिति में सीता माता का ध्यान रखें।

लक्षमण रेखा के विषय में लंका काण्ड में मंदोदरी ने केवल सरसरी रूप से उल्लेख किया है जब वे रावण को उलाहना देते हुए कहती हैं कि आपने लक्षमण द्वारा खींची गयी रेखा का उल्लंघन किया है तो अब राम का सामना कैसे करोगे? लक्ष्मण रेखा शत्रुओं अथवा अवांछित तत्वों द्वारा ना लांघने के लिए खींची गयी थी, ना कि सीता के लिए।

रामचरित मानस के इस संस्करण में सीता माता के अयोध्या से निष्कासन की कोई कथा नहीं है। यहाँ तक कि लव व कुश के जन्म का उल्लेख भी एक-चौथाई दोहे में कर दिया गया है। राम द्वारा सरयू नदी में समाधि लेने का भी कहीं उल्लेख नहीं है।

जब राजा दशरथ की तीनों रानियाँ राम से भेंट करने वन में जाती हैं तब उन्हें देखकर राम को यह कदापि ज्ञात नहीं होता है कि पिता राजा दशरथ का निधन हो गया है। विधवा, इस शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। उन्हें सदा रानी अथवा माता से संबोधित किया गया है।

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संवादों द्वारा कथाकथन

भारतीय ग्रंथों को संवादों तथा वार्तालाप के रूप में लिखा गया है। रामचरितमानस में भी श्री राम की कथा शिव एवं पार्वती के मध्य तथा काक भुशुण्डी एवं गरुड़ के मध्य संवादों के रूप में रचित है। गोस्वामी तुलसीदास स्वयं भी यदा-कदा अपनी उपस्थिति दर्शा देते हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न आश्रमों में ऋषियों एवं उनके शिष्यों के मध्य हुए संवाद भी हैं।

राम, लक्ष्मण एवं सीता के पंचवटी आश्रय काल में राम एवं लक्षमण के मध्य दार्शनिक विषयों पर भी संवाद होते थे। जैसे, माया क्या है? जब राम एवं लक्षमण किष्किन्धा में वर्षाऋतू के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तब राम को स्वयं से संवाद साधते हुए, ऋतुओं की तुलना शासनकला से करते दर्शाया गया है।

रामचरितमानस के अंतिम चरण में काक भुशुण्डी का एक दीर्घ प्रवचन है जिसमें वे कथा को समाप्त करते हुए पाठकों को शिक्षाप्रद सन्देश देते हैं।

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भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ

रामचरितमानस की भाषा में भारतीय संस्कृति का सत्व समाया हुआ है। उसमें भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ सन्निहित हैं। जैसे, जब नाविक केवट भगवान राम, सीता माता एवं लक्षमण को अपनी नौका में बिठाकर गंगा पार कराते हैं, तब सीता माता केवट को अपनी अंगूठी देकर उसके श्रम का भुगतान करने का प्रयास करती हैं। केवट यह कहकर अंगूठी लेने से मना कर देते हैं, “मैं भी केवट, तुम भी केवट, कैसे लूं तेरी उतराई”।

केवट कहते हैं कि हे राम जिस प्रकार मैं गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं। एक केवट दूसरे केवट से भुगतान कैसे ले सकता है? वैसे भी शुल्क गंतव्य पर पहुंचाने का होता है। हमसे सामान्यतः नौका पर चढ़ने से पूर्व ही शुल्क लिया जाया है, भले ही हम वहाँ पहुंचे अथवा नहीं।

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सदैव मूल रामचरितमानस का ही पठन क्यों करें?

विश्व में रामायण के अनेक संस्करण हैं तथा असंख्य पुनःकथन किये गए हैं। वस्तुतः, गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस भी प्राचीन वाल्मीकि रामायण का १७वी शताब्दी का पुनःकथन है। आशा है कि प्राचीन वाल्मीकि रामायण के पठन का मुहूर्त भी मुझे शीघ्र प्राप्त होगा।

रामायण की कथा की अनेक परतें हैं। राम अवतार की कथा एक मुखावरण है जिसके द्वारा मानव चरित्र के गहन समझ को पाठक तक पहुँचाया गया है। प्रत्येक पाठक इसे अपने दृष्टिकोण से पठन करता है। यही भारतीय ग्रंथों का वैशिष्ठ्य है। आप उन्हें अनेक दृष्टिकोणों से पठन कर सकते हैं तथा समझ सकते हैं। एक दृष्टिकोण ऐसा है जो उस पर कदापि लागू नहीं होता है, वह है ओछापन।

रामायण को जिस प्रकार लिखा गया है अथवा कहा गया है, उसे वैसे ही पठन करना तथा अपने स्वयं के निष्कर्ष निकालना महत्वपूर्ण है। इसीलिए मूल ग्रन्थ का पठन अत्यावश्यक होता है जो बिना किसी पक्षपात एवं निर्णय के घटनाओं को अपने मूल रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करता है.

आईये गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का पठन करें।

गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस आप Amazon.In से ले सकते हैं अथवा Kindle Book में पढ़ सकते हैं।

यह स्थल Amazon का सहायक है। उपरोक्त संकेत द्वारा आप जो भी पुस्तकें क्रय करेंगे, उसका कुछ प्रतिशत धनार्जन इस स्थल को प्राप्त होने की संभावना है। किन्तु इससे आपके क्रय मूल्य में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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  1. गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का एक संक्षिप्त व सारगर्भित व्याख्या आपने की, हमारे भारतीय ग्रंथ हमारे लिए अमूल्य धरोहर है और यह ज्ञान विज्ञान से ओतप्रोत है, जिन्हें आप जितनी बार पड़े या TV पर देखे तो हर बार कूछ अलग ही ज्ञान प्राप्त होता हैं। हर एक पात्र अपनी महत्वपूर्ण भूमिका त्याग, बलिदान व भगवान श्री राम व सीता माता के प्रति समर्पित रहता है। आपका सुझाव भी गुरुमंत्र की तरह है कि “मेरे लिए संभव है तो आपके लिए भी संभव है।” साधुवाद 🙏🙏🙏

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