भारत के राष्ट्रीय चिन्ह – भारत के खोज की यात्रा

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१५ अगस्त, १९४७ को भारत स्वतन्त्र हुआ तथा २६ जनवरी, १९५० को वह एक गणतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ। इस काल में भारत को एक नवीन परिचय प्राप्त हुआ। इस नवीन परिचय को एक नवीन चिन्ह की आवश्यकता थी जो भारत का चिन्ह बने,  भारत का प्रतिनिधित्व करे तथा भारत के विभिन्न आयामों को सामूहिक रूप से प्रदर्शित करे।

भारत के राष्ट्रीय चिन्ह
भारत के राष्ट्रीय चिन्ह

इस २६ जनवरी, गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में मैं आपको एक विशेष उद्देश्य से भारत भ्रमण पर ले जाना चाहती हूँ। मैं आज आपको भारत के राष्ट्रीय चिन्ह की यात्रा पर ले चलती हूँ।

सम्राट अशोक का सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष – राष्ट्रीय राजचिन्ह के लिए सारनाथ भ्रमण

वाराणसी के निकट, सारनाथ से खोजे गए सम्राट अशोक के स्तम्भ पर स्थित सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष को अब सारनाथ के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय में देखा जा सकता है। आप जैसे ही संग्रहालय में प्रवेश करते हैं, चार एशियाई सिंहों की एक विशाल मूर्ति आपका स्वागत करती है। ये चारों सिंह चार दिशाओं में मुख किये हुए हैं। चारों सिंह एक वृत्ताकार मंच पर विराजमान हैं। इसी वृत्त की खड़ी बेलनाकार सतह पर सुन्दर उभरे हुए चार चक्र, एक अश्व, एक सिंह, एक बैल एवं एक हाथी उत्कीर्णित हैं। यह मंच एक उलटे कमल के पुष्प पर स्थित है।

भारत के राष्ट्रीय चिन्ह - अशोक स्तम्भ एवं चक्र
अशोक स्तम्भ एवं चक्र हमारी मुद्राओं पर

मैंने इस प्रकार के सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष बिहार के वैशाली जैसे अनेक स्थानों पर देखे हैं किन्तु सारनाथ का यह स्तम्भशीर्ष आपके समक्ष व समीप होने के कारण आप इसके विशाल आकार का अनुभव ले सकते हैं। लोग कहते हैं कि इस सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष के ऊपर २४ तीलियों का एक विशाल चक्र भी था। आपको स्मरण होगा कि सारनाथ वह स्थान है जिसका सम्बन्ध धर्म चक्र प्रवर्तन से है। यहीं पर भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पांच अनुयायियों को अपना प्रथम उपदेश दिया था।

स्तम्भ के निचले भाग में भारतीय परंपरा का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ लिखा है जिसका अर्थ है सत्य की ही सदा विजय। यह सुभाषित मुण्डक उपनिषद से लिया गया है। सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष एवं वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ साथ मिलकर राजचिन्ह सम्पूर्ण करते हैं। चूँकि यह राजचिन्ह एक-आयामी आकृति है, इस प्रतीक में केवल तीन सिंह दृश्यमान हैं। चार चक्रों में से केवल तीन तथा चार पशुओं में से भी केवल दो ही दृश्यमान हैं। मध्य-चक्र के दायीं ओर बैल एवं बायीं ओर अश्व है। इस राजचिन्ह का प्रयोग सभी सरकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। यह राजचिन्ह आप सभी सरकारी पत्रों पर एवं सरकारी अधिकारियों के परिचय पत्रों पर छपे देख सकते हैं।

यह राजचिन्ह सभी वाणिज्य मुद्राओं – सिक्के व कागज के नोटों पर भी गर्व से विद्यमान हैं।

राष्ट्रीय पुष्प कमल – नगरों, गाँवों, कस्बों के जलाशयों का भ्रमण

भारत के कोने कोने में कमल का पुष्प पाया जाता है। सम्पूर्ण भारत भ्रमण के पश्चात यदि कोई आप से जानना चाहे कि आपके मत से राष्ट्रीय पुष्प कौन सा होना चाहिए, आप भी सहज सहमत होंगे कि कमल का पुष्प निश्चित ही भारत राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ है।

कमल - भारत के राष्ट्रीय पुष्प
कमल – भारत के राष्ट्रीय पुष्प

कमल पुष्प को देखने के लिए मेरे प्रिय स्थान हैं, सम्पूर्ण भारत में पसरे छोटे छोटे जलाशय। हम जब आसाम गए थे तब मैंने सिबसागर के जलाशय में नीले कमल देखे थे। वहीं गोवा के ग्रामीण भागों में हमें कमल के बड़े एवं छोटे दोनों आकार के पुष्प दिखाई देते हैं। जब कमल के पुष्प एवं पर्ण पर जल की बूँदें गिरती हैं, वे यहाँ से वहां लुड़कती रहती हैं किन्तु पंखुड़ियों एवं पर्ण को भिगोती नहीं हैं। ना ही उन पर किसी भी प्रकार का प्रभाव डालती हैं। आप समझ सकते हैं कि क्यों हम कमल को इतना पवित्र पुष्प मानते हैं।

कमल का पुष्प सम्पूर्ण भारत की सभी प्राचीन कलाशैलियों में एक आवश्यक अंग होता है। इन्हें हिन्दू एवं बौद्ध दोनों प्रकार के मूर्ति शास्त्र में देखा जा सकता है। यह पवित्रता एवं शुभता का प्रतीत है।

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रॉयल बंगाल टाइगर या बाघ – राष्ट्रीय पशु के दर्शन हेतु विभिन्न अभयारण्यों का भ्रमण

बाघ की आठ प्रजातियों में से भारत में पायी जाने वाली बाघ की प्रजाति को रॉयल बंगाल टाइगर कहते हैं। इस प्रजाति के बाघ केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही पाए जाते हैं। बाघ को १९७३ में भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया था। शालीनता, दृढ़ता, चपलता एवं अपार शक्ति के कारण उसे राष्ट्रीय पशु के रूप में चुना गया था। एक काल था जब ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में पाए जाते थे। यदि विश्वास ना हो तो आप किसी भी क्षेत्र के ग्राम देवता मंदिर में देखें। वहां आपको किसी ना किसी रूप में बाघ की छवि अवश्य दिखाई देगी।

पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बाघिन
पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बाघिन

दुर्भाग्य से, अमर्यादित शिकार व उनके नैसर्गिक निवास पर मानव अतिक्रमण के चलते आज बाघों की संख्या इतनी कम हो गयी है कि उन्हें देखने के लिए आपको विशेष रूप से यात्रा करनी पड़ती है। सौभाग्य से पर्यावरण एवं पशु प्रेमियों के कड़े परिश्रम के पश्चात अब उनकी संख्या में वृद्धि होने लगी है।

मुझे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के मुन्ना बाघ एवं पेंच राष्ट्रीय उद्यान की कॉलरवाली बाघिन को समीप से देखने का सौभाग्य मिला था।

बाघों के दर्शन के अन्य स्थल हैं, बंगाल का सुंदरबन, राजस्थान का रणथम्बोर, मध्यप्रदेश का बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान आदि। यूँ तो सम्पूर्ण भारत में अनेक बाघ संरक्षण अभयारण्य हैं, किन्तु उनमें से अनेक अभयारण्यों में बाघों की संख्या पर्याप्त नहीं है जिसके कारण उन्हें देख पाने की संभावना कम हो जाती है।

मीठे जल की सूंस (डॉलफिन) – राष्ट्रीय जलीय प्राणी के दर्शन के लिए चम्बल जाएँ

नदी की डॉलफिन अथवा सूंस मीठे जल में पायी जाने वाली सूंस है जो गंगा नदी में बड़ी संख्या में पायी जाती थी। गंगा नदी में पायी जाने वाली डॉलफिन की इस प्रजाति को २००९ में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था। ब्रह्मपुत्र एवं सिन्धु नदियों में भी मीठे जल की सूंस बड़ी संख्या में पाई जाती थी।

सूंस
सूंस पर निकला डाक टिकट

वर्तमान में मीठे जल की डॉलफिन को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना हो तो सर्वोत्तम नदी है, चम्बल नदी। इस नदी में अब भी नदी पारिस्थितिकी तंत्र शेष है। अन्यथा गंगा एवं अन्य नदियों में प्रदूषण, बाँध एवं शिकार के कारण उनकी संख्या निरंतर घट रही थी। चम्बल नदी में भी घटता जल स्तर उनके अस्तित्व के लिए संकट बनता जा रहा है।

क्या आप जानते हैं कि बिहार के भागलपुर में एक विक्रमशिला गंगा डॉलफिन अभयारण्य है?

बरगद का वृक्ष (वटवृक्ष) – राष्ट्रीय वृक्ष के दर्शन के लिए बोध गया जाएँ

बरगद का वृक्ष भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है जो एक शुद्ध देशी भारतीय वृक्ष है। लगभग सभी प्राचीन भारतीय साहित्यों व ग्रंथों में इस वृक्ष का उल्लेख किया गया है। यह भारत के इतिहास एवं लोककथाओं का अभिन्न अंग होता है। इसकी जटाओं से नवीन तना एवं शाखाएं बन सकती हैं। इसकी इस विशेषता एवं लंबे जीवन के कारण इसे अनश्वर माना जाता है।

बेंगलुरु के पास स्तिथ विशाल बरगद का पेड़
बेंगलुरु के पास स्तिथ विशाल बरगद का पेड़

नाशिक के निकट पंचवटी को पंचवटी बनाने वाले पांच वटवृक्षों को जब मैंने देखा, मेरे आनंद की सीमा नहीं थी। बोधगया में एक वटवृक्ष के नीचे ही गौतम बुद्ध को निर्वाण प्राप्ति हुई थी। आप बोधगया में महाबोधि मंदिर जाएँ तो आप वहां इसी वटवृक्ष का वंशज देख सकते हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायी वृक्ष से झड़कर नीचे गिरे पत्तों को घर ले जाते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं।

क्या आपको विक्रम व वेताल की कथा स्मरण है? उस कथा के मूल में भी तो एक वटवृक्ष है।

चक्रीय प्रकृति एवं स्वयं को चिरस्थाई बनाए रखने के गुणों के कारण बरगद के वृक्ष को पवित्र माना जाता है। कैसे भारत के कुछ प्रतीक चिन्ह भारत माता की धरती के दर्शन का प्रदर्शन करते हैं, यह अत्यंत रोचक है।

भारत में अनेक ऐसे स्थान हैं जो विशालतम वटवृक्ष होने का दावा करते हैं। किन्तु यह जानना कठिन हो जाता है कि मूल वृक्ष कौन सा है। वटवृक्ष की शाखाओं से लटकती जटाएं नवीन वृक्षों को जन्म देने का सामर्थ्य रखती हैं। एक वृक्ष की लटकती जटाओं द्वारा दूसरे स्थान पर नवीन वृक्ष को पुनर्जीवित करने का चक्र इस प्रकार अनवरत जारी है कि यह कहना कठिन हो जाता है कि कौन सा वृक्ष मूल वृक्ष है। बालक वृक्ष भी पालक वृक्षों जैसे विशाल बन गए हैं। मैंने जो अब तक का विशालतम वटवृक्ष देखा है वह बंगलुरु के निकर, मैसूरू मार्ग पर है। वटवृक्ष के पास भ्रमण करना एक अनूठा अनुभव होता है मानो वह एक महल हो। इसकी शाखाएं एवं जटाएं किसी भूलभुलैया से कम नहीं होती हैं।

भारतीय मोर – राष्ट्रीय पक्षी के दर्शन के लिए राजस्थान जाएँ

भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है। मोर एक अत्यंत रंगबिरंगा व मनमोहक पक्षी होता है। जब मोर आनंदित हो कर नृत्य करने लगता है तो उसकी छटा आकाश छूने लगती है। वह एक अत्यंत आकर्षक दृश्य होता है। वह दृश्य सभी का मन मोह लेता है। वास्तव में वह यह नृत्य अपनी मोरनी को आकर्षित करने के लिए करता है।

मोर
मोर – भारत का राष्ट्रीय पक्षी

मोर को राष्ट्रीय पक्षी का सम्मान १९६३ में प्राप्त हुआ था। यह सम्मान उसे उसके आकर्षक रूप तथा उसके ऐतिहासिक व धार्मिक मूल्यों के कारण प्राप्त हुआ था। इसका एक कारण यह भी है कि यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप में पाया जाता है तथा अपने अनूठे रूप के कारण इसे पहचानना भी अत्यंत आसान है।

यूँ तो मोर भारत में सभी स्थानों पर पाए जाते हैं किन्तु मैंने अधिकतर मोर राजस्थान में देखे हैं। मैंने उन्हें पेंच में भी देखा था जहां वह अपने पंखों के सभी रंग प्रदर्शित करते हुए गर्व से एक वृक्ष की शाखा पर विराजमान था।

गंगा – राष्ट्रीय नदी के दर्शन के लिए वाराणसी जाएँ

गंगा के विषय में कौन नहीं जनता?

उत्तराखंड के हिमालयों में स्थित गंगोत्री हिमनद से इसका उद्गम होता है। तत्पश्चात वह उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल से बहते हुए अंततः बंगाल की खाड़ी तक जाती है जहां वह हिन्द महासागर में समा जाती है। २५०० किलोमीटर से भी अधिक लंबी गंगा से आप कहीं भी भेंट कर सकते हैं।

भारत की राष्ट्रीय नदी - गंगा
गंगा – हमारी संस्कृति का प्रतीक चिन्ह

गंगा से भेंट करने एवं उसकी आराधना करने के लिए मेरा सर्वप्रिय स्थान है, वाराणसी। पूर्व में यहाँ की स्वच्छता पर प्रश्न चिन्ह लगते थे। किन्तु स्वच्छता के प्रति राष्ट्रीय जनजागृति के पश्चात अब एक सर्वेक्षण के अनुसार गंगा तट पर बसे नगरों में वाराणसी को सर्वाधिक स्वच्छ गंगा नगरी की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वाराणसी के गंगा घाटों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उन भावनाओं का अनुभव आप स्वयं लीजिये।

मुझे ऋषिकेश में भी गंगा दर्शन अत्यंत भाता है। विशेषतः नवनिर्मित आस्था पथ, जो नदी के किनारे शान्ति से चलने में अत्यंत सहायक है। प्रयागराज में भी गंगा दर्शन की अनुभूति अप्रतिम है। यहाँ तीन नदियों का संगम जो है।

गंगा भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रतीक चिन्हों में से एक है। २००९ में इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था।

तिरंगा – भारत के राष्ट्रीय ध्वज के लिए दिल्ली

तिरंगा झंडा
तिरंगा झंडा

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को आप किसी भी सरकारी इमारत के ऊपर देख सकते हैं। भारत के स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के उत्सवों पर तो तिरंगा देशव्यापी हो जाता है। देश में सभी भारतीय इसे गर्व से फहराते हैं। १५ अगस्त के दिन हमारा तिरंगा ऐतिहासिक लालकिले का सम्मान बढाता है। आप अपनी दिल्ली की यात्रा में भारतीय संसद भवन के ऊपर इसे अवश्य देखिये।

और पढ़ें: भारतीय संसद भवन के दर्शन कैसे करें?

आम – भारत के राष्ट्रीय फल के लिए अपने पास के फल उद्यान अवश्य जाएँ

मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय ऐसा होगा जो यह नहीं मानता होगा कि आम फलों का राजा है। भारत का राष्ट्रीय फल आम देश की समृद्धि को व्यक्त करता है। पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में आम की खेती की जाती है। पौराणिक कथाओं एवं इतिहास में भी आमों की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। १९५० में आम को भारत के राष्ट्रीय फल के रूप में अपनाया गया था।

आम - भारत का राष्ट्रोय फल
फलों का रजा आम

आम के अनेक प्रकार होते हैं। आपको कौन सा आम प्रिय है, बहुधा यह इस तथ्य पर निर्भर करता है कि आप किस आम को खाते हुए बड़े हुए हैं। मुझे खट्टा-मीठा बनारसी लंगडा या चौसा आम सर्वाधिक प्रिय है। भारत के पश्चिमी भागों में लोग अल्फांसो अथवा हापूस को सर्वोत्तम आम मानते हैं। किन्तु मैं उसके स्वाद से आदी नहीं हो पायी। हैदराबाद में बैगनपल्ली प्रसिद्ध है जिसका एक बड़ा टुकडा लगभग भोजन के समान हो जाता है।

हम चाहे जिस भी प्रकार का आम खाना चाहते हों, हम सब को एक आनंद अवश्य उठाना चाहिए। जीवन में कम से कम एक बार हमें आम के वृक्ष से सीधे आम तोड़कर खाना चाहिए।

आशा है भारत के प्रतीक चिन्हों की इस यात्रा का आप भरपूर आनंद उठाएंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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